Author: Kumar Bunty

  • शायरी

    ऐसा तपा के सुन्न किया है तेरी तड़प ने
    कि अब नहीं लगती मुझे गर्मी-सर्दी

  • शायरी

    ऊपर से टपक रही है छत
    नीचे सीलन आ गई दीवारों में
    दाम किसी काम के मिलते नहीं
    चाहे हम खुद भी बिक जाएँ बाज़ारों में।

  • तेरे न होने का वज़ूद

    एक तू ही है
    जो नहीं है
    बाकि तो सब हैं
    लेकिन…
    तेरे न होने का वज़ूद भी
    सबके होने पे भारी है
    मुझे भी जैसे
    तुझे सोचते रहने की
    एक अज़ीब बीमारी है।

    नहीं कर सकता आंखे बंद
    क्योंकि तेरा ही अक्ष
    नज़र आना है उसके बाद
    तब तक
    जब तक मैं बेखबर न हो जाऊ
    खुद के होने की खबर से
    और अगर आंखे खुली रखूँ
    तो दुनिया की फ्रेम में
    एक बहुत गहरी कमी
    मुझे साफ नज़र आती है
    जो बहुत ही ज्यादा
    चुभती चली जाती है
    क्योंकि उस फ्रेम में मुझे
    तू कहीं दिख नहीं पाती है।

    -KUMAR BUNTY

  • SHAYARI

    उसके चुप रहने का अंदाज़
    बहुत कुछ कहता है
    इशारो की बातें हैं
    कोई लफ्ज़ भी
    इतने सलीखे से नहीं कहता है।

  • अपने ही सूरज की रोशनी में

    अपने ही सूरज की रोशनी में

    मोतीसा चमकता

    औस का कतरा है आज़ वो

    जो कल तक था

    अंधेरे में जी रहा।

     

    कितनो की आँखों का

    तारा है आज़ वो

    जो कल तक था

    अज़नबी बनकर जी रहा।

     

    दूसरो के कितने ही

    कटे जख्मों को  है वो सी रहा

    लेकिन अपने ग़मों को

    अभी भी

    वो खुद ही है पी रहा।

     

     

    कितनी ही बार जमाने ने

    उसे गिराया लेकिन

    वो फिरफिर उठकर

    जमाने को ही

    सँवारने की तैयारी में

    है जी रहा।

     

    अपने दीया होने का

    उसने कभी घमण्ड नहीं किया

    तभी तो आज़ वो

    सूरज सी चमक लेकर

    है जी रहा।

     

     

    जीवन कि दिशा पाकर

    आज़ वो दुनियाँ को है जीत रहा

    जो कल तक था

    खुद से ही

    हारा हुआ सा जी रहा।

     

    अपनी मौत का भी

    डर नहीं अब उसको

    क्योंकि उसे मालूम हो गया

    कि गडकर इन पन्नों पर

    वो सदियों तक होगा जी रहा।

     

                                                  –   कुमार बन्टी

     

     

  • ख़ुशी क्या है ?

    क्या सिर्फ

    चेहरे पर बनी कुछ लकीरें

    तय करती हैं ख़ुशी ?

    या फिर

    किसीके पूछने पर

    ये कह देना

    “मैँ खु़श हूँ”

    इससे ख़ुशी का पता लग सकता है ?

      — KUMAR BUNTY

  • क्या लिखूँ ?

    दिनरात लिखूँ

    हर बात लिखूँ

    दिल के राज़ लिखूँ

    मन के साज़ लिखूँ।

     

    अपने वो दिन बेनाम लिखूँ

    लेकिन नहीं हुआ बदनाम लिखूँ

    कितना बनकर रहा गुमनाम लिखूँ

    इतना कुछ पाने पर भी

    बनकर रहा मैं प्राणी आम लिखूँ।

     

    मन तो मेरा कहता है

    कि लगातार लिखूँ

    और दिल भी पुकारता है

    कि सबके सामने सरेआअम लिखूँ।

     

     

     

    कितनों ने दिया साथ

    और कितनों ने

    दिखाया खाली हाथ

    क्या वो भी लिखूँ।

     

    वक़्त केसे पड़ गया कम

    होते हुए भी मन में

    समुद्रसी अनगिनत,

    लेकिन हर धार नज़ारेदार

    ये गुत्थी भी है मज़ेदार

    दिल तो कहता है

    ये भी लिखूँ।

     

    कहां से लेकर कहां तक लिखूँ

    जब मुझे आदि और अंत का

    ज्ञान ही नहीं

    किसकिस ज़माने की गाथाऐं लिखूँ

    जब मुझे अबतक सही और गलत की

    पहचान ही नहीं

     

    और हां

    तुम जो कोई भी हो

    जो ये पढ़ रहे हो

    उसके खातिर

    उसे बिना जाने ही

    आखिरखार क्या लिखूँ?

     

                                           कुमार बन्टी

     

                             

     

  • तू ही बता दे जिंदगी

    कुछ खो गया है मेरा

    या फिर

    मैं खुद ही लुटा रहा हूँ

    जिंदगी कहीं

    चल तू ही बता दे जिंदगी

    आज़ नहीं तो

    कल किसी और मोड़ पे सही

    मुझे कोई जल्दी नहीं

    लेकिन तुम

    इतनी भी देर मत करना

    कि खो चुका हूँ मैं

    खुद को ही कहीं।

                                                                                                                                                                                            कुमार बन्टी

     

  • लकीरों के बीच तस्वीर

    लकीरों के बीच तस्वीर

    कभीकभी

    कागज पर खिंची

    लकीरों के बीच भी

    कोई तस्वीर

    इस कदर से

    जिंदा हो जाती है

    कि जिसकी होती है

    वो तस्वीर

    उससे मिले बगैर ही

    उससे मिलकर होने वाली बातें

    उस तस्वीर से हो जाती है।

     

                                         कुमार बन्टी

     

  • सिर्फ मधु ही नहीं

    तुम्हारे होठों का

    सिर्फ मधु ही

    मुझे प्यारा नहीं

    बल्कि प्यारी लगती हैं

    वो कड़वी बातें भी

    जो तुम कहती हो

    क्योंकि वो होती हैं

    हमेशा ही

    मेरे भले की।

     

                                                  –   कुमार बन्टी

     

  • QUOTES

    ”Prepare for future

    But just

    Not so vast

    That you might have lost

    The present”

                                                             – KUMAR BUNTY

  • LIFE IS SO COOL

    Life is so cool

    Because how easily it makes us fool

    When it wants

    And we can’t denied to it

    Because we are actually so unaware about it

    Till even it passes through

    To me and also to you

     

  • HAPPINESS

    Happiness is just the way to get it

    Someone who learnt

    Can become expert

    Who doesn’t, may be lost self

     

  • SHAYARI

    उससे दोबारा होगी मुलाकात  क्योंकि गोल है दुनिया,

    इस उम्मीद में इंतजार उसका आज़ भी बरकरार है।

  • SHAYARI

    तेरे नैनों की किताबें पढ़ने की जिद्द पकड़ी है इस दिल ने,

    तू अपनी पलकों का ये पहला पन्ना तो पलट दे।

  • SHAYARI

     

    तुझसे  मिलने का  मुझे कोई  आसार भी नहीं दिखता।

    लेकिन इंतज़ार तेरा करतेकरते मैं फिर भी नहीं थकता।

  • SHAYARI

    साथ देने में मेरा

    जिंदगी के दुखों का

    कोई सानी नहीं

    असल में तो

    दुख के बिना

    सुख का भी

    कोई मानी नहीं।

                                                                              मानी= अर्थ

  • SHAYARI

    SHAYARI

    तंग नहीं करता हूँ मैँ उसे आज़कल

    ये बात भी तो  उसे  तंग करती है

  • SHAYARI

    कभीकभी सोचता हूँ

    कि

    कुछ देर

    सोचना बंद कर दूँ।

  • SHAYARI

    अंत तो तेरा भी वही होगा अंत मेरा भी वही होगा

    लेकिन फर्क इस बात से पड़ेगा

    कि किसकी जगह लेने वाला कोई नहीं होगा।

  • SHAYARI

     

    साथी तो मेरे वो भी खूब रहे

    जो लगातार मेरी तनकीद करते रहे

    लेकिन अमलअंगेज़ तो मेरे वो बखूबी रहे

    जो लगातार मुझसे कोई उम्मीद करते रहे।

    तनकीद=आलोचना

    अमलअंगेज़ = उत्प्रेरक

     

  • SHAYARI

     

    जिंदगी की जंग  मुझसे जारी है

    कभी मैं उसपे

    तो कभी वो मुझपे भारी है।

  • SHAYRI

     

    ज्ञानी को होता है एकांत पसंद

    लेकिन किसीसे मिलने की तलब

    मूर्खता का प्रमाण तो नहीं होता

    कम से कम प्यार में तो नहीं होता।

  • SHAYRI

    क्या नाम है उसका

    कौन से देश से है वो

    असल मे दिल देने वाला तो

    सोचता ही नहीं इन सब बातों को।

  • SHAYARI

    है मुझे एक मर्ज़

    लेकिन मुझे खौफ नहीं

    क्योंकि है वो मर्ज़

    बेखौफी का ही।

  • SHAYARI

    SHAYARI

    प्रेम के बारे में क्या बात करूँ

    प्रेम की अभिव्यक्ति शब्दों मे कहां होती है

    मिले सबको प्रेम वो अलग बात है

    लेकिन प्रेम की चाह तो हरेक दिल में होती है।

  • कोई क्या करे तब….

    वक़्ता भी क्या बोले

    जब कोई उसे

    ध्यान से

    सुनने को तैयार नहीं।

     

    लेखक भी क्यों लिखे

    जब कोई कुछ

    दिल से

    पढ़ने को तैयार नहीं।

     

    गायक भी कैसे गाए

    जब कोई

    सुरों की

    कदर करने को तैयार नहीं।

     

    आशिक़ भी अपने दिल को

    क्यों खोले

    जब उसका प्यार उसे

    समझने को तैयार नहीं।

     

    दर्द में भी कोई

    क्यों चींखे

    जब कोई उसकी

    चींख सुनने को तैयार नहीं।

     

    गम में भी कोई

    कैसे रोए

    किसीके आगे

    जब कोई उसका गम

    समझने को ही तैयार नहीं।

     

     

    कोई कैसे जीए

    जब जीने का कोई

    सहारा ही नहीं

    और तो और

    उससे मिलना भी

    किसीको गवारा नहीं।

     

    इंसान किसे ढूँढे

    जब उसे

    खुद की ही

    मालूमात नहीं।

     

                                      कुमार बन्टी

  • सीखता रहता हूँ मैं

    जाने

    क्याक्या चीजें

    लिखता रहता हूँ मैं

    वक़्त की इस महँगाई में

    खुद के ही हाथों

    खुद को

    बिकता रहता हूँ मैं

    सब से दूर होकर

    पता नहीं

    किसके करीब

    खुद को

    खींचता रहता हूँ मैं

    कईं बार तो

    इसी वज़ह से

    खुद पे ही

    झींकता रहता हूँ मैं

    लेकिन आखिर में

    चाहे हार जाऊँ

    या जीत जाऊँ

    फिर भी

    कुछ कुछ

    सीखता रहता हूँ मैं।

     

                                                                          –        कुमार बन्टी

     

     

  • अधूरापन ये मेरा

    अधूरापन ये मेरा

    क्या पता

    मेरे भीतर

    कोई आग जला दे

    और फिर कभी

    मेरे भीतर कोई

     कामयाब सूरज़ उगा दे।

     

                                        कुमार बन्टी

     

  • कौन मिलेगा कहां

    कौन जानता है

    कि कौन मिलेगा कहां

    देखौं

    मैं तो हूँ यहां

    और तुम हो

    जाने कहां

    लेकिन तुम

    मिल रहे हो मुझसे

    पढ़कर मेरी लिखी जुबां।

     

                                   कुमार बन्टी

     

  • काबिल सदा

    बातें दिल की बयां करना
    आसां नहीं इतना
    लेकिन
    अपनी सदा को
    इतना काबिल तो
    जरूरी है बनाना
    कि डर से भी कभी
    न पड़े डरना।

                                                                                                                                                      सदा= आवाज़
    – कुमार बन्टी

  • कोशिश की राह

    कोशिश की राह

    नहीं हारनी है हिम्मत

    जब तक ये साँस हैं

    क्योंकि मुझे

    उम्मीद की चाह से ज्यादा

    कोशिश की राह पे विश्वाश है।

     

                                          –   कुमार बन्टी

  • नफ़रत

    अमीर लोगों की अमीरी से

    बड़े लोगों की बड़लोकी से

    मुझे नफरत नहीं

    मुझे नफ़रत है

    उनके नखरों से

    और मुझे ये भी मालूम है

    कि जिन लोगों में

    है ये नखरे

    उन्हें ही नफ़रत होगी

    मेरे इन अखरों से।

     

                                      कुमार बन्टी

     

  • दौड़ सी लगी है।

    वर और वधू के लिए

    जितनी दौड़ दिख रही है

    उससे ज्यादा तो

    लड़कों में गर्लफ्रेंड

    और लड़कियों में

    बॉयफ्रेंड के लिए

    आजकल एक

    दौड़ सी लगी है।

     

    माँबाप से ज्यादा

    भाई तो है ही कौन

    पैसों के लिए

    पता नहीं क्यों लगी है

    लेकिन एक

    दौड़ सी लगी है।

     

    पत्नी व्यवहारकुशल हो

    तो भी चलेगा

    लेकिन अपने साथ वो

    लाई है दहेज़ कितना

    इस बात के लिए

    आज़ भी एक

    दौड़ सी लगी है।

     

    गुरुशिष्य का रिश्ता

    जो सबसे महान होता था

    उसे औपचारिक बनाने खातिर

    दोनो ही तरफ

    पता नहीं क्यों

    एक दौड़ सी लगी है।

     

     

    ज्ञान से ज्यादा

    खोखली सफलता ही

    बस पाने खातिर

    आज़ के

    बहुत से विधार्थियों में भी

    एक दौड़ सी लगी है।

     

    नोट देकर

    वोट लेने खतिर भी

    आज़ के बहुत से नेताओं में

    एक दौड़ सी लगी है।

     

    भूलकर गुणवत्ता खानपान की

    हटाकर आवश्यकता दिमाग की

    नशे मे आयाम बनाने खातिर

    और मन को मचलाने खातिर

    आज़ के बहुत से युवाओ में

    जो घिनौनी

    लेकिन फिर भी

    दिनदरदिन

    एक दौड़ सी लगी है।

     

    युवा देश है हमारा

    कह रहा है ये जहान सारा

    रख रहा है पैनी नज़र

    कि इस देश के ये युवक

    ले जाएँगे देश को

    किस डगर

    और किस कदर

    लेकिन इन युवाऔं में तो

    कामनियों के पीछे पागल होकर

    खुद को खुद ही

    कमजोर बनाने खातिर

    एक बहुत ही निराशाजनक

    दौड़ सी लगी है।

                                                          कुमार न्टी

  • दिन और रात का सपना

    दिन में देखा सपना

    रात को देखा सपना

    रात का जब टूटा सपना

    दिन में जगा हुआ पाया

    लेकिन दिन का जब टूटा सपना

    रात में भी सो पाया।

     

     

                                    कुमार बन्टी

     

  • धागे-मोती

    मोती को धागे से

    और धागे को मोती से

    जब तक होता नहीं प्यार

    तब तक

    उनकी नहीं बनती

    कोई विशिष्ट पहचान।

     

     मोती=शब्द

     धागे=विचार

                                      कुमार बन्टी

     

  • दिन और रात का सपना

    दिन में देखा सपना

    रात को देखा सपना

    रात का जब टूटा सपना

    दिन में जगा हुआ पाया

    लेकिन रात का जब टूटा सपना

    दिन में भी सो पाया।

     

     

                                              कुमार बन्टी

     

  • टिकते वाले रिश्ते

    यूँ तो रिश्ते

    रोज़ ही बनते हैं

    इस जहां में

    कुछ टूट जाते हैं

    कुछ बिक भी जाते हैं

    लेकर बहाने तरहतरह के

    लेकिन

    टिकते हैं रिश्ते

    वो ही

    जिन रिश्तों में

    दोनो पक्षों ने

    वफा के अलावा

    और कोई माँग

    कभी की ही नहीं।

                                                            कुमार बन्टी

  • जिसको जरूरत होती है….

    जिसको जरूरत होती है

    वही साथ चलता है

    बिन जरूरत वाला तो बस

    तनक़ीद करने को ही मिलता है।

     

    अपना मतलब सोचे

    दूसरे की मदद करते वक़्त

    आज़ इस दुनियाँ में

    ऐसा इंसान कम मिलता है।

     

    जो दूर से दिखाती हैं निगाहें

    पास जाकर छानने पर

    वही मंजर

    हर बार कब मिलता है।

     

    बड़ीबड़ी नावें

    पैदा करती है

    दरिया में बहुत भारी हलकम

    लेकिन अगर

    डूब जाएँ वें कभी

    तो उनका नामोनिशान कहां मिलता है।

     

    खुदखुद

    पा लेता है

    वो अध्द्भुत औषधि

    जो अपने घावों से पहले

    दूसरो का जख्म

    बखूबी सिलता है।

     

    और

    तब क्या गम होगा

    किसीके हिज्र का       

    जब बंदा उसके करीब हो

    जिसकी मर्जी बगैर

    एक पता भी नहीं हिलता है।

                                                               

                                        कुमार बन्टी

    जिसको जरूरत होती है….

     

    जिसको जरूरत होती है

    वही साथ चलता है

    बिन जरूरत वाला तो बस

    तनक़ीद करने को ही मिलता है।

     

    अपना मतलब सोचे

    दूसरे की मदद करते वक़्त

    आज़ इस दुनियाँ में

    ऐसा इंसान कम मिलता है।

     

    जो दूर से दिखाती हैं निगाहें

    पास जाकर छानने पर

    वही मंजर

    हर बार कब मिलता है।

     

    बड़ीबड़ी नावें

    पैदा करती है

    दरिया में बहुत भारी हलकम

    लेकिन अगर

    डूब जाएँ वें कभी

    तो उनका नामोनिशान कहां मिलता है।

     

    खुदखुद

    पा लेता है

    वो अध्द्भुत औषधि

    जो अपने घावों से पहले

    दूसरो का जख्म

    बखूबी सिलता है।

     

    और

    तब क्या गम होगा

    किसीके हिज्र का       

    जब बंदा उसके करीब हो

    जिसकी मर्जी बगैर

    एक पता भी नहीं हिलता है।

                                                               

                                        कुमार बन्टी

  • खुद को खोने के डर में

    खुद को खोने के डर में

    भीड़ भरी इस तन्हाई में

    जीना

    एक अलग नज़रिए के साथ

    कितना

    जरुरी बन गया

    दिनदिन

    बदलता

    यहां हर मुकाम

    मुझे

    ये जाहिर कर गया।

     

    शोर भरे सन्नाटे में

    कैसे

    मैं ढ़ल गाया

    ये तो

    बस मैं ही जानता हूँ

    लेकिन

    खुद को खोने के डर में

    इस

    भीड़ भरी तन्हाई में

    जब से मैं

    खुद से मिल गया

    तब से मैं

    खुद को

    बड़ा खुशनसीब मानता हूँ।

     

                                                           –   कुमार बन्टी

     

  • खुली किताब नहीं

    खुली किताब नहीं

    एक ही झटके में

    सबकुछ समझ जाओ तुम

    मेरा जीवन

    ऐसी कोई

    खुली किताब नहीं

    राह हासिल करने को

    गंदी नाली को स्वीकारले

    ऐसा ये कोई

    बेवकूफ आब नहीं।

     

                                                                         -कुमार बन्टी

  • उनके सपनों का भारत

    उनके सपनों का भारत

    वज़न उठता नहीं

    तुमसे दो मण भी

    कहां गई शक्ति

    तुम्हारे यौवन की

    और कहां है अभिव्यक्ति

    तुम्हारे मन की।

     

    चलो ये वज़न तो

    तुम भारी कह सकते हो

    इससे इंकार भी कर दो

    तो ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा

    लेकिन तुम तो वो वज़न भी

    उठाने को तैयार नहीं

    जो होता है

    देश के प्रति

    कुछ प्रण का

    और जो दायित्व है

    तुम्हारे इस युवानपन का।

     

    उन्होंने तो

    अपना बलिदान देकर

    तुम्हें ये भारत सोंपा

    लेकिन तुमने

    कितना योगदान देकर

    देश के बारे में सोचा

    सहो ये देशभक्ति का झोंका।

     

    ये भारत

    उनके सपनों का भारत

    लगता ही नहीं

    या फिर कहूँ

    कि है ही नहीं।

     

    उन्होने तो

    अपने प्राणों को भी

    देश के खातिर झोंका

    लेकिन क्या तुम्हारे ज़मीर ने

    तुम्हारा उत्तरदायित्व निभाने के लिए

    तुम्हें कभी नहीं टोका

    चलते हुए उन राहों पर

    जिनकी मंज़िल वो तो नहीं

    जो उन वीरों ने सोची थी

    सच में ये भारत

    उन वीरों के

    सपनों का भारत

    है ही नहीं।

     

    काबिल हैं इस देश में अभी भी

    काबलियत की भी कमी नहीं

    लेकिन कर नहीं पा रहे सभी

    अभिव्यक्ति अपनी असलियत की

    जब असलियत अपनी

    और अपने कर्तव्य की

    सभी युवा जान जाएंगे

    तो फिर

    वो बनकर कारगर युवाशक्ति

    इस देश का सितारा

    और भी चमकाएंगे

    और कभी कभी तो

    इस भारत को

    उनके सपनों का भारत

    बनाकर ही दिखाएंगे।

     

                                                             कुमार बन्टी

     

  • SHAYARI

    तेरी देहलीज टपने खातिर काफी दिनों से कुछ किया ही नहीं।

    ऐसा लगा मानो  जिंदा रहके भी इस दौरान  मैं जिया ही नहीं।

  • उदासी खूबसूरत

    मेरी उदासी भी

    मेरे लिए

    बन गई खूबसूरत

    ये किसीका

    कोई असर ही है खूबसूरत।

     

    लेकर बैठा रहता मैं

    जब अपनी

    रोनी सूरत

    उस वक़्त भी

    गढ़ी जा रही होती

    मेरे भीतर

    उसकी कोई नूरत।

     

    असल में तो

    मेरे लिये

    वो ही है

    सबसे ज्यादा खूबसूरत

    जिसके असर से

    मुझे दिख रहा है

    सब कुछ खूबसूरत।

     

                                                             –   कुमार बन्टी

     

  • SHAYARI

    उसके इंतजार में मेरी पूरी जिंदगी गुज़र गई।

    मोहब्बत की  ये कीमत भी  मुझे कम लगी।

  • SHAYARI

    तुझसे  मिलने का  मुझे कोई  आसार भी नहीं दिखता।

    लेकिन इंतज़ार तेरा करतेकरते मैं फिर भी नहीं थकता।

  • SHAYARI

    उसके जैसी कोई लडकी नहीं मिली कभी आजतक

    लेकिन  वो भी तो  मुझे  नहीं मिली कभी आजतक।।

    उससे मिलके  अनजाने में ही  सँवरे थे हम  लेकिन,

    बिगडने की कोई वजह भी मिली कभी आज़तक।

  • अकेले होने का मतलब

    अकेले होने का मतलब हर बार

    बस उदास होना ही  नहीं होता

    हो सकता था  मैं  भी  बरबाद

    पास अगर मैं  खुद के होता।

     

    किसीकी कोई चोट

    ऐसी भी होती है

    जिसका एक निशाँ ही

    कईं चोटो से कम नहीं होता।

     

    कुछ गम

    सीख देने वाले भी होते हैं

    सिर्फ रूलाने खातिर ही

    हर गम नहीं होता।

     

    गम किसीके जाने का

    कईं बार इतना गहरा होता है

    कि वो

    आँसुओं के ख़त्म होने पर भी

    कम नहीं होता।

     

    लेकिन जिसने

    परमप्रकाश पा लिया हो

    उसके लिए किसी भी मुकाम पे

    तम नहीं होता।

     

    और वो तो इंसान कईं बार

    यूँ ही भ्रम पाले फिरता है

    वरना यहां कोई भी इंसान

    किसी से कम नहीं होता।

     

                                                                               –   कुमार बन्टी

     

  • कुछ पल

    कुछ पल

    कुछ पल

    बन जाते हैं

    सब कुछ।

     

    कुछ पल

    कह देते हैं

    खुद ही कुछ।

     

    कुछ पल

    छोड़ते नहीं

    संग में कुछ।

     

    कुछ पल

    जिनका मिलता नहीं

    किसीकी को भी

    कोई भी हल।

     

    कुछ पल

    यूँ ही

    जाते हैं ढ़ल।

     

    कुछ पल

    टिकते नहीं

    कुछ भी पल।

     

    कुछ पल

    रहते वहीं सदा

    आज़ और कल।

     

    कुछ पल

    खो जाते हैं कहीं

    हो जाते हैं गुम

    बनकर सबसे हसीं पल।

     

    कुछ पल

    रूलाते हैं बहुत

    जब याद जाएँ

    किसी पल।

     

    कुछ पल

    देते हैं सकून

    अगर मिल जाएँ

    कुछ ही पल।

     

    कुछ पल

    जो सस्ते हैं आज़

    क्या पता

    महँगे हो जाए कल।

     

     

     

    कुछ पल

    कर देते हैं

    जीना मुश्किल।

     

    कुछ पल

    होते हैं

    हर समस्या का हल।

     

    कुछ पल होते हैं

    जीवन के हालात

    सँवारने के लिए

    डरना नहीं

    क्योंकि ये हो सकते हैं

    तुम्हे तपाने के रास्ते

    साथ लिये हुए

    चलते हैं तुम पर

    व्यंग्य कसते हुए।

     

    कुछ पल होते हैं

    जीवन में निखार लाने के लिए

    लगते हैं वो पल

    कईं बार

    तुम्हे ही कैद करते हुए।

     

    कुछ पल

    कईं बार

    देते हैं

    बहुत कुछ बदल।

     

    कुछ पल

    बस मिलते हैं

    कुछ ही पल

    नहीं उम्रभर

    उन्हें वापिस लाने के लिए

     कोई

    कर भी नहीं सकता कुछ।

     

    कुछ पल

    समझे जा सकते हैं

    बस उन्हें

    जीकर ही

    कुछ पल।

                                                                                                             कुमार बन्टी

     

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