एक ज़माने से तेरी तस्वीर लिये बैठे हैं_
तुमने फासलों पर शूल चढ़ा रखे हैं जब भी नज़दीक आते हो दिल में हमारे चुभते बहुत हैं_
-PRAGYA-

एक ज़माने से तेरी तस्वीर लिये बैठे हैं_
तुमने फासलों पर शूल चढ़ा रखे हैं जब भी नज़दीक आते हो दिल में हमारे चुभते बहुत हैं_
-PRAGYA-

वो तरस रहा था माँ की ममता
बाबा के दुलार को_
मगर तकदीर में अनाथ होना था
सड़क उसकी बिछौना था_
पल-पल हर शख्स में उसने ढूँढा था
वही एक तो उसका सपना था_
कई रातों की लोरी अंतहीन दुलार
पर तकदीर में रिश्तों की टोकरी खाली थी_
वो तन्हा ही ज़िन्दगी का सफर काट रहा था_
आँसू बो रहा था दिल में
दर्द की फसल काँट रहा था_
मिला नहीं जो उसे प्यार
वो सबको बाँट रहा था_
ज़रूरत नहीं थी किसी को उसकी
वो अंतिम साँसे भी सड़क पर ले रहा था__
सब जी रहे थे वो मर रहा था__
वो सड़क पर जन्मा सड़क पर ही चल बसा__
किसी की आँख में आँसू न थे..इंसां था
जानवर की तरह मर गया__
फिर एक सड़क थी
फिर एक दर्द का अंत हो गया__
अंतिमसंस्कार गर्द में ही
कचरेवाले ने कचरे में ही कर दिया___
-PRAGYA-
वो तरस रहा था माँ की ममता
बाबा के दुलार को_
मगर तकदीर में अनाथ होना था
सड़क उसकी बिछौना था_
पल-पल हर शख्स में उसने ढूँढा था
वही एक तो उसका सपना था_
कई रातों की लोरी अंतहीन दुलार
पर तकदीर में रिश्तों की टोकरी खाली थी_
वो तन्हा ही ज़िन्दगी का सफर काट रहा था_
आँसू बो रहा था दिल में
दर्द की फसल काँट रहा था_
मिला नहीं जो उसे प्यार
वो सबको बाँट रहा था_
ज़रूरत नहीं थी किसी को उसकी
वो अंतिम साँसे भी सड़क पर ले रहा था__
सब जी रहे थे वो मर रहा था__
वो सड़क पर जन्मा सड़क पर ही चल बसा__
किसी की आँख में आँसू न थे..इंसां था
जानवर की तरह मर गया__
फिर एक सड़क थी
फिर एक दर्द का अंत हो गया__
अंतिमसंस्कार गर्द में ही
कचरेवाले ने कचरे में ही कर दिया___
-PRAGYA-

हर पहर गुज़र जाता हैं
छूकर मुझे एक अन्जाना सा_
हम ज़िन्दगी थामकर तेरे ही
ख्वाबों को तराशते रहते हैं_
तु अन्जान सही मुझसे
ज़िंदा हैं पर साँसे मेरी ही तुझसे_
तुझे भूला सकुं पास
वो मेरे दिल नहीं_
माना तु ज़िन्दगी हैं मेरी
मगर ज़िन्दगी में मेरी हासिल नहीं_
-PRAGYA-
सब एहसास दफ़न हो गये_
जब वो पहलू में किसी के गुमराह हो गये हम ज़िंदा थे..कयामत की जूदाई आई और हम कफ़न हो गये_
-PRAGYA-
मंत्र मुग्ध हैं यशोदा देख ,
अठखेलियाँ घनश्याम की_
पाकर नंद भी उमंग से धरणी पर ,
नृत्य करते दुलार करते श्याम की_
शताब्दियाँ भी मुखरित थी अलौकिक छवि ,
देख देवों के देव देवकिनदंन की_
घटाएँ भी जमकर बरस रही थी
जैसे चाहती हो छूना काया नंदपुत्राय की_
बीत गया वो द्वापर यूग पर बिसराये ना बिसरत हैं ,
वो महा भारतीय न्यायशील का न्याय,
वो चक्र सी पलटती काया धरा की अगधाय की_
-PRAGYA-
मोड़ दे जो पाणी की लकीरें,
हैं वो गुरू ईश्वरीय वासव अद्भुत महान_
तिमिर भी मयूख हो लेखन करें,
गुरु हैं वो ग्रंथ कगार_
अस्तित्व संपूर्ण परिवर्तित कर दे,
शिष्य बने ज्ञानी हर ग्रंथ में प्रकांड_
किचड़ से कमल सा चुन ले,
हैं वो माली प्रधान_
वसुंधरा भी ऋणी हैं जिसकी,
हैं वो वत्स धरा का प्राण_
प्रकृति भी वंचित नहीं वात्सल्य से जिसके,
हैं वो तेजस्वी मान_
वह वसुंधरा पर ही नहीं व्योम पर भी हैं विख्यात,
द्वारपट खुल जाते हैं ईश्वर के,
वो गुरु हैं अद्भुत ईश्वरीय सँतान_
-PRAGYA-
लफ़्ज़ बिकते हैं इमान बिकते हैं जब बिकने पर आये तो क्या-क्या बिकते हैं ज़माने में__
एक पाक़ दिल पिन्हां सा हैं जो दुनिया की किसी दौलत से ना पिघलता हैं ना बिकता हैं गालिबन मैं मालामाल हूँ उस दौलत से__
-PRAGYA-
उसकी बेवफ़ाई पर हंसी आती हैं तो तरस भी__
अभी अन्जान हैं वो मोहब्बत से..दिवाना कुछ इस कदर हैं समझ लेता हैं वो हर पत्थर को कोहिनूर भी__
कभी मुलाक़ात ज़रूर होगी इज़हार-ए-मोहब्बत करने वाले अपनी झूठी नज़रों से हम पर क़रम ज़रूर करना_
कहीं नज़रें झुक गई फिर दिल में हमारी तमन्ना भूल कर भी मत करना_
-PRAGYA
उसकी बेवफ़ाई पर हंसी आती हैं तो तरस भी__
अभी अन्जान हैं वो मोहब्बत से..दिवाना कुछ इस कदर हैं समझ लेता हैं वो हर पत्थर को कोहिनूर भी__
कभी मुलाक़ात ज़रूर होगी इज़हार-ए-मोहब्बत करने वाले अपनी झूठी नज़रों से हम पर क़रम ज़रूर करना_
कहीं नज़रें झुक गई फिर दिल में हमारी तमन्ना भूल कर भी मत करना_
-PRAGYA
उसकी बेवफ़ाई पर हंसी आती हैं तो तरस भी__
अभी अन्जान हैं वो मोहब्बत से..दिवाना कुछ इस कदर हैं समझ लेता हैं वो हर पत्थर को कोहिनूर भी__
कभी मुलाक़ात ज़रूर होगी इज़हार-ए-मोहब्बत करने वाले अपनी झूठी नज़रों से हम पर क़रम ज़रूर करना_
कहीं नज़रें झुक गई फिर दिल में हमारी तमन्ना भूल कर भी मत करना_
-PRAGYA
ऐसा कोई लम्हा नहीं गुज़रता जब सांसों से मेरी उसकी यादें ना गुज़रती हो__
ये बात और हैं एहसासों से मेरे वो अंजान हैं मगर हालात-ए-जिस्त ये हैं की वही ज़िन्दगी हैं मेरी वही अरमान हैं-
-PRAGYA-
ज़िन्दगी की तारीख नहीं होती_
वरना हर तारीख पर फ़क़त ज़ख़्मों का हिसाब होता शाद-ए-लम्हें कहाँ खर्च हो गये कभी हिसाब ही नहीं मिलता_
-PRAGYA-
जिनके यार खुदा से हो _
उन्हें जहाँ तो क्या मौत से भी खौफ कहाँ से हो_
-PRAGYA-
ज़िन्दगी कितनी खरोंचे दोगी_?
अब तो रूह का रेशा-रेशा भी छील गया_
-PRAGYA-
दूरियों में तुझसे.. अजीब सा हाल हो गया हैं इस दिल का भी_
जैसे इक नाकाम सा बुत पड़ा हो आती जाती सड़कों पर_
-PRAGYA-
अब साँसे भी सोचकर लेती हूँ___
कहीं ख़याल तेरे महकने ना लगे
जो ख्वाब तुमने तोड़े थे
कहीं दिल फिर उसे बुनने ना लगे___
-PRAGYA
जर्रा को आफ़ताब बना दे वो नज़र मेरे दोस्त की हैं_
मैं इतनी क़ाबिल तो नहीं की इंसा के लिबास में फरिश्ता नज़र आऊं_
बना दे मुझे जो फरिश्ता वो नज़र मेरे दोस्त की हैं_
खँजर चले इस दिल पर हज़ारों मगर मुदावा ज़ख्मों का करती वो नज़र मेरे दोस्त की हैं__
मैं तेरा एहसान चूका सकूं ए दोस्त इतनी मुझमें क़ाबलियत तो नहीं_
क्यूंकि लहू का कतरा-कतरा मेरा तेरी मोहब्बत में डुबा हैं_
मुझे सुकूँ के आब्शार से भिगो देती हर शय तेरी
मुझे फिर भी जताती नहीं वो नज़र मेरे दोस्त की हैं_
-PRAGYA-
तन्हा-तन्हा बौराई सी फिरती हूँ हुज़ूम में भी_
कहकशाँ लगाती हूँ अपनी ही विरानियत में कुछ हाल-ए-बयां इश्क़ का इस तर्ज़ भी_
-PRAGYA-
चूका ना सकोगे कभी उज़रत हमारे क़ब्ल की_
दिल में शगुफ्ता सी मोहब्बत..वो कर्ज़ हैं तुम पर_
-PRAGYA-
ज़माना पुछता हैं चेहरे में गज़ब की कशीश- ए-खामोशी हैं_
कैसे कहे_? हरसू से नूर का तिरगी से भी वास्ता हैं मैं नियूश सा सुनता हूँ दिल हर वक़्त उसका शोर मचाता हैं_
-PRAGYA-
ज़माना पुछता हैं चेहरे में गज़ब की कशीश- ए-खामोशी हैं_
कैसे कहे_? हरसू से नूर का तिरगी से भी वास्ता हैं मैं नियूश सा सुनता हूँ दिल हर वक़्त उसका शोर मचाता हैं_
-PRAGYA-
जी रही हूँ..ज़िन्दगी का बोझ उठा रहीं हूँ_
मोहब्बत की सज़ा बो गये हो तुम मैं गुनाहों की फसल काट रही हूँ_
-PRAGYA-
रक़िब ना बनों उल्फ़त के खामख्वाह वस्ल की जीद से_
दुरियों में ही सही लबरेज हैं दिल मोहब्बत से क्या इतनी आराईश काफी नहीं ढलती उम्र की पीड़ से_
-PRAGYA-
शब भर यादें तिरी शबनम सी दिल को भिगोती रहीं_
दूरियाँ इस कदर दरम्यां हमारे सिमट गई की मैं छूती रहीं हर याद तिरी वो अब्तर हो बिखर गई_
-PRAGYA-
यूँ तो बीत गये कई पल बिन तेरे भी_
पर संग तेरे बीते वो अनमोल पल भुलाये नहीं भूलते_
ताजिंदगी तुझे चाहने की रज़ामंदी हैं इस दिल की_
मगर वफ़ा का तेरी मुझे यकीं के इस्बात नहीं मिलते_
यकीं करूँ तो कैसे-? लबों पर तेरे लफ़्ज़ ठहरते ही नहीं_
उन पर पाक़ सी तेरी चाहत के एहसास नहीं मिलते_
फिर तोहमत-ए-बेवफाई हम पर कैसी_?
वफ़ा ढूँढती नज़रों को तेरे निशां नहीं मिलते_
यूंँ ही मोहब्बत के मेरी तुम्हें रूह में अपनी रेशा नहीं मिलते_
-PRAGYA-
शज़र भी सुख जाते हैं बंद दरवाजों में_
हमें तो एक अरसा हो गया हैं इंतज़ार में तिरी कैद हुए_
-PRAGYA-
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