नाम है अनेक तेरे कण कण मे आप हो
देखना बस एक झलक, सांसो में आलाप हो
मैं कलंकित शंकित हूँ जरा, गंगाधर आप हो
मन से मेरे भवभय हरो, हर हर विश्वनाथ ओ।
सभी मित्रगण को सावन का प्रथम सोमवार शुभ हो।
Author: pravin
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हर हर विश्वनाथ
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अबकी होरी में
सैंया तेरे साथ खेल को लाई चुनरिया कोरी मैं
कौन रंग के साथ रंगोगे, मोहे अबकी होरी मेंजीवन मिला तोहे पाने को,कितने मौसम बीत गए
इंतजार में तेरे प्रीतम नैना मेरे भीग गए
अबकी होरी ऐसो रंग दे कोई कह न पाए मोरी मैं
तोरे रंग के साथ रंगोगे, कह दो अबकी होरी मेंदेख न तो एक बार मुझे ये चूड़ी कितनी प्यारी रे
चूड़ी क्या ये हंसी ये आंसू सब कुछ तुझ पर वारी रे
फिकर न करना सबरी टूटे अपनी इस बरजोरी में
कहो पिया तुम कैसे रंगोगे, मोहे अबकी होरी मेंतेरे विजोग में छोड़े सब रंग, बाकी एक सिंदूर सिवा
याद यही था लौटूंगा मैं, जाते समय जो तूने कहा
कैसे मैं समझाऊं पिया तोहे बस तोरी हूँ तोरी मैं
सच कहती हूँ मर जाऊंगी अलग किया जो होरी मेंऔर नही कुछ मुझको देना इतना वादा काफी है
दीपक बाती जैसे हम तुम बस दोनों ही साथी है
प्रेम लुटाती हूँ मैं तुझ पर ये प्रेम ही मेरी झोरी में
कस के मुझको गले लगा ले तू साजन और गोरी मैं -

अलविदा इक्कीस
साल गुजरता अलविदा कर ही गया।
यादों को उम्मीदों से जुदा कर ही गया।
उम्मीदें उतर आई शाम के परिंदों सी,
पर पुराना होकर भी कुछ नया सिखाकर ही गया।जीने के कुछ और पैंतरे हासिल हुए इस साल
कोरोना में जितना रोना था रुलाकर ही गया।कितनी है इक्कीस को ‘किस’ करने की वजहें
उतनी ही भुलाने की भी ये बता कर ही गया।कहीं अपनो ने अपनो को मार दिया तो कहीं,
कोई सरहद का जवान सबको बचा कर ही गया।कहीं तालिबान की सरकार बनी तो,
कही सरकारें तालिबानी बना कर ही गया।किसान और जवान छाए रहे हर क्षण,
बाकी सभी है दर्शक ये जता कर ही गया।उधार पर जी रहे थे हम, और कर लिया हमने,
फिर भी कुछ अरबपति बढ़ाकर ही गया।रोजी के लिए बच्चे उलझे, रोटी के लिए बुजुर्ग,
टीके के लिए तो घमासान कराकर ही गया।अभी जिंदा हूं फिर क्या, खिलौने सा सही,
ये मेरी जीत है एहसास दिला कर ही गया।स्वरचित रचना
प्रवीण शर्मा -
शर्माजी के अनुभव : बहू का असुराल
बात छोटी सी है, मगर मुश्किल बड़ी है,
बहू बेटी दोनों बराबर, किस अंतर से छोटी बड़ी है।
दोनों इज्जत ही तो है अपने घराने की,
जिद सी क्यों है अहम दिखाने की।
ये बात ज्यादा पुरानी नही है
पर ऐसी है मुझसे भूली जानी नही है
सफर कर रहा था बस का
बस छोटा बैग और मैं तन्हा
साथ बैठी महिला मुझसे बड़ी थी
उनकी आंखें अपने हाथ की तस्वीर पर गड़ी थी
शायद उनके छोटे परिवार की तस्वीर थी
आंखों में थे आंसू और दिल मे भारी पीर थी
अचरज तब हुआ, तस्वीर के छोटे टुकड़े कर गिरा दिए
आंसू पोंछ कर आंखों के, उनके होंठ मुस्कुरा दिए
उलझन में कितनी बाते सोच गया पल में
लगा पत्थर पड़ ही गए हो मेरी अकल में
तभी टिकट टिकट की आवाज आई
मैंने पैसे दिए तब उसे सांस आई
फिर महिला से पैसे मांगे तो उत्तर मिला, नही है
टिकट बाबू बोला भाभी बस से उतरे ये मेला नही है
मैंने झिझकते हुए कहा क्या मैं दे दूँ
महिला ने मुझे एक नजर देखा, बोली क्या कहूँ
मैंने पूछा कहाँ का लेना है टिकट
महिला ने कुछ न कहा समस्या बड़ी विकट
मैंने अपने गंतव्य का टिकट ही एक और लिया
महिला ने देखा तो उनकी ओर बढ़ा दिया
महिला ने देखकर मुझे कहा भैया शुक्रिया
शुक्रिया मत कहें बस बता दे ये क्या किया
मेरे सवाल पर महिला की नजर ठहर गई
बोली परिवार नही मेरा जिस पर आपकी नजर गई
मैं बोला फिर दर्द क्यों था आपकी आँखों मे
बोली ये फंदा था जिसे काट पाई हूँ सालों में
हो चुकी बर्बादी नही, आजादी के आंसू छलके
मेरा दर्द मेरा अपना है बस, आपसे अच्छा लगा मिलके
मैंने कहा ठीक है और ना बताये न सही
अब कोई ठिकाना है जहाँ जाना हो कहीं
बोली बाहर की दुनिया मैंने देखी कभी नही
मैं बोला आप सी हिम्मत और नही कहीं
बोली ससुराल नही असुराल में रही हूँ ना
थप्पड़ घूंसे लात ताने और कितना कुछ सही हूँ ना
हर हाल में जीने की हिम्मत में जिंदा रही
दरिंदो के बीच में परकटा परिंदा रही
मैं बरबस पूंछ बैठा क्या कोई अपना नही आपका
बोली किस्मत में कंकर लिखे तो क्या दोष बाप का
मैंने कहा चाहे तो आप मायके चली जाए
बोली दिल के मरीज की क्यो बिन कसूर जान ली जाए
बून्द को गिरना अकेले है पवन भी क्या कर सकती है
कहने के दो घर बेटी के, बस इसमें सबर कर सकती है
मैं बोला भाई कहा है, कोई मदद कर सकूं तो बताये
मैं बर्तन चूल्हा ही कर सकती हूं भैया काम दिलवाये
मुस्कुरा उठा मैं उनके साहस का कायल था
पर उनके दर्द से आज अंदर तक घायल था
पिता बिदा कर अरमानो संग भेज देता है ससुराल
कैसे दूसरा घर ही बन जाता है बेटी के लिए असुराल
सोच रहा था गलती हुई पुरुषत्व को बड़ा कहने में
डर लग रहा था उनकी जगह भी खुद को रखने में -
स्वछंद पंछी
मुक्त आकाश में उड़ते स्वछंद पंछी
आह स्वाद आ गया कहकर, वाह क्या जिंदगी
कोई मुंडेर, कोई दीवार, या कोई सरहद देश की
सब अपने परों की हद में, वाह कैसी खुशी
बसेरा रख लिया,जब चाहा छोड़ दिया
न कोई मोह, न बंदिश, वाह बेशर्त आजादी
बचपने से बुढ़ापे तक फुदकता जीवन
बिना किश्त बीमा खुशियो का, वाह क्या बेफिक्री
एक डाल पर पंछी, क्या उम्र,क्या रंग, क्या जात
कोई तोड़ने की बिसात नही, वाह सच्ची बराबरी
उड़ना सिखा कर आजाद कर दिए बच्चे
कोई वहीखाता हिसाब नही, वाह निल विरासती
हे प्रभु तू बांध लें खुद से, पर यहाँ से आजाद कर दे
इंसान बनकर क्या किया, बेहतर है पंछी की जिंदगीप्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना -
शर्माजी के अनुभव : मातृत्व
ढलता अंधेरा और काली सी महिला
बाजार किनारे खड़ी, हाथों में थैला
अजनवी थी मगर कुछ अलग था चेहरे में
जैसे खुशी खड़ी हो उदासी के पहरे में
बढ़ने लगा तो आवाज आई
कहाँ तक जा रहे हो भाई
मुड़कर कहा आपको कहाँ जाना है
मेरा तो गोविंद नगर में ठिकाना है
बोली मेरी मदद कर दीजिये
बड़ी कृपा होगी साथ ले लीजिये
मैंने कहा बैठिये, कृपा की कोई बात नही
वैसे भी आज खाली है बाइक, कोई साथ नही
लेकर उसको चल दिया, हम चुप ही रहे
वैसे भी कुछ नया नही था, कोई क्या कहे
कुछ देर बाद शुक्रिया कर उतर गई वो
आगे जाकर जेब टटोली कुछ ख़रीदने को
चौंक गया मैं, कटी जेब मे पैसे नही थे
पूछता था दुकानदार लाये भी थे, या नही थे
आज पहली बार मुझे मदद पर पछतावा हुआ
बड़ा नुकसान नही था चलो जो हुआ सो हुआ
गुजरता गया वक़्त मैं अब हर किसी को बताता
नेकी मत करो देखो, मुझको बुरी दुनिया का पता था
एक दिन फिर वही हुआ, जो हो चुका था पहले
मेरी पहचान ना कर पाई वो, था “हेलमेट” पहने
फिर वैसे ही ले जाकर उतार दिया उसको
मेरा गुस्सा ले गया लग लिया उसके पीछे को
कुछ दूर जाकर झोपड़ी में घुस गई चलते चलते
सच ही है चोरों के महल नही चुना करते
मैं भी झोपड़ी में चल दिया कुछ कर गुजरने को
मैं रह गया अवाक, देख मुझे चौंक गई वो
बच्चे को चम्मच से दूध पिला रही थी
मैं देख रहा बच्चा, वो मुझे देख रही थी
पूछा बाबू साहब, आपको क्या चाहिए
मैंने भी कह दिया, चोरी का हिसाब लाइये
सकपकाकर पैर पकड़, वो रो दी ऐसे
एक माँ नही हो, कोई बच्ची हो जैसे
मैंने कहा काम करो, हाथ पैर साबित है
बच्चे को भी चोर बनाओगी या तेरी आदत है
महिला ने कहा मैं चोर नही बाबू साहब
बताती हूँ मेरे साथ जो हुआ है सब
ये बच्चा मेरा नही, ये सहेली का है
मुझको समझ नही आया ये पहेली क्या है
आगे बोली सहेली तो मर गई बैसे
आखिर बलात्कार झेलकर जीती कैसे
बस तब से इसे पाल रही हूँ जैसे तैसे
काम पर जाने से डरती हूँ, कही मर न जाऊँ सहेली जैसे
इसीलिए ही मैं चोरी भी करती हूँ
बिन ब्याही माँ हूँ न, दुनिया से डरती हूँ
आंसू नही रोक पाया मैं ये हाल देखकर
माँ आखिर माँ होती है, कैसी भी हो रो दिया कहकर -
क्या इतना बुरा हो गया हूं मैं
देखकर मुस्कुराते भी नही
क्या इतना बुरा हो गया हूं मैं
हर बार आप-आप कहती हो
सच्ची, इतना बड़ा हो गया हूं मैं
बचपन मे तो छोटी रजाई इतनी लंबी बातें थी तेरी
अपने पैरों पर खड़े होने से तन्हा सा हो गया हूं मैंरश्क खाते थे दोस्त मेरे
जब हम साथ चलते थे
कितने अच्छे थे दिन
तेरे गम मेरी खुशी से गले मिलते थे
अब तेरी चुप्पी मेरे दिल में चीखती चिल्लाती है
कभी क्या था तेरे लिए, अब क्या हो गया हूँ मैंकभी दो पल बैठ जा, इल्तजा है
इतनी दूरी, ऐसी क्या वजह है
तेरे चेहरे पर जिसने पहले की रंगत देखी हो
उसको बेनूर देख कर, कितनी बार मर गया हूं मैंमाना मैं तेरा सगा नही कोई
पर सच मान दिल मे दगा नही कोई
ले मेरा सर झुका है तेरे आगे, थाम ले या काट दे
मैं तेरा दोस्त नही फिर, जो उफ भी कर गया हूँ मैंए खुदा, किसी को ऐसा बचपन न दे
बचपन दे तो ऐसी दोस्त ना दे
दोस्त दे तो फिर छूटने की वजह न दे
वजह दे तो फिर जिंदगी ना दे
मैंने जिस की खुशी के लिए, जिंदगी उधार की तुझसे
क्यों उसकी एक हंसी के लिए तरस गया हूं मैंप्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित -
अभी जवान हूँ भोले
जीन्स पहनी शर्ट घौंसी
जिस्म नहला लिया इत्र से
आईने में देखा मुस्कुराहट ने कहा
अभी जवान हूँ भोले, किसी से कम हैं केबाहर आये तो लगा अब कुछ होगा
जमाना बहुत पीछे रह गया होगा
निगाह सब पर फिराई नापा तोला
अपनी तोंद देखी काश कहीं से कम हो सकेकुछ आज गए कुछ कल कुछ पहले ही कम थे
हाय मेरे रेशमी बाल, मेरे हाथों के सनम थे
सोचा कई बार झूठे बालों का सहारा ले लें पर फिर
बिल्कुल नही करेंगे, जाने दो बेबफा सनम थेबड़े शर्मीले थे शर्माजी हम अपने लड़कपन में
झुरझुरी छूट जाती थी, कोई गुजरी, तो बदन में
उम्र बढ़ती गई मेरी खामियों के साथ साथ ऐसे
गया सब जैसे खुशफहमी नही हो, मेरे वहम थेखैर चलो जो हुआ अच्छा हुआ, रहमत तेरी
लाख कमियां है पर खुशियां भी कितनी दी, नेमत तेरी
किसी को पसंद नही तो भी मैं पहली पसंद हूँ अपनी
क्या चौदह सितम होंगे मेरी चार खुशियों से बढ़ केप्रवीनशर्मा
मौलिक स्वरचित रचना -
मेरे बाबू जी
जिनके बिना मेरा नाम अधूरा
जिनके साथ मेरा परिवार पूरावो छत है बाकी सब दीवारें है
एक उन्होंने पूरे घर के सपने सँवारे हैवो माँ से कम दिखते है घर मे
कितना कुछ कह देते है छोटी छोटी बातों मेंउनके हाथों से बहुत मार खाई है
सख्ती में भी उनके प्यार की मिठाई हैबहन को इतना ज्यादा प्यार जताते है
इसी तरह नारी की इज्जत करना सिखाते हैकुछ पैसो को देने के लिये कितना टहलाते है
दुनिया मे पैसो की अहमियत इसी तरह बताते हैउन्हें कुछ पता नही होता, पूछते है शाम को माँ से
फिर भी बचा लेते है, इस काटो भरे जहाँ सेऔर कुछ नही बस कहना इतना है
मुझे बड़े होकर बस उनके जैसा बनना हैप्रवीन शर्मा
मौलिक स्वरचित -
प्रेम किया नही हुआ
सती और शिव संबाद प्रथम मिलन पर
माना तुमने मुझसे प्रेम किया
प्रेम ने मेरा भी मन छू लियाएक फ़क़ीर हूँ मैं, जानती हो ना
तुम्हारा क्या भविष्य हुआ
मेरे साथ बस धुआं ही धुआंमैं वन का घुमक्कड़ साधू
मेरे पास कुछ नही ,तुम्हे क्या दूँतुम दक्षसुता हो, मानती हो ना
फिर भी कैसा भूत सवार किया
क्या कोई सोच विचार कियामुझे सुख और दुख माटी के समान
मेरे पग में कंकर को पुष्पो का मानक्या श्रृंगार हृदय से बैराग्य चाहती हो ना
जाओ सब भूलकर, अब तक जो किया सो किया
भूल जाना कभी तुमने किसी से प्रेम कियाहे नाथ, आप का आदेश सर माथे
मैं लौट जाउंगी, अपना मत बता केविरक्ति का विधान चाहते है ना
मैं भूल जाउंगी, अब तक जो हुआ सो हुआ
सिवा इसके की मुझे आपसे प्रेम हुआमैंने दिन नही क्षण जिये है आपके लिए
मैं प्यासी भटक रही हूँ, एक बूंद प्रेम का पियेसमस्या का समाधान चाहते है ना
मैं समस्या नही हूँ, संगिनी रहूंगी
राग आपका अन्यथा बैरागनी रहूंगीमाना आप अंतहीन हो बिश्वेस्वर
प्रेम मेरी स्वांस है नही कोई ज्वरकितने त्याग किये अब एक और चाहते है ना
ऐश्वर्य, महल, परिवार सब तज दिए
प्रेम परीक्षा के लिए सब व्रत लिएबस यही तक आप मेरे थे, दुख नही
पर मैं आपकी रहूंगी सदा सत्य यहीमैं सती हूँ सती, अगर मेरे प्रेम में सत है ना
तो अब मैं नही आप कहोगे प्रेम से प्रेम हुआ
क्योंकि मैंने प्रेम किया नही आपसे प्रेम हुआप्रवीन शर्मा
मौलिक स्वरचित रचना -
जब तक मैं कंवारा था
जब तक मैं कंवारा था
मजाक और झूठ का अंतर नही समझ पाया
अब जानता हूँ सच तो लोग खुद से भी नही बोल पातेजब तक मैं कंवारा था
किसी को दर्द में देख उदास हो जाता था
अब देखता हूं तेहरवीं का जश्न तो छटी से बड़ा होता हैजब तक मैं कंवारा था
मानता था मुझे कोई दर्द नही, मेरी माँ है तो
अब जानता हूँ कुछ दर्द किसी को बताए तक नही जातेजब तक मैं कंवारा था
लगता था पापा कुछ भी ला सकते है,मेरी खुशी के लिये
अब लगता है बच्चों की खुशी की कीमत जिंदगी के बीस साल होती हैजब तक मैं कंवारा था
आंखों में हूरों के सपने तैरते थे
अब पहचान हुई उनके चेहरों के पीछे कितनी कालिख पुती होती हैजब तक मैं कंवारा था
मुझे बताया गया एक नौकरी और एक पत्नी काफी है
अब बताने से भी कतराता हूँ शर्माजी, वो सब एक गलतफहमी होती हैजब तक मैं कुंवारा था
मुझे कुंवारेपन से चिढ़ सी होती थी
अब चाहता हूँ ताउम्र उसी में गुजरती तो अच्छा होता -
कहते मेरे है
एक छत है मगर
अलग अलग कमरे है
कही गम कही खुशी कही बेखबरी
सभी अलग अलग चेहरे है
कोई नही जानता रात किसकी कैसी थी
कही हल्के कही गहरे काले घेरे है
उसकी इजाजत से उस तक जाना मुश्किल है जरा
अलग दुनिया है अलग अलग पहरे है
घरौंदे होते थे कभी, अब बस मकान होते है
पसंद का रंग भी नही जानते, कहते मेरे हैं -
बहना की पाती
प्रिय भैया
लिवा ले जाओ न आकर
तुम्हारी याद आती है
यहाँ खुश हूं बहुत लेकिन
मुझे खुशियां रुलाती है
जबसे आई हूं रोती हु कमरा बंद कर करके
कोई आता है तो होंठो में सिसकी सिल जाती है
पूरा दिन झोंक देती हूं चूल्हे की आग में लेकिन
क्या करूँ अम्मा मेरे सपने में आती है
याद नही आता यहाँ कब किस्से रूठी थी
मेरी चूड़ियां मनाती है पायल समझाती है
कन्यादान हो आई यहाँ अपने बनाने को
तेरी तस्वीर ही भैया मुझे अपना बताती है
यहाँ सब अच्छे है लेकिन कोई बात है ऐसी
अपना होने में और बनने में अंतर जताती है
अम्मा ने कहा था आते समय भैया को भेजूंगी
क्या बिगाड़ा था उनका हाय मुझको भुलाती है
चाहिये कुछ नही मुझको मैं जल्दी लौट जाऊंगी
एक बार लिवाने आओ न मुझे यादे बहुत रुलाती हैतुम्हारी अपनी बहन
प्रवीन शर्मा
मौलिक स्वरचित रचना -
स्लो जनरेशन का अज्ञानी
इन घड़ी वालों के पास वक़्त कहाँ है
इनकी बातों में वो बात अब कहाँ है
जिंदगी आसान करने के फंडे ढूंढते ढूंढते
छप्पर तो अभी भी है, उठवाने वाले हाथ कहाँ है।इस अंधी दौड़ में, पर्दे में है सबकी आंखे
किसी छप्पर फटने के इंतजार में सबकी बाहें
दूरी कम करने में कमर कस के लगे है मगर
पास रहने वालों के भी पास आते कहाँ है।जन्मदिन याद रखने को ‘कलैंडर’ ढूंढते है
लोरी अब बच्चे ‘मोबाइल’ पर सुनते है
जमाना बदल गया साहब फिक्र मत करिए
दोस्ती के लिए ‘राइट स्वाइप’ है ‘राइट चॉइस’ कहाँ है।पिछली ‘जनरेशन’ ‘स्लो’ थी,अब ‘लवली ग्लो’ है
बताया था याद नही रहा, प्यार कितने रुपये किलो है
‘फिगर कॉन्शियस’ माएँ अब दूध डब्बे का लाती है
बच्चों की गर्लफ्रेंड रूठी है ‘कॉकटेल’ में, बचपन कहाँ है।खैर अच्छा हुआ मैं बूढ़ा हो लिया जल्दी
अनसुना करो, इन बातों में अब कोई ज्ञान कहाँ है। -
ज़ौक में
अब आ ही गए हो तुम तो
दुश्मन की जरूरत ना रहेगी
बैठे बैठे बहुत वक़्त गुजर गया
लगता है अब फुरसत ना रहेगी
नाम तुम्हारा भी सुना था बड़ा
देखने की हसरत अधूरी ना रहेगी
हमसे मिलना तभी जब बड़े गुस्से में हो
जौक में मिल गए तो दुश्मनी की आदत न रहेगीजौक:मजे