rajesh arman, Author at Saavan - Page 2 of 52's Posts

कुछ तो बदले हम

कुछ तो बदले हम

कुछ तो बदले हम , कुछ बदल गई फ़िज़ा भी कुछ तो हैरा है चमन और कुछ खिजाँ भी अपने चेहरे का गांव कब तब्दील हुआ शहर में कुछ तो मज़बूरियां थी मगर और कुछ रजा भी राजेश’अरमान’ »

ज़ेहन में बैठे

ज़ेहन में बैठे

ज़ेहन में बैठे कई अफ़सोस है बोलते सन्नाटे जुबां खामोश है अब वज़ूद कछुए का मिट गया बाज़ी जीतता सोता खरगोश है राजेश’अरमान’ »

वो न बदल सका

वो न बदल सका पर मुझे बदल गया मुझे भी न बदलने का हुनर आ गया राजेश’अरमान’ »

हाथ की रेखाओं को

हाथ की रेखाओं को क्यों बदनाम करते हो खुद ही हर सुबह को क्यों शाम करते हो पशेमाँ होके न बैठेगा ये बेदर्द जमाना आप बेवजह बैठे क्यों जाम भरते हो किसको फुर्सत जो देखे चाकजीगर शिकायत फिर क्यों खुलेआम करते हो हर फ़तेह तेरा खुद का मुक़द्दर हर शिकस्त मेरे क्यों नाम करते हो जब कोई मरासिम नहीं रहा फिर दूर से देख के क्यों सलाम करते हो राजेश’अरमान’ »

धुँधले आईने से

धुँधले आईने से कोई अक्स निकल नहीं पाता वक़्त की सुइयाँ पकड़ने से वक़्त बदल नहीं जाता वो मोम सा बना रहता , कोई पत्थर नहीं था क्या हुआ शख्स वो अब पिघल नहीं पाता वो कहता रहा रिश्तों को परतों में रहने दो कुरेदने से कोई रिश्तों का सच बदल नहीं जाता उसकी हसरत महफूज रहूँ हाथों की लकीरों में जिन लकीरों को कभी वक़्त बदल नहीं पाता कितने देखे है ज़माने कितने लड़खड़ाते कदम जान कर सब फिर वो क्यों संभल नहीं पाता कौन दे... »

सब अच्छे बुरे का

सब अच्छे बुरे का मैं दोषी नहीं सब कुछ तय है फिर मेरे होने का मुझे ही क्यों हर पल भय है/ मैं फिर क्यों इस चक्र के चलने रूकने का भागी हूँ आत्मा शरीर के इस खेल में क्या मैं त्यागी हूँ / नहीं होता मैं तो क्या कुछ अंश अंश से न्यून हो जाते / जब तुम मुझमे हो तो क्या मेरे अंश कभी शुन्य हो जाते / हर छन मेरे होने और न होने का बोध साथ रहता है अहंकार, मोह माया वासना और क्रोध साथ रहता है / आप सतगुणो के स्वामी ... »

कुछ तो शोलों

कुछ तो शोलों को भी खबर थी एक दुनिया थी जो बेखबर थी कुछ चिंगारिया दबी थी कोने में ये गुजरती हवाओं को भी खबर थी राजेश’अरमान’ »

इन काँटों को

इन काँटों को फूलों से अलग न करना इनमे दबे है कुछ एहसास मुरझाए राजेश’अरमान’ »

गांठ बंधे रिश्तों में

गांठ बंधे रिश्तों में एहसास क्यों ढूँढ़ते हो सेहरा की रेत में प्यास क्यों ढूँढ़ते हो हर शख्स कुछ न कुछ दे ही गया ज़ख्म ऐसे माहौल में तुम कोई खास क्यों ढूँढ़ते हो वहां साथ रहते भी कौन कितने करीब थे ऐसे हालात में फिर वनवास क्यों ढूँढ़ते हो हर तरफ जब पतझड़ सा ही आलम है तारीखे क्यों गिनते हो फिर मास क्यों ढूँढ़ते हो अपने ही घर में अपना वज़ूद अजनबी सा किसी राह की तलाश में संन्यास क्यों ढूँढ़ते हो राजेश’अर... »

दुनिया की रस्मों

दुनिया की रस्मों में इन्सां कहाँ मगर गया वो शहर की रौनक में कौन भर जहर गया अब भी बैठे ही उन लम्हों की चादर ओढ़कर वो भी एक दौर था वक़्त के साथ गुजर गया कल भी उस बात को छूं गया एक नया झोका वो तेरी बात थी वो इस बात से मुकर गया जो बनाए थे उसूल हमने बेहतरी के जानिब तोड़ कर सब वो जाने क्यों बिखर गया जाने कब आ जाये फिर वही मौसम पुराने बस यही सोचते वो न जाने फिर किधर गया राजेश’अरमान’ »

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