इन काँटों को फूलों से अलग न करना
इनमे दबे है कुछ एहसास मुरझाए
राजेश’अरमान’
Author: rajesh arman
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इन काँटों को
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गांठ बंधे रिश्तों में
गांठ बंधे रिश्तों में एहसास क्यों ढूँढ़ते हो
सेहरा की रेत में प्यास क्यों ढूँढ़ते होहर शख्स कुछ न कुछ दे ही गया ज़ख्म
ऐसे माहौल में तुम कोई खास क्यों ढूँढ़ते होवहां साथ रहते भी कौन कितने करीब थे
ऐसे हालात में फिर वनवास क्यों ढूँढ़ते होहर तरफ जब पतझड़ सा ही आलम है
तारीखे क्यों गिनते हो फिर मास क्यों ढूँढ़ते होअपने ही घर में अपना वज़ूद अजनबी सा
किसी राह की तलाश में संन्यास क्यों ढूँढ़ते होराजेश’अरमान’
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दुनिया की रस्मों
दुनिया की रस्मों में इन्सां कहाँ मगर गया
वो शहर की रौनक में कौन भर जहर गयाअब भी बैठे ही उन लम्हों की चादर ओढ़कर
वो भी एक दौर था वक़्त के साथ गुजर गयाकल भी उस बात को छूं गया एक नया झोका
वो तेरी बात थी वो इस बात से मुकर गयाजो बनाए थे उसूल हमने बेहतरी के जानिब
तोड़ कर सब वो जाने क्यों बिखर गयाजाने कब आ जाये फिर वही मौसम पुराने
बस यही सोचते वो न जाने फिर किधर गयाराजेश’अरमान’
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बदलते रहे वही
बदलते रहे वही नज़रें बार-बार
हमने तो बस अपना चश्मा बदलाराजेश’अरमान”
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कितना होता है गुरूर
कितना होता है गुरूर इंसान को
ये करता अपनों से दूर इंसान कोजिसको देखो वही मद में चूर है
वक़्त देता सबक जरूर इंसान कोराजेश’अरमान’
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इतना भी मुश्किल
इतना भी मुश्किल तो न था
मुश्किल कहने में जो देर लगी
राजेश’अरमान’ -
लो फिर
लो फिर मौसम बदला
फिर तेरी याद आई
राजेश’अरमान’ -
खुद से अंजान
खुद से अंजान आदमी
पूछता जनाब आप कौन
राजेश’अरमान’ -
अब तो धब्बों
अब तो धब्बों की भी नुमाइश होती है
बस चर्चे में रहने की खवाइश होती हैज़िक्र उसका भला क्यों करता जमाना
यहाँ तो सुर्खिओं की परस्तिश होती है
राजेश’अरमान’ -
दुनिया की रस्मों
दुनिया की रस्मों में इन्सां कहाँ मगर गया
वो शहर की रौनक में कौन भर जहर गयाअब भी बैठे ही उन लम्हों की चादर ओढ़कर
वो भी एक दौर था वक़्त के साथ गुजर गयाकल भी उस बात को छूं गया एक नया झोका
वो तेरी बात थी वो इस बात से मुकर गयाजो बनाए थे उसूल हमने बेहतरी के जानिब
तोड़ कर सब वो जाने क्यों बिखर गयाजाने कब आ जाये फिर वही मौसम पुराने
बस यही सोचते वो न जाने फिर किधर गयाराजेश’अरमान’
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उसके जाने आने के
उसके जाने आने के दरम्यां छुपी सदियाँ थी
कुछ था पतझड़ सा तो कुछ हरी वादियां थीउसकी ख़ामोशी में दबी दबी सी बैठी थी
उसकी आँखों में कुछ बोलती चिंगारियां थीलिपटी है बदन से किसी पैरहन की तरह
वो तेरी यादों की बस पुरवाइयाँ थीकोई आहट नहीं मगर कुछ तो जरूर था
तू न सहीं मगर तेरी परछाइयाँ थीचाक जिगर के कोई सिता भी कैसे
अपनी आँखों में कुछ ऐसी रुस्वाइयां थी
राजेश’अरमान’ -
खार भी रखते
खार भी रखते पर आँखों में बसे फूल भी है
सादगी की मिसाल पर चेहरे में पड़े शूल भी हैवो बदलते रहे कुछ ज़माने ज्यादा मेरे वास्ते
नए अंदाज़ भी है कुछ पुराने से उसूल भी हैवो निहारते है बैठ अब भी बचपन को
जिसमे जमके बैठी कुछ पुरानी धूल भी हैउम्र भर लड़ते देखा बस खुद से उनको
पैरों में ज़ंजीर पर हाथों में त्रिशूल भी हैवो मेरे सब कुछ जाना जब दुनिया देखी
मेरी किताबें भी है वो मेरा स्कूल भी हैराजेश’अरमान’
समस्त पिताओं को समर्पित -
खार भी रखता
खार भी रखता पर आँखों में बसे फूल भी है
सादगी की मिसाल पर चेहरे में पड़े शूल भी हैवो बदलते रहे कुछ ज़माने ज्यादा मेरे वास्ते
नए अंदाज़ भी है कुछ पुराने से उसूल भी हैवो निहारते है बैठ अब भी बचपन को
जिसमे जमके बैठी कुछ पुरानी धूल भी हैउम्र भर लड़ते देखा बस खुद से उनको
पैरों में ज़ंजीर पर हाथों में त्रिशूल भी हैवो मेरे सब कुछ जाना जब दुनिया देखी
मेरी किताबें भी है वो मेरा स्कूल भी हैराजेश’अरमान’
समस्त पिताओं को समर्पित -

मुझ से उकता
मुझ से उकता कर
खिड़की से भाग गई
वो शाम जो साथ थी मेरे
ले आई पकड़ एक रात
और खुद छुप कर भाग गई
रात सिरहाने पे बैठी रही
रात भर देती रहे ताने
कुछ मेरे अपने से कुछ अनजाने
गुफ्तगू करती रही मुझसे
कुछ मेरे ही अंदर के पुराने
न सहर की कोई बात न नई सौगात
वही रात की कहानी वही रात की बात
राजेश’अरमान’ -

कुछ ख्वाब कुछ अफ़साने
कुछ ख्वाब कुछ अफ़साने
वही लोग आये कुछ सुनानेअपनी अपनी वीरानी सब की
देखने आये वो तेरे कुछ वीरानेदेखने आये वो फिर ज़ख्म तेरे
कहते आये तेरे ज़ख्म कुछ सहलानेवो भी उकता गए ग़मे ज़िंदगी से
जो आते थे कभी दिल कुछ बहलानेसबके अपने वही ख़ज़ाने है
कुछ नए है और वही कुछ पुरानेराजेश’अरमान’
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वो फुरसतों के काफिले
वो फुरसतों के काफिले
वो रोज़ मिलने के सिलसिलेवो शहर कहाँ खो गया
जहाँ पास रहते थे फासलेकुछ तो हुआ अजीब सा
खो गए रास्ते ग़ुम है मंज़िलेंहर निगाह में जूनून सा
हर आँख में है अब वलवलेकौन क़ातिल है वफाओं का
क्यों सोचता है दिलजले
राजेश’अरमान’ -
सुरमा लगाया था आँखों
सुरमा लगाया था आँखों में जिसका
नज़रें मिलते ही खफा हो गए -
रिश्ते तो अब बौने हो गए है
रिश्ते तो अब बौने हो गए है
ख्वाब तो बस बिछोने हो गए है -
नवाजिश नवाज़िश जेहन में रहा
नवाजिश नवाज़िश जेहन में रहा
वो दूर निकल गए अदावत लेकर -
जुम्बिश न सही खलिश ही सही
जुम्बिश न सही खलिश ही सही
तुझे भूलने की कोशिश ही सही
वो पा न सके जुस्तजू जो थी
कुछ नहीं , इक खवाइश ही सही
राजेश’अरमान’ -
लिखे जो भी तराने वो तेरे लिए थे
लिखे जो भी तराने वो तेरे लिए थे
तुमने उसे रेत पे लिखा समझा -
किधर से आया वो मालूम नहीं
किधर से आया वो मालूम नहीं
अँधेरे में ही कोई आवागमन था -
पत्थर के बुतों में बस ढूँढ़ते रहे
पत्थर के बुतों में बस ढूँढ़ते रहे
अपने अंदर के ख़ुदा को पत्थर करके -
बंदिशें तोड़ के रख दी
बंदिशें तोड़ के रख दी
पिंजरे में रहते रहते -
काफिर ही सही
काफिर ही सही
मुसाफिर ही सही
वक़्त का खिलौना
हाज़िर ही सही -
तिनके बटोर बनाया आशियाना
तिनके बटोर बनाया आशियाना
बर्क ने फिर गिराया आशियाना
मेरे हाथों से लिपटी फिर रेखाएं
रेखाओं ने फिर बनाया आशियाना
राजेश’अरमान’ -
ख्वाइशों की उम्र नहीं होती
ख्वाइशों की उम्र नहीं होती
कमबख्त अजर अमर होती है -
अपने ख़्वाबों के लिए
अपने ख़्वाबों के लिए कोई रात रखना
अपने हिस्से की खुद से मुलाकात रखना
मौसम चाहे जैसा बदले जब बदले
अपने ही अंदर कोई बरसात रखना
राजेश’अरमान’ -
मृगतृष्णा
मेरी खोज
मृगतृष्णा
तेरी वफ़ाएं
मृगतृष्णा
सारा जीवन
मृगतृष्णा -
वो फिर मिलेंगे
वो फिर मिलेंगे
फूल फिर खिलेंगे
कुछ हादसें होंगे
कुछ फासले होंगे
कमबख्त वफ़ा
ताउम्र इम्तहान देती रही
राजेश’अरमान’ -
बर्क को नशेमन से क्या आश्ना
बर्क को नशेमन से क्या आश्ना
आवाज़ कब देख सकी जलते आशियाने
राजेश’अरमान’ -
रिश्तों में कोई फासला सा रखना
रिश्तों में कोई फासला सा रखना
तूफानों में हौसला सा रखना
अपने ही घर में चाहे जितने कमरे हो
अपने लिए इक घोसला सा रखना
राजेश’अरमान’ -
किसी रंजिश से दो चार नहीं
किसी रंजिश से दो चार नहीं
लोग जुगनुओं का भी फ्यूज ढूँढ़ते है -
वक़्त का तमाचा
वक़्त का तमाचा
हाथ क्या पूछे -
वज़ूद तेरा बूँद सा
वज़ूद तेरा बूँद सा
शामिल है मगर समुंदर में -
गिर के संभले तो मगर
गिर के संभले तो मगर
संभले मगर गिर गिर के -
बगैर दुनिया के हम नहीं है
बगैर दुनिया के हम नहीं है
दुनिया कौन सा अकेले चलती है -
फिर वहीँ फ़रियाद
फिर वहीँ फ़रियाद
कौन रखेगा याद
सिरहाने बैठी रही
सिसकियाँ अपनी आबाद -
बिन तेरे कमीं तो थी
बिन तेरे कमीं तो थी
आँख में कुछ नमी तो थी
युँ तो सांसें चलती रही मगर
सांस कुछ देर को धमी तो थी -
किसकी हसरत कैसी हसरत
किसकी हसरत कैसी हसरत
अपने तो दुखों को मिली बरकत
उसे गुनाहगार कैसे कह दो
सब थी अपनी ही वैसी हरकत -
जिल्द बिन किताब का
जिल्द बिन किताब का
फूल बिन हिज़ाब का
रातों का नहीं
ख्वाब हूँ आफताब का -
न सही गम सही
न सही गम सही
खुद बन मरहम सही -
सीने में दबे अरमान
सीने में दबे अरमान
आँखों में झलक जाते है
आँखों में छुपे अरमान
ख्वाब बनके ढलक जाते है -
घर से निकलोगे तो जानोगे
घर से निकलोगे तो जानोगे
चांदनी का वज़ूद क्या है -
कहीं पर लब मचल गए
कहीं पर लब मचल गए
कही मतलब मचल गए
इंसा की हसरतों का क्या
जब देखो तब मचल गए
राजेश ‘अरमान’ -
कोई पीर न था
कोई पीर न था
कोई राहगीर न था
बहता हुआ नीर न था
ज़िंदगी का फ़क़ीर न था
बस कुछ ढूंढती है आँखें
ज़माने की कोई तस्वीर न था -
माना वो सिकन्दर था
माना वो सिकन्दर था
उसका भी मुक़द्दर था
हमने अपने हाथों से उजाड़ा
कुछ अपने भी तो अंदर था -
मत रोको आंसुओं को
मत रोको आंसुओं को
कहीं बहता पानी रोक जाता है -
ज़ख्म को गिनते क्यों हो
ज़ख्म को गिनते क्यों हो
गोया अब इन्तहा हो गई हो -
कौन पी सका समुंदर को
कौन पी सका समुंदर को
लहरे ही दर्द सहती है