कुछ गहने मैंने देखे सपनों ने पहने
कुछ गहने मैंने देखे सपनों ने पहने
अपनी हर लिबास रखना संभाल कब कैसी जरूरत आ जाएँ
अंदर जिस्म में बैठा मुझ जैसा मेरा दुश्मन
कितना गहरा रिश्तों से समुंदर में सहरा
न तुम बदले न मैं बदला वक़्त बदलते दोनों ने देखा सिलसिले बस युँ ही चलते रहे फासलों को बदलते हमने देखा राजेश’अरमान’
न हो गर हमनवां कोई बात नहीं गर हो तो कोई बात जरूर हो
हर राह पर कारवां तो मिला मंज़िलों का ठिकाना न मिला
तेरी आँखों में जब भी देखा कोई ख्वाब सा दबा देखा
जुस्तजू इलज़ाम बन गई जुस्तजू जो खुद को खोने की थी
कोई किनारा निकला किनारे से लहरें मचलना भूल गई
ढेर पे राख के जुस्तजू जीस्त की मौत मिली जीस्त में
सूनी डगर पंछी उड़ते सूना सा सफर
कोई ख्वाब कही से डूबता आफताब
रेत का घरोंदा वक़्त ने बनाया वक़्त ने रौंदा
बिलखते मन तपते तन सुलगते जीवन
एक प्रश्नचिन्ह जीवन मौत प्रश्नचिन्ह चिंतन किस का ?
रहबर वो मेरे थे मगर मंज़िल से मगर अंजान थे
लो फिर तस्सलिओं का मौसम है अपने लिबास को बदल डालो
कोई साया भी न लिपटा ऐसे जैसे लिपटी तेरी तन्हाई
तेरे गम की क्या उम्र रही दुआओं ने उम्र बख्शी हो जैसे
जुर्म करने की आदत कुछ ऐसी थी खुद की सजा पर किताब लिख रख दी
कारवां से हुआ जब इश्क़ मंज़िलें नापाक लगी
तेरे सज़दे किये कुछ ऐसे हर ज़ुल्म का इक़बाल किया
लम्हे टूटे बिखरे से जोड़ती मगर ज़िंदगी को
कोई ऐसा चारागर होता जो कहने को सहर होता
चुप सी बंधी ख़ामोशी राज़ छुपाएँ चीखों के
एक दस्तक पहचानी सी गूँज गई सन्नाटे में
खामोश पन्नो में लिखी दास्तां बिखरी चीख के साथ
कहीं से आती है सदा जहाँ आवाज़ ने दम तोडा
गर्म पैरहन में लिपटे चांदनी से ख्वाब
ज़िंदगी एक तमाशा वक़्त एक मदारी
उसकी हसरतें टूटे खिलौनों सी ताउम्र उजरी कुछ बचपन सी
चलो उस बीज की तलाश में पौध जिससे कोई नया उगे
वक़्त लिखता रहा कागज़ पे हम उसे मोड़ के बैठे रहे
पिघले ख्वाब पिघले ही रहे वक़्त कुछ गर्म रहा ऐसा
मैं जानता था सच तेरी खातिर अजनबी रहा
कभी तो मौसमों सा न बदलों हर मौसम में फिर लिबास बदलना पड़ता है
कल भी तन्हाई कुछ ऐसी थी लफ्जों में कोई फासला न था
कल फिर आएगा कल कल फिर निकल जायेगा कल राजेश’अरमान’
खुद भी कभी दिखाई न दिए आईने का खौफ ही कुछ ऐसा था राजेश’अरमान’
थक के सो गए तारे भी मेरी नींद को इंतज़ार ही कुछ ऐसा था राजेश’अरमान’
न वक़्त बेवफा न ज़माना बस फासलों ने वफ़ा न की राजेश’अरमान’
तेरी उल्फत से वाकिफ था मगर लुत्फ़ बेवफाई का उठाने निकला राजेश’अरमान’
उसने ख़ामोशी को भी चीखते देखा रंजिश हुई जब क़ल्ब के शोर से राजेश’अरमान’
मेरी कलम में तो कोई बात न थी तेरे तजुर्बों ने मुझे कलमकार बना दिया राजेश’अरमान’
वफायें कब हुई किसी को हासिल महज एक लफ्ज है उम्मीदों के आसपास राजेश’अरमान’
समुन्दर में भी प्यासा ही रहा ज्यों ख्वाब सेहरा में देखा समुन्दर का राजेश’अरमान’
किसी रंजिश से क्या हासिल ज़माने को जानते सब फिर भी मसखरी करते है राजेश’अरमान’
कोई तो फर्क नज़र आता है जब अंधेरों में जुगनू जगमगाता है राजेश’अरमान’
चमन से हासिल वही होता है जो माली के लिए सही होता है राजेश’अरमान’
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