rajesh arman, Author at Saavan - Page 3 of 52's Posts

बदलते रहे वही

बदलते रहे वही नज़रें बार-बार हमने तो बस अपना चश्मा बदला राजेश’अरमान” »

कितना होता है गुरूर

कितना होता है गुरूर इंसान को ये करता अपनों से दूर इंसान को जिसको देखो वही मद में चूर है वक़्त देता सबक जरूर इंसान को राजेश’अरमान’ »

इतना भी मुश्किल

इतना भी मुश्किल तो न था मुश्किल कहने में जो देर लगी राजेश’अरमान’ »

लो फिर

लो फिर मौसम बदला फिर तेरी याद आई राजेश’अरमान’ »

खुद से अंजान

खुद से अंजान आदमी पूछता जनाब आप कौन राजेश’अरमान’ »

अब तो धब्बों

अब तो धब्बों की भी नुमाइश होती है बस चर्चे में रहने की खवाइश होती है ज़िक्र उसका भला क्यों करता जमाना यहाँ तो सुर्खिओं की परस्तिश होती है राजेश’अरमान’ »

दुनिया की रस्मों

दुनिया की रस्मों में इन्सां कहाँ मगर गया वो शहर की रौनक में कौन भर जहर गया अब भी बैठे ही उन लम्हों की चादर ओढ़कर वो भी एक दौर था वक़्त के साथ गुजर गया कल भी उस बात को छूं गया एक नया झोका वो तेरी बात थी वो इस बात से मुकर गया जो बनाए थे उसूल हमने बेहतरी के जानिब तोड़ कर सब वो जाने क्यों बिखर गया जाने कब आ जाये फिर वही मौसम पुराने बस यही सोचते वो न जाने फिर किधर गया राजेश’अरमान’ »

उसके जाने आने के

 उसके जाने  आने के दरम्यां  छुपी सदियाँ थी   कुछ था पतझड़ सा  तो कुछ हरी वादियां थी उसकी ख़ामोशी में दबी दबी सी बैठी थी उसकी आँखों में कुछ बोलती चिंगारियां थी  लिपटी है बदन से किसी पैरहन की तरह  वो तेरी यादों की बस पुरवाइयाँ थी कोई आहट नहीं मगर कुछ तो जरूर था  तू न सहीं मगर तेरी परछाइयाँ थी चाक जिगर के  कोई सिता भी कैसे अपनी आँखों में कुछ ऐसी रुस्वाइयां थी                           राजेश’अरमान... »

खार भी रखते

खार भी रखते पर आँखों में बसे फूल भी है सादगी की मिसाल पर चेहरे में पड़े शूल भी है वो बदलते रहे कुछ ज़माने ज्यादा मेरे वास्ते नए अंदाज़ भी है कुछ पुराने से उसूल भी है वो निहारते है बैठ अब भी बचपन को जिसमे जमके बैठी कुछ पुरानी धूल भी है उम्र भर लड़ते देखा बस खुद से उनको पैरों में ज़ंजीर पर हाथों में त्रिशूल भी है वो मेरे सब कुछ  जाना जब दुनिया देखी मेरी किताबें भी  है वो मेरा स्कूल भी है                 ... »

खार भी रखता

खार भी रखता पर आँखों में बसे फूल भी है सादगी की मिसाल पर चेहरे में पड़े शूल भी है वो बदलते रहे कुछ ज़माने ज्यादा मेरे वास्ते नए अंदाज़ भी है कुछ पुराने से उसूल भी है वो निहारते है बैठ अब भी बचपन को जिसमे जमके बैठी कुछ पुरानी धूल भी है उम्र भर लड़ते देखा बस खुद से उनको पैरों में ज़ंजीर पर हाथों में त्रिशूल भी है वो मेरे सब कुछ  जाना जब दुनिया देखी मेरी किताबें भी  है वो मेरा स्कूल भी है                 ... »

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