rajesh arman, Author at Saavan - Page 4 of 52's Posts

मुझ से उकता

मुझ से उकता

मुझ से उकता कर खिड़की से भाग गई वो शाम जो साथ थी मेरे ले आई पकड़ एक रात और खुद छुप कर भाग गई रात सिरहाने पे बैठी रही रात भर देती रहे ताने कुछ मेरे अपने से कुछ अनजाने गुफ्तगू करती रही मुझसे कुछ मेरे ही अंदर के पुराने न सहर की कोई बात न नई सौगात वही रात की कहानी वही रात की बात राजेश’अरमान’ »

कुछ ख्वाब कुछ अफ़साने

कुछ ख्वाब कुछ अफ़साने

कुछ ख्वाब कुछ अफ़साने वही लोग आये कुछ सुनाने अपनी अपनी वीरानी सब की देखने आये वो तेरे कुछ वीराने देखने आये वो फिर ज़ख्म तेरे कहते आये तेरे ज़ख्म कुछ सहलाने वो भी उकता गए ग़मे ज़िंदगी से जो आते थे कभी दिल कुछ बहलाने सबके अपने वही ख़ज़ाने है कुछ नए है और वही कुछ पुराने राजेश’अरमान’ »

वो फुरसतों के काफिले

वो फुरसतों के काफिले

वो फुरसतों के काफिले वो रोज़ मिलने के सिलसिले वो शहर कहाँ खो गया जहाँ पास रहते थे फासले कुछ तो हुआ अजीब सा खो गए रास्ते ग़ुम है मंज़िलें हर निगाह में जूनून सा हर आँख में है अब वलवले कौन क़ातिल है वफाओं का क्यों सोचता है दिलजले राजेश’अरमान’ »

सुरमा लगाया था आँखों

सुरमा लगाया था आँखों में जिसका नज़रें मिलते ही खफा हो गए »

रिश्ते तो अब बौने हो गए है

रिश्ते तो  अब बौने हो गए है ख्वाब तो बस बिछोने हो गए है »

नवाजिश नवाज़िश जेहन में रहा

नवाजिश नवाज़िश जेहन में रहा वो दूर निकल गए अदावत लेकर »

जुम्बिश न सही खलिश ही सही

जुम्बिश न सही खलिश ही सही तुझे भूलने की कोशिश ही सही वो पा न सके जुस्तजू जो थी कुछ नहीं , इक खवाइश ही सही  राजेश’अरमान’ »

लिखे जो भी तराने वो तेरे लिए थे

लिखे जो भी तराने वो तेरे लिए थे तुमने उसे रेत पे लिखा समझा »

किधर से आया वो मालूम नहीं

किधर से आया वो मालूम नहीं अँधेरे में ही कोई आवागमन था »

पत्थर के बुतों में बस ढूँढ़ते रहे

पत्थर के बुतों में बस  ढूँढ़ते रहे अपने अंदर के ख़ुदा को पत्थर करके »

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