SACHIN SANSANWAL, Author at Saavan's Posts

शिकार

शिकार करने चली थी बाज का, हुस्न के गुरूर मे ।। हँसी थामे ‘सच’ कहू … पर भी ना मिला कबुतर का ।। ~ सचिन सनसनवाल »

ब्लकबोर्ड

‘ब्लैकबोर्ड’ जैसा तुम्हारा दिल, काले पत्थर सा सख्त , पर अन्दर से साफ है ।। ‘चॉक’ से तुम्हारे सुन्दर विचार, इजहार करो, अन्दर रखना पाप है ।। कुछ गलत मानो हो भी जाए, तो डरने की क्या बात है ।। एक तो तेरे अपने है तेरे साथ, दुजा ‘डस्टर’ तेरे हाथ है ।। जहमत ही तो है उठानी, है वही सख्ती, है वही कालापन, पर ‘ब्लैकबोर्ड’ एक पल मे साफ है ।। ~ सचिन सनसनवाल »

सिकंदर

सिकंदर सा चला था मै, सारी दुनिया जीतने… पर माँ के दिल से हार गया ।। ~ सचिन सनसनवाल »

फितरत

इंसान की भी गजब फितरत है, रिश्ते जुडे़ तो है दिल से… और विश्वास धागों पर करता है । ~ सचिन सनसनवाल »

ख्वाबों की बेवफाई

ख्वाबों की बेवफाई

हम तो ख्वाबों की चौखट पर बैठे थे , लेकर हसीन ख्वाब … प्यारी आँखों के परदे पर || ख्वाबों को ख्वाब बनाने , आया एक मुसाफिर , रख दिया ख्वाबों को , उसने जलती आग पर || कोशिश बहुत की , ख्वाबों की नमी जोड़ने की , पर मेरे ख्वाब भी मनचले निकले , चल दिए ……. सवार हो धुएं पर || अफ़सोस, धुआँ भी तो आग का है , ना उम्मीद है बादल की , ना ही उम्मीद है बारिश की , अब इस बंजर जमीं पर || उठ … चल दि... »

कच्ची पेंसिल

कच्ची पेंसिल

आज कल के महंगे बॉलपेन से , मेरी कच्ची पेंसिल अच्छी थी || बॉलपेन की रफ़्तार से , मेरी पेंसिल की धीमी लिखावट अच्छी थी || गलती पर रब्बर पेंसिल का साथ , होता गुरु शिष्ये का आभास || गुरु की डाट पर वो रब्बर से मिटाना , लिखे पर फिर से पेंसिल घुमाना , सिखने तक ये सब दोहराना , वो बचपन की सीख सच्ची थी || बॉलपेन के स्थाईत्व से , मेरे बचपन की हर गलती अच्छी थी || आज कल के महंगे बॉलपेन से , मेरी कच्ची पेंसिल अच्... »

आश

आश

बैठे है अकेले राह में, दिल में कोई आश है , घडी की बदलती सुइयो के _सही होने का इन्तजार है , कुछ कदम बढाने है ,और ये सुनसान राह पार है , फिर करवट हम भी बद्लेगे ,क्योकि …. राह के पार खुशहाल संसार है , किसी के हाथो में हाथ है , तो कही भरा पूरा परिवार है !    – सचिन सनसनवाल »

किस्मत की नाव

किस्मत की नाव

चढ़ती लहरो को पार ना पाये किस्मत की मेरी नाव है कैसी ||   पुकारे तो नाम में सच पाये झूठी ले रहे ये सांस है कैसी || सपनो की तरंग पनप ना पाये मंजिलो की ये उलझन कैसी ||   मौत से जुड़ चल रही है जिन्दंगी मेरे अपनों की ये दुवाएं है कैसी || उमंग संग उड़ भी ना पाये आजादी की ये अंदरुनी सलाखें है कैसी ||   चढ़ती लहरो को पार ना पाये किस्मत की मेरी नाव है कैसी ||                   – सचिन सनसन... »

खोया शख्स

खोया शख्स

ढूंढने निकला हूँ एक शख्स को , जो खो गया है … मेरे भीड़ में खो जाने के बाद ! »

स्कूल वाले जूते

स्कूल वाले जूते

जब से लाहगी है चोगठ अपने शहर की , स्कूल वाले जूते याद आने लगे है।।  -सचिन सनसनवाल »

मन दोस्त माने ना !

मन दोस्त माने ना !

कुछ समय बाद बिछड़े दोस्तों से हम यु मिले , देख कर उनका नाम भी याद आया , रंग , रूप और उनकी दोस्ती का दाम भी याद आया , कभी गहरी दोस्ती थी उनसे हमारी, पर अब ये मन उनको दोस्त माने ना ! कुछ बाते कुछ मुलाकाते याद आई , मन ही मन आँखे भर आई , देख कर उनको आँखों को सुकून आया , आँखे ये हमारी उनको परिचित कहे , पर ये टुटा दिल उनको पहचाने ना ! आकर फिर से वही मीठा चुना लगाया , समझ गये झूठी वफा का तूफान आया , हमने ... »

मूर्खो का मुर्ख दिवस है आज

मूर्खो का मुर्ख दिवस है आज

मुर्ख बना मूर्खो को हो रहा नाज देखो मूर्खो का मुर्ख दिवस है आज || मूर्खो पर तुम भी थोड़ा हंस दो भाई मुर्ख हो दूसरों को मुर्ख बनने में लगे है भारतीय है पर पश्चिमी त्यौहार बनाने में लगे है ख़ुशी से अपना ही मखौल उड़ाने में लगे है ऐसे नादान है कुछ मुर्ख भारतीय भाई || आओ आज भुत में चलते है… इतिहास के  पन्ने पलटते है… पॉप ग्रेगरी नामक व्यक्ति था नकलची जिसने भारतीय पंचांग से पश्चिमी पंचांग बनाया... »

जिद्द है !

जिद्द है !

ना गजल ना ही तो गीत है जाल है बस शब्दों का , शब्दों से शुरू हो भीतर ही भीतर खुद से लड़ने की जिद्द है ! नही मानता कहानियों-कथाओं को बच्चा कलयुग का , परियों की कथाओं से मन के बच्चे को बहलाने की जिद्द है ! खुलीं-बंद आँखों से खोया रहता एक परिंदा सपनो का , हकीकत की हरयाली में परिंदे को लाने की जिद्द है ! चौराहों पर खड़ा रह भुलाया है वक़्त इन्तजार का , बन मुसाफिर नयी दिशाओ में जाने की जिद्द है ! सब कुछ छुप... »

मोहब्बत

तुम भी बेवक्त चले हो घर अपने,  जब हमने शहादत के स्मारक पर मोहब्बत लिख दी है || ~सचिन सनसनवाल »

आरोप से पहले बलिदान याद ना आया

  “सैनिक है मेरे भाई – मैं हूँ किसान का बेटा “ कहने से पहले क्यों तुझे आरोपों का ख्याल नही आया , सैनिको पर आरोप लगाने से पहले … ओ कैन्ह्या , तुझे “जय जवान जय किसान ” का नारा याद ना आया || माँ – बाप ने भी क्या नाम है रखा , एक कैन्ह्या को पूजे है देश सारा , उस देश को बदनाम करने से पहले … ओ कैन्ह्या, तुजे कैन्ह्या का भी नाम याद ना आया || एस. राधाकृ... »

पहला प्यार

ना मेरे हाथों में था लहू , ना लगी थी मेहेंदी उसके हाथों में , ना जाने क्यों फिर भी रंग था गहरा ||   ना वो अकेली थी ना मै अकेला था , था वहाँ घने लोगो का पहरा ||   कुछ लोगो की घूरती आँखें … कुछ की थी तिरछी नजरें … वो थी सहमी, था मै भी सहमा ||   ना मेरे हाथों में था लहू, ना लगी थी मेहेंदी उसके हाथों में , ना जाने क्यों फिर भी रंग था गहरा ||   शायद थी नजरों की ही गुस्ता... »

वो दिन वो शाम ….

होते है वो दिन ख़ास जब ना कुछ खाते है ना पीते है पानी, बस किसी अपने अपने की याद में आँखों से बहता है नमक का पानी || होते है वो दिन ख़ास जब करते है किसी का घंटो इन्तजार , पता होता है फिर भी करते है किसी के झूठ पर विश्वास… होते है वो दिन ख़ास जब साथ होते है दोस्त जिनसे करते है प्यार, पर मिलता है दर्द वो करते है जब धोखे से पीठ पर वार… कुछ दिनों की ख़ामोशी… फिर कुछ और दिन ख़ास…. जब ... »

एक अधूरा बचपन

एक अधूरा बचपन

आंधी की आग में जला था एक घर, हँसी थी गई,  खिलौने थे टूटे, छूटा था एक बचपन !   घर था टुटा, आदर्श था छूटा , चल रही थी सासे, दम था घुटा, दिखावटी थे अपने,थे उनके झूठे सपने, दिन के उजालो में उम्मीद थी गयी मर, रात के अंधेरो में माँ की आँखे थी तर, एक आंधी में टुटा जो था घर !   रंगो-सजावट के जोर में, पटाखो के शोर में, आई थी होली, आई थी दिवाली, सुना सुखा अँधेरे में था एक घर ! रंगो-रौशनी के त्यौहा... »

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क्यों वो शख्स …?

हाथ से मेरे कुछ लकीरें फिसल गई, पलक झपकी ना थी कि… पानी की कुछ बुँदे निकल  गई, एक झपकी मे ही सबकुछ बदल गया, लाश तो एक गिरी थी … पर इंसान हर एक बदल गया, कुछ पलों मे ख्वाबो को छोड़ दिल जम गया, मन मे है बस एक ही सवाल – “क्यों वो शख्स बिछड़ गया “? क्यों वो शख्स बिछड़ गया “? -सचिन चौधरी (सनसनवाल) »