भूखा प्यासा नन्हा सा बालक,
सड़क किनारे बैठा था वो,
फटे थे तन पर कपड़े उसके,
मांग कर खाना ही फितरत थी उसकी,
ममता उसे नसीब न थी,
मां बाबा कहकर किसी
को पुकारा भी न था,
पडी निगाह एक दिलदार की
उस पर, दिया सहारा
उसने उसे बेटा बना कर,
होते बहुत कम है ऐसे रहमदिल,
सबको अपनी की परी है आजकल,
देता नहीं कोई साथ किसी का,
बस अपना स्वार्थ देखते हैं आजकल |
Bhukha pyasa nanha sa balak
Comments
10 responses to “Bhukha pyasa nanha sa balak”
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bahut accha likha apne
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Thanks
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वाह
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Thanks
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बहुत सुन्दर
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Thanks
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🙂🙂
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Thanks
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वाह बहुत सुन्दर प्रस्तुति
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Nice
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