जब शागिर्द-ए-शाम तुम हो, ख़्याल-ए-ख़ल्क़ 1 क्या करें, जुस्तुजू 2 ही नहीं किसी जवाब की जब, सवाल क्या करें। 1. दुनिया की परवाह; 2. तलाश।
जब शागिर्द-ए-शाम तुम हो, ख़्याल-ए-ख़ल्क़ 1 क्या करें, जुस्तुजू 2 ही नहीं किसी जवाब की जब, सवाल क्या करें। 1. दुनिया की परवाह; 2. तलाश।
देखने वालों ने मुझमें कुछ नहीं देखा, बस मेरी जिद देखी, जुनूँ नहीं देखा
ज़िंदगी मेरी आज ज़िंदगी से परेशान है, बात इतनी है, लिबास 1 रूह 2 से अनजान है। तारीकी3 है मगर, दीया भी जला नहीं सकते, क्या करें, घर में लाख4 के सब सामान है। ऐसा […]
वो है बहती नदी, मैं एक किनारा हूँ, पाकर भी मैं उसे, हर दफ़ा हारा हूँ।
जानता हूँ तुम नहीं हो पास, समझता भी हूँ, मगर जो मैं महसूस करता हूँ, उसे झुठलाऊँ कैसे।
हैरान हूँ मैं आज अपना बर्ताव देखकर, मैं ऐसा तो नहीं था, न ऐसा होना चाहिए।
इस वीराने में अचानक बहार कहाँ से आ गई, गौर से देखा तो ये महज़ इज़हार-ए-तसव्वुर1 था। 1. कल्पना की अभिव्यक्ति।
ख़्वाहिशें थीं कई, कब ख़त्म हुईं, ख़बर नहीं, कब रूह जिस्म से रुख़्सत1 हुई, ख़बर नहीं। उनसे दीदार2 की दरकार3 थी दिल को कभी, कब ये तमन्ना टूटकर बिखर गई, ख़बर नहीं। ज़ेहन में उनके […]
ग़म में भी मुस्कुराते रहे हम आपकी ख़ातिर, जाम-ए-अश्क1 पीते रहे हम आपकी ख़ातिर। कोई शाम लाएगी आपका पैग़ाम, ये सोच, परवाना बन जलते रहे हम आपकी ख़ातिर। अनजानी थीं राहें, न ख़बर मंज़िल की […]
ऐसे ही कहाँ एक नज़्म बना करती है, दर्द घुलता है रूह बनकर अल्फ़ाज़ों में।
इश्तिहार सी गुजर रही है ज़िंदगी मेरी, जैसी दिखती है, वैसी होती नहीं कभी।
रुख़्सत हो गई रूह मेरी, मुझे सुपुर्द-ए-ख़ाक कर दो, इरादे-पाक से जी लिया बहुत, अब मुझे नापाक कर दो।
इस दुनिया के दस्तूर बड़े ही निराले हैं, इक ख़ुशी की ख़ातिर, कई रंज पाले हैं।
उन्हें हर रोज़ नए चाँद-सा नया पाया हमने, मगर उन्होंने हमें देखा वही पुरानी नज़रों से।
भीख नहीं, मुझे मेरी मज़दूरी दे दो साहब, कमीज़ फट गई मेरी, रेल का झाड़ू बनकर।
शोक-ए-हिज्र1 करूँ या फिर आज जश्न-ए-वस्ल2 करूँ उनके पलभर के आने-जाने में, जिंदगीभर का रसद3 था। 1. विरह का दुख; 2. मिलन का उत्सव; 3. आपूर्ति (भावनाओं की)।
फलक के चाँद से, या तेरी याद से जिऊँ किसके सहारे, ऐसे हालात से, मोड़ जो आ गए बनके मेरे दूरियां कैसे किससे कहें अपनी मजबूरियां जो तेरे इश्क में, खोया हूँ हर घड़ी तू […]
सच के आगे झूठ लिखूँ ये मेरा काम नहीं इश्क है मेरा दौलत शोहरत, भले इश्क बदनाम सही घायल लोग यहाँ रहते हैं दिल सीने में किसके है? बैचेन पड़ी है रात यहाँ तारे भी […]
कभी बन्द कमरे भी छोड़ कुछ और भी है इसके आगे क्यूँ तू वक्त खपा रहा फिजूल में, कोई और भी देता है जवाब निकल तू भी देख ख्वाब.. बीतती है कैसे शाम की उलझन […]
अपनों को दूर से रू-ब-रू 1 होते हुए देखा है, हमने अपनी तमन्ना को लहू होते हुए देखा है। इक कसक जो दिल में दफ़न थी कहीं पर, दरारों से आज उसको झाँकते हुए देखा […]
अँधेरी बस्ती में रोशनी राशन में बाँटी जाती है, लोहे के हार पहनकर, ज़िंदगी काटी जाती है। आजकल आफ़ताब1भी आता नहीं है नज़र, हुकूमत चाँद-सितारों को भी खाती जाती है। मुहताज है मुक़द्दर जिनका एक […]
शोले से जलते जिगर¹, जुगनू से टिमटिमाने लगे, तूफ़ान भी अब यहाँ, झोंके हवा के खाने लगे। तेग़-ए-पुश्त² शायद हो गई है गायब उनकी, जो जुनूनी शजर³ सारे, सर आज झुकाने लगे। हार गई ये […]
सख़्त मग़रूर 1 चश्म 2 में ज़रा इंतज़ार तो हो इश्क़ उनके लिए भी ज़रा दुस्वार3 तो हो। बता दे अपनी हक़ीक़त जल्दी ही हम क्यों, जगते ख़्वाबों से तेरे चश्म ज़रा बेदार4 तो हो। […]
जाने कैसा शहर था, हर तरफ़ कहर था, धूप ही धूप मिली, दोपहर का पहर था। ख़ामोशी हर तरफ़, ख़ाक-सी फैली हुई, कैसे हो गुफ़्तगू 1, हर जुबान पर जहर था। घूम रहा हर शख़्स […]
बहुत याद आते हैं, सफ़र में बेवक्त बिछड़ने वाले। छोड़ जाते हैं हृदय में बहुत सी यादें और रह जाती हैं तन्हाइयाँ और खामोशियाँ। ऑंख के आंसू निकल पड़ते हैं ढूँढने उनको, नहीं मिलते हैं […]
वक्त की फ़ितरत में तब्दीली है, जो आज हमारा है वो कल किसी और का होगा। न कर ग़रूर आज पर अपने। आने वाला कल न जाने कैसा होगा। ______✍️गीता कुमारी
वो लड़की सोलह की बातें सत्रह की क्या अजीब थी वो, पर नसीब थी वो, जिसे भूलना अब तो नामुमकिन है लहज़े बड़े नाज़ुक से थे खनकती हर आवाजे उसकी वो बोल भी दे गर […]
जिन्दगी उम्र भर की सहेली है एक उलझी हुई पहेली है दरिया है ये समंदर की पूछो न तुम फिर भी प्यासी है ये अकेली है कहो चाहे इसको काँटो का वन कर सको तो […]
ओ देस से आने वाले बता… क्या लाए हो मेरी ऐसी ख़बर जो झूम उठे दिल के मंज़र और दिल हो ये बेखबर… क्या अब भी वहाँ की गलियों में खुशबू वतन की आती हैं […]
वो पान की दुकान वो बरगद की छाँव जहाँ हम मिले.. क्या याद है तुम्हें वो बारिश के छीटें लब पे तेरे जो गिरे सनसनाती हवाएँ वो ठंडी पुरवाई बदन पे तेरे जो चुभे…. क्या […]
तू मेरे पहले, मैं तेरे बाद हूँ ये शर्त भी है हार जीत कौन किसके साथ है जज़्बात से छूटकर, लब खोल बोल तू ये हालात किसके साथ कौन अब आजाद है इश्क भी एक […]
Enterprise teams face a recurring friction point: sharing access to specialized AI assistance without exposing personal accounts, credentials, or conversation history. A team member might need to hand off a draft document for review, collaborate […]
काव्य में कवि मर गया, जब दुनिया उसे बेवफ़ा कह दिया, कोई रत्जगे क्यों करेगा इस मुर्दे पे, उसका जिस्म भी अब मिट्टी हो गया। साँसें धुआँ है उसकी चाह में, लिखता रहता है हर […]
समय सब को प्यारा है, लेकिन खुद का
A user holding Monero needs their balance and transaction history to update automatically, but publishing “I’m online and checking for new funds” to a blockchain node reveals when they are active, how often they check […]
This is a sample post created to test the basic formatting features of the WordPress CMS. Subheading Level 2 You can use bold text, italic text, and combine both styles. Bullet list item #1 Item […]
सो जाते हैं फ़ुटपाथ पर आसमाँ को ओढ़कर, मरे हुए जिस्म कभी ठंड से ठिठुरा नहीं करते।
आह निकली है बहुत यहाँ तक आते-आते, बच आए हैं ज़रा सा, जाँ तक जाते-जाते।
मिज़ाज-ए-गर्दिश-ए-दौराँ1 बदल गया होगा, जो आया है दर पे आज, कल गया होगा। मकाँ-ए-रंक2 में जो आया है इतराता हुआ, ज़रूर वो कल किसी के महल गया होगा। मुकर कर चला गया वो अपने वादे […]
लफ़्ज़ 1 लहूलुहान हैं, कैसे उठाएँगे दर्द का बोझ, हर्फ़2 हसरत लिए किसी की, सो जाते हैं हर रोज़। 1. शब्द; 2. अक्षर।
मेरी नज़्म को अपने ज़ेहन 1 में उतर जाने दे, अहसासों को मेरे ज़रा सा असर कर जाने दे। भटकता रहा हूँ ताउम्र अजनबी दुनिया में, तेरी ज़िंदगी में अब मुझे घर कर जाने दे। […]
जुगनुओं का क़त्ल करने, काली रात आई है, माहताबों 1 ने अपनी सूरत, बादलों में छुपाई है। सहर का नाम मत लो, शब न ख़त्म होगी कभी, तूफ़ानों के तांडव ने, हर तरफ़ तबाही मचाई […]
इतराता फिरता है हर शख़्स भरे बाज़ार में, बिकने वाले सब ख़रीदार का लिबास1 पहने हैं। 1. पोशाक।
जिंदगी को जिंदगी से जुदा कर रखा है, हमने अपनी मौत का गुनाह कर रखा है। बस्ती को रोशन करने की ख़ातिर हमने, अपना घर शब-भर 1 जला कर रखा है। रह न जाएं तनहा […]
चंद सिक्के हैं जेब में और बेशुमार जरूरतें, चलो चलकर बाज़ार से कुछ ख़्वाहिशें ख़रीद लें।
क्या बताएँ आपको दास्ताँ-ए-दिल 1 अब हम, क़त्ल कर के ख़ुद का, हुए क़ातिल अब हम। तमीज़दार ख़ल्क़ 2 में तमाशबीन 3 हम बन गए, मुहज़्ज़ब 4 बज़्म में, इकलौते जाहिल अब हम। समंदर-ए-इश्क़ में […]
आपकी बेरहम यादें और मैं, बहुत सारी फरियादें और मैं। चुप रहेंगी खींचकर आज साँसें, मेरी बेबस निनादें 1 और मैं। इंतज़ार कर रही हैं बरखा 2 का, सूखी पड़ी ये आँखें और मैं। लगा […]
मर्ज़ 1 नहीं मालूम गर तो दवा न दीजिए, बुझा न सको आग तो, हवा न दीजिये। छुपा लो जख्म-ओ-दर्द ज़ेहन 2 में कहीं, यूँ ही पिघल कर, जू-ए-रवाँ3 न कीजिये। कुचल देती है दुनिया […]
साथ तो सब हैं, फिर भी तनहा सफ़र अपना, हज़ारों मकाँ की बस्ती में, अकेला घर अपना। तुम हो ख़ामोश, मैं भी गुमशुम-सा हूँ यहाँ, तूफ़ाँ में झुकाए सर बैठा है शजर1 अपना। दुनिया के […]
शजर1 सूखा है, खिज़ाँ2 अरसे से ठहरी है, लगेगा वक़्त कुछ और, चोट ज़रा गहरी है। लगता है एक और बम पड़ेगा फोड़ना, सुना है सरकार यहाँ की ज़रा बहरी है। मायूस मख़्लूक़ 3 को […]
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