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10 Comments

  1. बहुत सुन्दर भावाभिव्यंजना है सर, श्रृंगार के वियोग पक्ष को आपकी लेखनी ने सहज रूप में प्रस्तुत किया है।
    किस्मत का क्या खेल है
    मिलना था हमने कभी
    देखो आज भी हम जुदा है
    साथ होते हुए भी खफा है
    सुन्दर पंक्तियाँ हैं। अनुप्रासिक अलंकरण भी सहज ही आ गया है।
    बहुत खूब

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