Reema Bindal
फोटो पर कविता प्रतियोगिता :- शीर्षक – “सुनों!!”
June 8, 2020 in Poetry on Picture Contest
!सुनों!
सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
क्रूरता की पराकाष्ठा तो देखो, अब तक ये कुटुंब से दूर है|
भूतल से नभतल तक यह जो हाहाकार मचा,
प्रकृति ने शुरू अपना तांडव जो किया,
मनुष्य के मुँह पर जोरदार तमाचा दिया,
यह जो प्रकृति का बरसा है कहर,
हकीकत में मनुष्य द्वारा ही दिया गया है जहर|
सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
प्रश्न यह मन में उठता है..
क्यों हर परिस्थिति में मजदूर ही पिसता है,
समाजसेवा के यहाँ पर्चे फटने लगे,
पर डोनों में तो करोना ही बटने लगे,
गाँव पहुँचने की मन में लिए आस,
पहुँच गए रेल गाड़ी के पास|
सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
कोरोना का राक्षस बन बैठा सबका भक्षक,
उल्लास न कहीं दिखता ,मातम ही पैर पसारे टिकता,
इस महामारी के आगे सब अस्त्र-शस्त्र पड़े धराशाही,
न रहा अब कोई किसी का भाई..
इन्हें तो बस गाँव की याद आई..
किस बात का रोना गाते हो, तुम ने जो बोया वही तो पाते हो|
सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर हैं, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
अस्तित्व अपना बचाने को, घर वापस अपने जाने को|
पोटली के साथ मुँह को बाँधे बैठे हैं खिड़की के सहारे,
आँखों के साथ हाथ भी बाहर झाँके, गाँव-गाँव ही अब पुकारे|
सुनो! ये जो दरिद्र मजदूर है, वास्तविकता में यही तो मजबूर हैं|
क्रूरता की पराकाष्ठा तो देखो अब तक ये कुटुंब से दूर हैं|
स्वरचित कविता
रीमा बिंदल