वक्त निकल गया निगाहों से निगाहें मिलाने में, सफर में एक दूजे को समझने -समझाने में, परिचय तो पहली मुलाक़ात में हो गया मगर, ढूढ़ते रहे हम खुद को अपने ही मकानों में।। राही (अंजाना(

ऐ खुदा बोल तेरी रजा क्या हैं मेरे नादान दिल की सजा क्या है चले हैं सच की तलाश में तेरे ठोकरो का अंजाम क्या है अपना हम किसको कहे तेरे अपनो ने तोह रास्ता […]

अपने ही घर में क्यों बंटवारे हो गए, जो अपने थे अपनों से किनारे हो गए, बहुत शिद्दत से जुड़े थे जो खून के रिश्ते, दो गज़ ज़मीं की खातिर बे-सहारे हो गए, जान के […]

माँगने पर तस्वीर अपनी पुरानी दे दी, हमने जिनको अपनी पूरी जवानी दे दी, ख़्वाबों की दरख्तों में दफ़्न हुई थी कभी, कोरे कागज़ पर लिखने को वही कहानी दे दी।। राही (अंजाना)

अनजान रस्तों पर उनसे यूँ मुलाक़ात हो गई, बिन मौसम जैसे उस एक रोज़ बरसात हो गई, बादल, आसमाँ, हवाओं सबकी साज़िश थी मानो, दो दिलों को मिलाने को साथ कायनात हो गई।। राही (अंजाना)

मैं ख़ुद की तरह ज़ीने का जुनून रखता हूँ। मैं दिल में अरमानों का मज़मून रखता हूँ। हौसला क़ायम है अभी दर्द को सहने का- मैं ख़ुद में तूफ़ानों को मक़नून रखता हूँ। मुक्तककार- #मिथिलेश_राय