Tag: देश भक्ति कविता डाउनलोड

  • ****जकड़ी है****

    ****जकड़ी है****

    ****जकड़ी है****

     

    कुर्बानी से उपजी थी अब तस्वीरों में जकड़ी है,

    ऐ हिंद! तेरी आज़ादी सौ-सौ जंजीरों में जकड़ी है l

     

     

    हर मुफलिस की भूख ने इसको अपनी कैद में रख्खा है,

    और यही पैसे वालों की जागीरों में जकड़ी है l

     

     

    मां-बहनों पर दिन ढलते ही खौफ़ का साया रहता है,

    और हवस के भूखों की ये तासीरों में जकड़ी है l

     

     

    भ्रष्टाचार का दानव इसको बरसों-बरस सताता है,

    ये संसद की उल्टी-सीधी तदबीरों में जकड़ी है l

     

     

    मजहब के साये में दंगे रोज पनपते जाते हैं,

    ये जन्नत की ख्वाहिश वाले ताबीरों में जकड़ी है l

     

     

    कलमगार की बिकी कलम ने वक्त से नाता तोड़ लिया,

    ये गद्दारों के हाथों अब गालिब-मीरों में जकड़ी है ll

     

    Word-meanings-

     

    मुफलिस=गरीब

    तासीर=चरित्र

    तदबीर=सलाह/राय

    ताबीर=सपनों की हक़ीक़त

     

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    -Er Anand Sagar Pandey

  • शत्-शत् नमन करें

    शत्-शत् नमन करें
    उनको , जो राष्ट्र-हित में शहीद हुए।
    जन-जन रो देता है सुन
    वे वीर गति को प्राप्त हुए।
    पुत्र खोने का दर्द भला माता से ज़्यादा कौन सहे!
    धन्य है वो माँ जिसने ऐसे पुत्र जने!
    संवल खोने का दर्द भला पिता से ज़्यादा कौन सहे !
    धन्य है वो पिता जिसने राष्ट्र को ऐसे पुत्र दिए !
    पति-विरह की पीड़ा को पत्नी से ज़्यादा कौन सहे!
    दुश्मन से लड़ते पति जब वीर गति को प्राप्त हुए!
    राखी के बंधन का वादा बहन से ज़्यादा कौन जाने!
    दुश्मन के हमलों ने कितने भाई-बहन को जुदा किये!
    पिता खोने का दर्द भला बच्चों से ज़्यादा कौन सहे!
    आँखें भर जाती हैं दुःख से जिनके पिता शहीद हुए!
    शत्-शत् नमन करें

    उनको ,जो राष्ट्र-हित में शहीद हुए!!

  • स्वतंत्रता का नव विहान

    स्वतंत्रता का नव विहान
    गाओ मंगल गान!
    लहराते ध्वज को देखो-
    स्वाभिमान भरे मस्तक ऊँचे!
    याद करो वीरों की कुर्बानी!
    ज़ुल्म भरे व्यथा की कहानी।
    चहुदिश अरुण रश्मि छायी-
    धरती पर स्वर्ण-आभा आई !
    बरस रहे सुधा रस राग रंग
    जनता में खुशियों की पुरवाई!
    गगन-धरा-अनिल-क्षितिज
    प्रदिप्त हो रहे मंगल दीप!
    त्याग-बलिदान की ज्योति जले
    कभी न बुझ पाए ये अमर दीप !
    बँटवारे का दर्द समेटे
    आज भेद भाव सब छूटे।
    जननी नव दुल्हन सी सजी !
    हर रही क्लेश-विषाद सब।
    अत्याचार का ह्वास हुआ-
    जनतंत्र की जीत हुई!
    विश्वमंडल की नयी आभा
    भारतवर्ष बन गया आज !
    महावीर-बुद्ध के संदेशों को

    फैला रहे हम विश्व में आज!
    शान्ति के अग्रदूत बन
    बढ़ा रहे भारत की शान।
    मेरा भारत महान !
    गाओ मंगल गान-
    मेरा भारत महान !!

    -शीला तिवारी

  • मां तेरा लाल आयेगा

    माँ तुम राह देखती होगी
    कि मेरा लाल आयेगा
    पर सरहद पर जंग इतनी
    छिड़ी थी कि तेरा लाल नआ पाया
    वो इतने सारे थे कि माँ
    तेरा लाल अकेला पड़ गया
    मैंने एक – एक को मार गिराया
    वो भी अकेला रह गया
    अचानक उसने भारत माता
    का नारा लगाया
    मैंने जैसे ही भारत माता के
    चरणों में शीशे झुकाया
    उसने धोखे से मुझे मार गिराया
    अब कोई गम न करना मां
    भारत माता पर कुरबान हुआ हूँ
    तिरंगे में लिपटा जब मेरा शव
    आयेगा तो आंसू एक न बहाना
    मां
    वरना तिरंगे का अपमान होगा
    मां कसम अबकी जब आऊँगा
    अब ना दुश्मन की चाल में
    आऊँगा
    दुशमनों से बस इतना कह देना
    मेरा लाल आयेगा
    मेरा लाल आयेगा

    – रीता अरोरा

  • भारतमाता

    स्वर्णिम ओज सिर मुकुट धारणी,विभूषित चन्द्र ललाट पर
    गुंजन करे ये मधुर कल-कल, केशिक हिमाद्रि सवारकर
    आभामय है मुखमडंल तेरा, स्नेहपू्र्णिता अतंरमन।
    अभिवादन माँ भारती, मातृभूमि त्वमेव् नमन।।

    बेल-लताँए विराजित ऐसे, कल्पित है जैसे कुण्डल
    ओढ दुशाला तुम वन-खलिहन का ,जैसे हरित कोमल मखमल
    तेरा यह श्रृंगार अतुलनीय, भावविभोर कर बैठे मन।
    वन्दे तु परिमुग्ध धरित्री, धन्य हे धरा अमूल्यम्।।

    वाम हस्त तुम खडग धरे, दाहिने में अंगार तुम
    नेत्र-चक्षु सब दहक रहे, त्राहि-त्राहि पुकारे जन-जन
    स्वाँग रचे रिपु पग-पग गृह में, इन दुष्टों का करो दमन।
    पूजनीय हे सिंधुप्रिये तुम, मातृभूमि त्वमेव् नमन ।।

  • क्या है भारत।

    क्या है भारत ।

    एक कल्पना है ये भारत, हरिअर वन-खलिहानो की
    रहे सूखी जहाँ ये धरती तो उसे भारत नही समझना

    एक उम्मीद है ये भारत, जो नित् पथ दिखाए जग को
    बिखरे जो यूँ तूफाँ से तो उसे भारत नहीं समझना

    एक आवाज है ये भारत,जो मधुर ज्ञान दे जगत को
    कहीं गुम अगर हो जाए तो उसे भारत नहीं समझना

    एक विचार है ये भारत, संगठित करे जो जगत को
    विभाजन अगर जो चाहे तो उसे भारत नहीं समझना

    एक कर्म है ये भारत, जो जीवन सिखाए जगत को
    जो उलझनो में घिर जाए तो उसे भारत नहीं समझना

    एक स्वप्न है ये भारत, जो धूमिल करें हर हद को
    हलचल से जो टूट जाए तो उसे भारत नहीं समझना

    एक राष्ट्र है ये भारत, जो परिवार कहे इस जगत को
    ये गुण जहाँ मिल जाए तो उसे भारत ही तुम समझना

  • काश्मीर और अवध हमारा है हिन्दुस्तान हमारा है।

    चांद और सूरज हमारा है
    धरती और आसमान हमारा है
    कश्मीर और अवध हमारा है
    हिंदुस्तान हमारा है
    न कुछ रहा जो तुम्हारा है
    तोप तलवार गोला बारूद
    मिसाइल जंखिरा की
    मात्रा हमपर भारी है
    अब न कश्मीर बंटने पायेगा
    धरा पर रामराज ही रहे पायेगा
    अब जंग छिड़ने वाली है
    करना यह सरहद तुम्हें खाली है
    आने वाला तूफान भारी है
    यदि जान तुम्हें प्यारी है
    तो भाग चलो यहाँ से
    कयामत आने वाली है

    – रीता अरोरा

  • माटी का कर्ज

    अनजानी राहों पर बिन
    मकसद के मैं चलती हूँ
    जबसे तुम से जुदा हुई हूँ
    तनहाईयों में पलती हूँ
    कब आओगे तुम प्रियवर
    अब और सहा नहीं जाता है
    बिन तुम्हारे जीवन मुझसे
    अब न काटा जाता है
    तुम से ही मेरा ये दिन है
    तुम से ही ये रैना है
    तुम बिन सूनी ये दुनिया
    तुम बिन बैचेन ये नयना
    भीगी पलकें भीगे नैना
    भीगी दामन चोली है
    ऑख़ों का काजल
    माथे की बिंदिया
    हंस – हंस कर तुम्हें बुलाने हैं
    सुनो प्रियवरम
    मेरी भी मजबूरी है
    यहाँ सरहद पर
    जंग भारी छिड़ी है
    अपने वतन की खातिर
    जो कसमें हमने खाई हैं
    उस माटी का कर्ज
    चुका कर आता हूँ
    जब भी तुम बैचेन रहो
    उन यादों मैं जीना सीख लो
    जो वक्त गुजारा हमने संग में
    उन यादों मैं जीना सीख लो
    फिर न तनहाईया
    न बैचेनी तुम्हें सतायेगी
    भारत माता पर यह
    कुर्बानी बेकार नहीं जायेगी

    । । जयहिंद ।।
    – रीता अरोरा

  • तिरंगे का मान

    लेखनी को पुष्प चढ़ाकर
    भाव ह्रदय से सजाकर
    ज्ञान का भंडार भरकर
    प्रेम – अश्रु के साज से
    आज कुछ ऐसा लिखूॅ
    गीता लिखूॅ कुरान लिखूॅ
    वेद लिखूॅ ग्रन्ध लिखूॅ
    राम लिखूॅ – कृष्ण लिखूॅ
    सच लिखूॅ या झूठ लिखूॅ
    आईने सा स्पष्ट लिखूॅ
    आज देश पर छाया जो
    दुशमनों का कोहराम है
    देश वासियों का हुआ
    जीना अब मुहाल है
    मिलकर सब भारतवासी
    बचा लें अपना मथुरा कासी
    अवध और काश्मीर के साथ
    माँग लें अपना ननकाणां साहब
    और माँग लें अपना सिंध
    तभी सही मायने मैं
    अपना पूर्ण होगा हिंद
    ह्रदय के भाव से
    शत्रुओ के घाव से
    सैनिक है लड़ रहा
    देश की खातिर मर मिट रहा
    माँ भारती को शीष नवाकर
    शहीदों का सम्मान कर
    तिरंगे का मान रखें
    भारत की आन रखें
    लेखनी को पुष्प चढ़ाकर
    आज कुछ ऐसा लिखूॅ

    भारत माता की जय
    – रीता अरोरा
    राष्ट्रीय कवि संगम दिल्ली
    राष्ट्रीय जागरण धर्म हमारा

  • नमन करो उन वीरों को

    शहीदों को नमन
    ******
    नमन करो उन वीरों को
    जिनसे से यह देश हमारा है
    उनके साहस के दम पर
    महफूज घरों में रहते हैं ।
    उन वीरों के दम से अपनी
    होली और दिवाली है
    मावस की काली रातें
    उनके दम से उजियाली हैं
    उनको अपनी मातृभूमियह प्राणों से भी प्यारी है
    सीमाओं पर बनकर प्रहरी
    शेर शूरमा तने हुए ।
    राष्ट्र प्रेम की खातिर अपना
    वो सर्वस्व लुटाते हैं
    मातृभूमि की रक्षा हेतू
    अपनी जान गंवाते हैं
    तन मन धन से सैनिक अपना पूरा फर्ज निभाते हैं
    उनकी घोर गर्जना से दुश्मन भी थर्रा जाते है
    उन वीरों की विधवाएँ
    चुप चुप रह कर सब
    सहती हैं
    श्रृंगार शहीद हुआ उनका
    बिन चूड़ी कँगन रहती हैं
    गोदी के बच्चों को चिता में
    अग्नि देनी पड़ती है
    दरवाजे पर बैठी माता उनकी राहें तकती है
    थाल सजाकर बहना राखी
    पर छुप छुप कर रोती है
    कितना भी कह लूँ यह
    गाथा खत्म न होने वाली है
    मातृभूमि के काम ना आये
    वो बेकार जवानी है
    आओ मिल कर नमन करें
    उन माँ के राज दुलारों को
    राष्ट्र प्रेम के लिए प्राण देने
    वाले उन वीरों को ।।

    जय हिंद जय भारत
    – कमलेश कौशिक

  • स्वतन्त्रता-दिवस

    पन्द्रह अगस्त की बेला पर रवि का दरवाजा खुलता है,
    सब ऊपर से मुस्काते हैं पर अंदर से दिल जलता है
    जब सूखे नयन-समन्दर में सागर की लहरें उठती हैं,
    जब वीरों की बलिदान कथाएं मन उत्साहित करती हैं
    जब भारत माता के आँचल में आग आज भी जलती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब लाल किले के संभाषण से गद्दारी की बू आये,
    जब नेता-मंत्री के अधिवेषण मक्कारी को छू जाये
    जब शब्दों से बनी श्रृंखला में कवि नेताओं के गुण गाये,
    जब भ्रष्टाचार व लूट-पाट ही भारतवासी के मन भाये
    जब ये सारा माहौल देख भारत माँ जीते जी मरती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब भारत कानून पुस्तकों के पन्नों पर बंद पड़ा हो,
    जब भारत को छलने वाला अपराधी स्वच्छंद खड़ा हो
    जब भारत के मनमुद्रा पर अमेरिका का कनक जड़ा हो,
    जब कश्मीर हड़पने खातिर पाकिस्तानी आन अड़ा हो
    जब वीर शहीद की विधवा और बहने लावारिश सी पलती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब भूखे बच्चे सोते हैं रातों में उठकर रोते हैं,
    जब लाचारी से ग्रसित हुए माँ-बाप भी धीरज खोते हैं
    जब नेता-मंत्री अपने घर पर रोज त्यौहार मनाते हैं,
    जब तरह-तरह पकवान बने नोटों से मेज सजाते हैं
    जब सारी प्रजा देख राजा को केवल हाथ ही मलती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब वीर शिवाजी की तलवारें टंगी हुईं संग्रहलय में,
    जब राणा प्रताप के स्वाभिमान का मोल हो रहा मंत्रालय में
    जब मंत्री जनता से मिलने में आना-कानी करते हैं,
    जब जनता का पैसा खाकर अपनी अलमारी भरते हैं
    जब नेताओं के दृष्टि-कोण में जनता की ही सब गलती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब भारत में मासूमों की दी जाती कुर्बानी हो,
    जब भारतमें व्यथा-वेदना की अनलिखी कहानी हो
    जब भारत माँ के आँचल में दूध नहीं हो पानी हो,
    जब अपहर्ता के हाथों में भारत की निगरानी हो
    जब भारतमें प्रगति की गाड़ी रुक-रुक कर चलती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब हिमगिरि के शिखर श्रृंग से रक्तिम नदियाँ बहतीं हैं,
    जब गंगा की पावन धारा कर्दम-कांदो सहती हैं
    जब भारत माता पीड़ा सहकर सदा मौन ही रहती है,
    जब धरती माँ धीरज धरती कभी न कुछ भी कहती है
    जब किस्मत भी चला दाँव केवल किसान को छलती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब सदाचार और मर्यादायें केवल कागज़ पर जीवित हों,
    जब मेरे अंतर की ज्वाला केवल कविता तक सीमित हो
    जब भारत माँ की भुजा कटे और कोई पकिस्तान बने,
    जब संस्कार और आदर्शों का निर्धन हिन्दुस्तान बने
    जब कुछ सिक्कों के लालच में प्रतिमान की बोली लगती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

    जब द्रुपदसुता के आमंत्रण को मुरलीधर ठुकराते हों,
    जब बिन सीता को साथ लिए श्री राम अयोध्या आते हों
    जब चारों भाई आपस में ही सौ-सौ युद्ध रचाते हों,
    जब धर्मराज भी अनाचार से अपना राज्य चलातें हो
    जब दुर्योधन की श्लाघा में बंसी मोहन की बजती है,
    तब भारत के वीरों की कुर्बानी मुझको खलती है

     

  • आज कुछ ऐसा लिखूॅ

    लेखनी को पुष्प चढ़ाकर
    भाव ह्रदय से सजाकर
    ज्ञान का भंडार भरकर
    प्रेम – अश्रु के साज से
    आज कुछ ऐसा लिखूॅ
    गीता लिखूॅ कुरान लिखूॅ
    वेद लिखूॅ ग्रन्ध लिखूॅ
    राम लिखूॅ – कृष्ण लिखूॅ
    सच लिखूॅ या झूठ लिखूॅ
    आईने सा स्पष्ट लिखूॅ
    आज देश पर छाया जो
    दुशमनों का कोहराम है
    देश वासियों का हुआ
    जीना अब मुहाल है
    मिलकर सब भारतवासी
    बचा लें अपना मथुरा कासी
    अवध और काश्मीर के साथ
    माँग लें अपना ननकाणां साहब
    और माँग लें अपना सिंध
    तभी सही मायने मैं
    अपना पूर्ण होगा हिंद
    ह्रदय के भाव से
    शत्रुओ के घाव से
    सैनिक है लड़ रहा
    देश की खातिर मर मिट रहा
    माँ भारती को शीष नवाकर
    शहीदों का सम्मान कर
    तिरंगे का मान रखें
    भारत की आन रखें
    लेखनी को पुष्प चढ़ाकर
    आज कुछ ऐसा लिखूॅ

    भारत माता की जय
    रीता अरोरा

  • भारत माता

    भारत माता

    सिसक रही है भारत माता, आॅचल भी कुछ फटा फटा है
    चेहरे का नूर कहीं नहीं है,घूंघट  भी कुछ हटा हटा है।।
    क्या कारण है, सोचा है कभी? क्यों माॅ इतनी उदास है
    गुलामों  सी सहमी खडी, जब आजादी उसके पास है।

    पहले चढते थे शीश  सुमन, लहू से तिलक हो जाता था
    सफेद आॅचल माॅ का तब लाल चूनर कहलाता था
    आॅखों से बहती थी गंगा जमूना, की पावन अमृत द्यारायें
    चरणों पे झुककर हिमाचल मस्तक रोत नवाता था।

    बोते थे बीज चाॅदी के खेतो में किसान
    सोने की फसल लहलहाती थी
    पसीने की बूदें मिटटी में गिर
    नदिया की द्यार बन जाती थी
    अफसोस! मगर आज नही है
    खेतों में वो हरियाली
    चिडियों की चहचहाट नहीं है,न फूलों कीी है ूुुफूलवारी
    अपनों के खून से सींच रहें सब फसले अपनी अपनी
    कहीं जमीं पे दबी है जाति,कहीं दबे हेेै द्यर्म असहाय
    कहीं होठों पे लगे हैं ताले, कहीें मुठी में बंद आवाजें

    ताजों को कुचल रहे पाॅवों तले कुछ सिरफिरे
    माॅ बहनों की लाजो को भी चौराहे पर खींच रहें
    नाच रही है होके नग्न आज हैवानियत गली गली
    मेरे भारत की इन गलियों में आजादी तो कहीं नहीं?

    सोचो…..क्या सोचते होंगे, देषभगत जो चले गये
    अपने लिये कुछ न मांगा, झोली तुमहारी भर गये
    भ्रश्टाचार, अत्याचार, अनाचार..क्या उनके सपने थे
    एक एक सब टूट गये वो, कभी लगते जो अपने थे।

    ऐसा ही कुछ होता रहा तो वो दिन फिर दूर नही
    ज्ंजीरे फिर गुलामी की पांवों की झांझर होंगी
    लहू टपकेगा अष्कों से, होठों पे खामोशी  की चाद्धर होगी
    सोनचिरैया लुटीपिटी कहीं सिसकियाॅ भरती हेाग

    बंजर मुरझायी आस को तकती तब ये द्यरती होगी।

    तब न कहना मुझकेा तुम, मैंने आगह नही किया
    अरे….इस आजादी को बचा सकॅू…
    उसके लिये क्या क्या मेैने नहीं किया

    अपने अद्यिकारों के मान की खातिर सडको तक पर जा बैठ

    भूख उतार रख दी किनारे, अनशन पर हम आ बैठे
    द्यरना दिया,आवाज लगायी,इस गूंगी बहरी सरकारो को
    अफसोस मगर कहीं से कोई जबाबा न आया
    थक हार के हमने अपना फैसला तब ये बतलाया
    कुछ ओर नही तुम कर सकते तो, इतना तो कर दो
    हमें संभालने दो राज ये, सिंहासन खाली कर दो।
    सिहांसन खाली कर देो।……….

    आओ साथियों मिलकर आज ये संकल्प उठा ले
    जहाॅ छिपा है रामराज्य, उंगली पकड उसे बुला लें
    माना डगर मुष्किल है,पर नामुमकिन नही
    ऐसा कौन काम है, जो सेाचे हम ओैर कर न जायें

    जयहिंद।
    व्ंादनामोदी गोयल फरीदाबाद,

  • एक शहीद का खत

    एक शहीद का खत…..

    ‘माॅ मेरे खत को तू पहले आॅखों से लगा लेना
    चूमना होठों से इसे फिर आॅचल में छिपा लेना।’
    कि…..
    बेटा तेरा आज अपने कर्तवय  से हट गया

    युद्ध बाकि था अभी और वो मर गया।
    पूछे्गे बाबूजी जब क्या किया मेरे लाल ने
    कह देना बाकि हेै अभी कुछ सांसे बाल में
    ऐसा पूत नही जना मैंने जो पीठ दिखा आ जाये
    मरेगा सौ मार कर, नही ंवो, जो मेरा दूद्य लजा जाये
    सीने पर खायेगा गोली, छाती पे तमगे होगें उसके
    आयेगा जब लोैट कर तिरंगे तक सब झुके होगे।
    दूद्य को तेरे माॅ मैने पानी न होने दिया
    रखा आॅखों के सामने दुष्मन को डराकर
    लडा रहा आखिरी दम तक आॅखों को न सोने दिया।
    हाॅ, मुझे अफसोस इसका, छोड जल्दी जा रहा
    पर देखना तू माॅ, लौट कर फिर आ रहा
    फिर कोई बेटा तेरा सरहद पर खडा होगा
    तनी होगी छाती वतन के लिये अडा होगा
    आउॅगा जब लिपटकर माॅ तिंरगे में मैं द्यर
    देखना अश्कों  से किसी के रंग न तिरंगे का छूटे
    बहन छोटी है अभी,बहला देना,समझाना न रूठे
    बाॅद्यें राखी मुस्करा के मुझको, कोई रस्म न छूटे
    हाथ खाली है मगर दुआ देकर जा रहा हॅू
    तक न सके कोई दुष्मन उसे कि……
    उनको सजा देकर जा रहा हॅू।.
    कहना मेरी बहना को याद मुझको ही न करे
    और भी वीर खडे युद्ध में, दुआ उनके लिये करे
    जाने कौन किस रूप में अपनो से जाकर मिलेगा
    हॅसेगा रूबरू या तिंरगा सबकी गाथा कहेगा।
    भाई तो नादां है माॅ, गुस्से में उबल जायेगा
    रोयगा, द्योयेगा लेकिन फिर खुद ही संभल जायेगा
    उसको उसकी जिम्मेदारी का तुम अहसास करवाना
    देष पुकार रहा उसको बार बार याद दिलाना
    बतलाना कैसे उसके भाई ने युद्ध किया था
    आॅखों मे डाल आॅखें सीना दुष्मन का छलनी किया था
    डर गये थे कैसे सारे उसको सब बतलाना तुम
    और भी छिपे इद्यर उद्यर कुछ ये समझाना तुम
    कहना, जाकर मैदान में कसम आखिरी निभाये वो
    जेैसे आया भाई लौटकर, वैसे ही द्यर आये वो।
    अब तुझको क्या कहकर माॅ मै बहलाउ।
    बहाना न अष्कों को अपने बस यही समझाउ
    तू तो भारत माॅ मेरी, तुझको क्या बतलाउॅ
    एक पूत गया जो तेरा कल दूजा आ जायेगा
    झुकने न देगा शीश  तेरा ला इतने शीश  चढायेगा
    तिलक करेगा दिन रात तुुझे वो लहू से अपने
    रंग चुनर का माॅ तेरे कभी फीका न होने पायेगा।
    लगा छाती से अपने माॅ बस मुझे विदा कर दे
    हर बार मरूॅ वतन के लिये , बस यही दुआ कर दे
    ये आखिरी खत मेरा, आखिरी सलाम तुझको
    मिल रहा मिटटी में वतन की, ये आखिरी पैगाम तुझको
    लौट कर गर फिर कभी माॅ तेरे आॅगन में आया
    फिर करना तैयार मुझे तू वतन पर मिटने के लिये
    कलम देना हाथ में वंदे मातरम लिखने के लिये
    लहू में मेरे तू फिर देशभकित का जोश  देना
    तिरंगे से करूॅ मोहब्बत , कुछ ऐसी सोच देना
    रह गये जो अधूरे  आकर ख्बाब वो सब पूरे करूॅ
    जीउॅ तो जीउॅ वतन के लिये आखिरी दम तक
    मरूॅ जब भी कहीं तो मरूॅ रख यही ख्बाहिश लब पर
    मैं रोउॅ, मेै हसॅू मेरी आॅखों में बस वतन हो
    मरूॅ जब भी कभी, तिर्रगा ही कफन हो
    तिरंगा ही कफन हो, तिरंगा हर कफन हो।

    वंदना मोदी गोयल,फरीदाबाद

  • “छल छद्म”

    मैं नेत्रहीन नहीं

    आंखे मूंदे बैठा हूं

    मैं भी अवगत था

    सत्य से

    पर विवश रहा

    सदा

    अन्तर्मन  मेरा

    क्या मिलेगा व्यर्थ में

    लड़ने से

    समस्त भारत के लिए

    कुछ  करने से

    विदित था सब मुझे

    मृत्यु तो मेरी ही होगी

    अंत भी ही मेरा होगा

    और शेष सभी विजयी होंगे

    यहां

    योंही मरने से तो

    रक्त ही बहेगा

    पीड़ा ही मिलेगी

    नही नहीं नहीं

    मैं मूढ़ नहीं

    इस धर्मक्षेत्र में

    या कर्मक्षेत्र में

    मैं मर ही नहीं सकता

    निस्वार्थ

    क्यों मैं कुछ करू

    मैं भयभीत हूं

    और रहूंगा अब योंही सदा

    निसंदेह

    मैं जीवित तो रहूंगा

    सदा  ,हमेशा आह!

    वीरों में न सही

    कायरो में ही सही

    स्मरण तो मेरा भी होगा

    आजाद भारत में

    – Manoj Sharma

  • सावन तक दुशमनों का विनाश

    देखो फिर से सावन आया।
    सरोवर में कमल मुस्कराया।।
    भॅवरों ने गीत गुरगुनाया ।
    कोयल ने की कुहू – कुहू ।।
    सारा घर आंगन खुशियों से भर आया ।
    दूर बैठे सेना के जवानों ने
    अबकी बरस सावन पर
    दुशमनों को मार भगाने का बिगुल बजाया
    देश की कई बहिन – बेटियों ने भी कसमें खाई
    तभी तिरंगे में लिपटा
    एक जवान का शव
    अपने घर आंगन में आया
    माँ ने अश्रुधारा के बीच
    केसरिया तिलक अपने
    लाल के भाल लगाया
    मानो लाल का मुखमंडल
    गर्व से मुस्कराया
    जैसे कह रहा हो
    माँ अबकी बरस सावन पर
    तेरे लाल ने ढेर सारे
    दुशमनों को मार गिराया
    और बहुत सारे लोगों का जीवन बचाया
    माँ देखो – देखो सावन आया
    माँ देखो – देखो तेरा लाल आया

    प्रस्तुति – रीता अरोरा
    राष्ट्रीय कवि संगम दिल्ली
    राष्ट्रीय जागरण धर्म हमारा

  • आज़ाद हिंद

    आज़ाद हिंद

    सम्पूर्ण ब्रहमण्ड भीतर विराजत  !

    अनेक खंड , चंद्रमा तरेगन  !!

    सूर्य व अनेक उपागम् , !

    किंतु मुख्य नॅव खण्डो  !!

     

    मे पृथ्वी भूखंड !

    अति मुख्य रही सदा   !!

    यहा पर , सप्त द्वीप !

    जॅहा पर , उन समस्त !!

     

    द्वीप मे प्रमुख रहा  !

    भारत का द्वीप सदा !!

    यहाँ पर , भारत को !

    नमाकन कर सोने की !!

     

    चिड़िया ,हिंदोस्ताँ व भारत !

    की उपाधि दे डाली !!

    भारत मेरा प्रतिभाशाली रहा !

    पृथ्वी के आरंभ से  !!

     

    ही तो कमी यहाँ !

    किस बात की रही !!

    महा कवियो मे महाकवी !

    कालिदास , माहाऋषि मे मःआॠषी !!

     

    बाल्मिकी आदि समान महारत्न  !

    पनपे , रचे जिन्होने महाकवय  !!

    सहित रामायण सम्मुख भाती !

    – भाती के ज्ञानवान रत्न  !!

     

    तब पर भी कमी !

    कदाचित् कहाँ थी , सोने !!

    की चिड़िया के पर !

    रोंद कर लूट रहा !!

     

    था ,उसे कोई न कोई  !

    मानो बन के हमराही  !!

    जिस भारत ने संसार  !

    को शून्य व दशमलव !!

     

    दे कर गिनती सिखाई !

    आर्यभट्ट -. चाणक्य की निंदा !!

    नाही , ओषधि मे महात्मा !

    बुद्ध बने जगत के !!

     

    अनुरागी ,योग व ओषधि !

    से करत चले गये !!

    दूर समस्त बुराई , आज !

    इस भारत की दुर्गति !!

     

    देखो के प्रत्येक रास्ट्र !

    अभी भी लूटना चाहता  !!

    हो इसे भाई , वह !

    समाए क्या कम था !!

     

    जब जो भक्ति काल !

    से आदि काल से !!

    लेकर आधुनिक काल तलाक़ !

    डच-डेनिश , मुगल-हीमायू !!

     

    अकबर – बाबर ने लूटा !

    से .क्षतिग्रस्त करा भारत !!

    के प्रत्येक राज्य के !

    कन- कन को , जैसे  !!

     

    हो बचा  कही कोई !

    अंदेशा नहीं तब  कर  !!

    भी ,पनपे भारत के !

    भाषीय स्तर पर धुरन्दर !!

     

    महाकवी तुलसीदास ,सूरदास व !

    कबीरदास तो सभी अब !!

    भी ईर्षा क्या कम !

    थी जो , आगमन अंग्रेज़ो !!

     

    का हो गया, सोना !

    उगलने वाली माटी को !!

    अफ़सोस तब पर भी !

    न हुआ , ब्रहमण्ड -क्षत्रिय  !!

     

    शुद्रा व वैश्य क्या !

    बैर रखते जब चोट !!

    पड़ती थी खानी अंग्रेज़ो !

    की , गुलामी के दिवस  !!

     

    मे क्या चोट थी !

    वह कुछ नहीं दर्द !!

    तो कायम रही ह्रदाए !

    के भीतर , नस्तर समान !!

     

    चूबा रहे थे सर्यंत्र !

    स्वयं का मानो यह !!

    रास्ट्र हो,उनका ससुराल !

    बहन-बेटी की इज़्ज़त !!

     

    से खेल, भाइयो के !

    खून का कर रहे !!

    थे व्यापार , वह तो !

    क्रांतिवीर थे जिन्होने गरमदल !!

     

    व नरमदल रूप मे !

    कई सारे अथक प्रयास !!

    करे , राष्ट्र की आज़ादी !

    हेतु कई वीर मृत्यु  !!

     

    के घाट जले , फाँसी !

    चड़े अजर-अमर मंगल पांडे !!

    राजगुरू -सुखदेव व भग्त सिह  !

    न जाने आज कहाँ !!

     

    गये जो बच गये !

    वे तो मानो आज !!

    भी राजनेताओ के रूप  !

    मे दीमक बन अंग्रेज़ो !!

     

    के शासन का पालन  !

    ही करते जा रहे  !!

    है , भारतीय सभ्यता को !

    पश्चिमी सभ्यता ने लूटा !!

     

    अब नग्नता उमड़ रही !

    यहाँ पर है , पन्द्रह !!

    अगस्त १९४७ की पहचान  !

    करू तो करू किससे !!

     

    जब आज भी राष्ट्र !

    स्वयं के जातिवाद के !!

    गुलामी से जूज रहा है !

    अंबेडकर जी के क़ानून !!

     

    पस्त होते दिख रहे !

    हिंदू मुस्लिम सिख व ! !

    ईसाई समस्त कोई दुर्जन !

    बन आपस मे लड़ !!

     

    रहा , आज भी खून !

    ख़राबा , बलात्कार व नारी !!

    पर अत्याचार है , बंधुवा !

    मज़दूरी मे बँधा वह !!

     

    बालक मजदूर बेबस व !

    लाचार है, क्या खूब !!

    पदवी है , मेरे राष्ट्र !

    ” आज़ाद हिंद ”   की के !!

     

    ये आज़ाद हो कर !

    भी पूर्ण रूप से लाचार !!

    है , अपाहिज व बीमार  !

    है , ग़रीबो का शोषण !!

     

    थाना कचहरी मे मानो !

    अमीरो की सरकार है !!

    योग्य व्यक्ति लगता ठेला !

    अग्यानी व्यक्ति करता  देश !!

     

    का व्यापार है , कोन !

    कहता की आज १५ !!

    अगस्त २०१६ तलक मे भी !

    हमारा हिंदोस्ताँ आज़ाद है !!

     

    यह तो बेबसी मे !

    डूबता जाता किंतु लगता !!

    किसी ने मुख्य मंत्री रूप !

    मे इसे संभालना चाहा !!

     

    तो भी उस दीलेर !

    पर लगे  कई इल्ज़ाम !!

    है , कुरीतीयो मे डूबा !

    विष को जहन मे !!

     

    रख जूबा से उडेलता !

    ख़ाता रास्ट्र की व !!

    अलकता अन्य की वह !

    दुराचार व पाखंड मृत्युदंड !!

     

    के काबिल भया ,अब्दुल  !

    रहीम  , यह समस्त अंश !!

    ” आज़ाद हिंद ” के रहे !!

    न जाने क्यो आज !!

     

    भी ह्रदय ,भारत के !

    आज़ाद होने पर भी !!

    रूदन कर रहा !!!

  • “जश्ने आजादी”

    जश्ने आजादी का पल है,आओ खुशी मनाएँ।

    आसमान फहरे तिरंगा, जन गण मन हम गाएँ।

    कालिमा की बीती रातें ,आया नया सवेरा।

    प्रगति -पथ परआगे ,बढ रहा देश अब मेरा।

    अरूणदेव की नूतन किरणें ,नया सवेरा लाई।

    नयी रोशनी पाकर देखो ,कलियाँ भी मुस्काई।

    नहीं खैरात में मिली आजादी,खून बहाकर पाई है।

    खूली हवा में साँसें ले हम,लाखों ने जान गँवाई हैं।

    याद करो वो कहर की बातें ,दुश्मन ने जो ढहाया था।

    मित्रता का हाथ बडा,गुलाम हमें बनाया था।

    लावारिस का वारिस बन,पूरा देश हथियाया था।

    वीर शिवाजी,तात्या टोपे, नाना साहब को याद करो,

    लक्ष्मी बाई,मंगल पांडे की कुर्बानी याद करो।

    याद करो वो जोरे-जुल्म ,दुश्मन ने जो ढहाया था,

    साम,दाम,दण्ड भेद से,कितना हमे दबाया था।

    जलियाँवाला बाग न भूलो, निहत्थों पर वार किया,

    ठीक बैसाखी के दिन,कैसा नर संहार किया।

    अंग्रेजों की कुटिल चाल का ,दिया जवाब शहिदों ने।

    इंकलाब का देकर नारा जान फूँक दी वीरों में।

    भगत् सिंह,सुखदेव ,राजगुरू,बिस्मिल की कुर्बानी याद करो।

    हँसते हँसते चढ गये फाँसी, उनकी कहानी याद करो।

    याद करो नेहरू,पटेल,गाँधी बाबा को याद करो।

    सत्य,अहिंसा और प्रेम के मूल मंत्र को याद करो।

    इनकी कुर्बानी व्यर्थ ना जाए, कसम हमें यह खानी है।

    जाति, धर्म ,भाषा,प्रदेश की दूरी सभी मिटानी है।

    बनी रहे ये आजादी, कसमें हम सबको खानी है।

    विश्व पटल पर भारत माँ की नयी पहचान बनानी है।

    हाँ नयी पहचान बनानी है ,अब नयी पहचान बनानी है।

    जय हिन्द, जय भारती।

    सावित्री प्रकाश

     

  • “कायर”

    कायर
    ——-

    दरवाजे पर आहट हुई

    अधखुला दरवाजा खुला

    परिचित सामने खड़ा

    आस्तिने चढाए

    पैर पटकता लौट गया

    बोलकर कुछ

    अनसुने,अनकहे शब्द

    एक चुप्पी

    और गहरा

    अटहास

    स्मरण था मुझे सब

    कि सत्य

    अकस्मात् ही लौटेगा

    कटु सत्य लिए

    एक दिन

    मैं हारा सिपाही सा

    भागा था बिन

    समर किये

    उस दिन

    जब वीरों ने

    ललकारा था

    और हम दास थे

    गुलाम भारत के

  • निवेदन

    निवेदन
    ——–

    ऐ पथिक

    राह दिखा मुझे

    मुख न मोड़

    चल साथ मेरे

    भारत आजाद कराना है

    धर्म मेरा ही नहीं

    तेरा भी है

    भयभीत न हो

    विचार तो कर

    ध्वज हाथों में है

    अब आगे जाना है

    कालान्तर में तुम

    होगे न हम

    किन्तु कर्म सदैव

    साथ रहेगा

    मेरा निवेदन स्वीकार कर

    विजयी होकर ही

    आना है

    समर में हम ही

    वरन

    हम जैसे सैकड़ो

    है खड़े

    लड़ने को

    मरने को

    और देश के लिए

    बहुत कुछ करने को

    – मनोज भारद्वाज

  • “आरती माँ भारती की”

    माँ भारती तेरी आरती ।
    तेरी आरती माँ भारती ।।

    माँ भारती तेरे निगहबान सीमा प्रहरी हम
    पाकर अजेय वरदान डटे हैं सीमाओं पर
    इस कर्म-भूमि की माटी है मस्तक का टीका
    है कसम मिटा देंगे सब कुछ तेरी आहों पर
    माँ भारती तेरी आरती ।
    तेरी आरती माँ भारती ।।

    देकर अपना लहू सरहदों पर जो सबक बना है
    देख तिरंगा गौरव-गाथा का सम्मान तना है
    चरण-धूलि जननी तेरी है मलहम इन घावों पर
    है कसम मिटा देंगे सब कुछ तेरी आहों पर
    माँ भारती तेरी आरती ।
    तेरी आरती माँ भारती ।।

    रहें तेरी फुलवारी के हर फूल सदा मुस्काते
    तेरी इस ममता भरी चाहत को हम शीश झुकाते
    बस अमन-चैन ही गुज़रेंगे तेरी राहों पर
    है कसम मिटा देंगे सब कुछ तेरी आहों पर
    माँ भारती तेरी आरती ।
    तेरी आरती माँ भारती ।।

    हिन्द-धरा की रक्षा का संकल्प हो दृढ़ वर देना
    जनम-जनम सीमा के सेवक हम हों हिन्द की सेना
    मिले शुभम्-आशीष सफल हों आशाओं पर
    है कसम मिटा देंगे सब कुछ तेरी आहों पर
    माँ भारती तेरी आरती ।
    तेरी आरती माँ भारती ।।

    …अवदान शिवगढ़ी
    १५/०८/२०१४
    ०४:०५ बजे, साँझ
    मोहनलालगंज,लखनऊ ।

  • तुमको रक्त चढ़ाया है

    मातृभूमी पर दिल करता है
    हो जाऊं कुर्बान
    बना रहे ये प्यारा झंडा
    भारतवर्ष की शान

    देश के कितने ही भक्तों ने
    तुमको रक्त चढ़ाया है
    तब जाकर ये प्यारा झंडा
    लालकिला लहराया है
    आज है फिर वो दिन आया
    हो इसका गुणगान
    बना रहे ये प्यारा झंडा
    भारतवर्ष की शान

    इस झंडे की ओर जो देखे
    दुश्मन गन्दी दृष्टी से
    कसम है भारत माता की वो
    रह न पाये सृष्टी पे
    तीन रंग के इस झंडे में
    कितनो का बलिदान
    बना रहे ये प्यारा झंडा
    भारतवर्ष की शान

    गद्दारों से देश मुख्त हो
    ये सौगंध उठाते हैं
    सेना की वर्दी में तेरे
    बेटे दौड़े आते है
    सबसे पहले तेरे रक्षा
    तू मेरा अभिमान
    बना रहे ये प्यारा झंडा
    भारतवर्ष की शान@KAAP

  • 15 अगस्त

    हम स्वतंत्र होगे

    एक दिन

    ये आस लिए

    कुछ प्रण किया था

    आह!

    क्या थे वो क्षण

    जब मैं नहीं हम थे सब

    ध्येय एक लिए हृदय में

    बढ़ चले थे

    ओज लिए सोज़ लिए

    स्वय को अर्पित कर

    कर्मपथ पर बढ़ते थे

    नित्य उत्साह,उल्लास संग

    भारत माता की जय

    उदघोष गुंजते थे

    मेहनत रंग लाई

    15 अगस्त 1947

    स्वप्न सत्य हुआ

    उल्लास लिए हम

    स्वतंत्र हुए

    नयी सूबह

    नयी शफ़क

    मेहताब नया

    उदित हुआ

    तदोपरान्त

    यह खास दिन

    आजादी के लिए

    हर वर्ष अवतरित हुआ

     

     

     

     

     

     

  • “प्रतिभाओं का धनी”

    ????????
    ————————-
    प्रतिभाओं का धनी
    —————————

    सत्य-बोध के मूल-बीज को
    प्रकृति ने स्वयं निखारा है
    प्रतिभाओं का धनी आदि से
    भारत-वर्ष हमारा है

    श्वर-व्यञ्जन को गढ़कर हमने
    शब्द, वाक्य मे ढ़ाल दिया
    मन की अभिव्यक्ति ने
    पहली-भाषा रूपी ‘भाल’ लिया
    “पाणिनि” की कल्पना ने ध्वनि का
    सूत्रवत रूप संवारा है
    प्रतिभाओं का धनी आदि से
    भारत-वर्ष हमारा है |

    काल-गति जब मापी हमने
    नाड़ी-पल गति-मान मिला
    सूक्ष्म चाल पर चिन्तन करते
    कल्प-ज्ञान का फूल खिला
    कल्पतरू तरुवर की लट से
    बही कल्पना-धारा है
    प्रतिभाओं का धनी आदि से
    भारत-वर्ष हमारा है |

    सून्य अंक देकर हमने ही
    अंको को विस्तार दिया
    विन्दु दशमलव से अनन्त
    दूरी का साक्षातकार किया
    बंधा समय और गति की लय से
    हर ब्रम्हाण्ड नजारा है
    प्रतिभाओं का धनी आदि से
    भारत-वर्ष हमारा है |

    अभिमन्यु ने गर्भ मे भेदन
    व्यूह को जितना जान लिया
    उस क्षमता को मानव भूल ने
    आगे का न ज्ञान दिया
    समय कषौटी ने निर्दोष का
    आधा ज्ञान नकारा है
    प्रतिभाओं का धनी आदि से
    भारत-वर्ष हमारा है |

    परहित से सद्भाव के आगे
    हमने शीश झुकाए हैं
    पर-पीड़ा प्रतिकार की खातिर
    अपने प्राण गवांए हैं
    सच्चाई मे अच्छाई का
    वाश है हमने विचारा है
    प्रतिभाओं का धनी आदि से
    भारत-वर्ष हमारा है |

    लक्ष्य-विजय तेरी भारत-माता
    मंगलमय द्वारे पे खड़ी
    माँ तेरे पावन आँचल में
    हर प्रतिभा परवान चढ़ी
    सेवा में अवदान ने तेरी
    अपना कर्म उतारा है
    प्रतिभाओं का धनी आदि से
    भारत-वर्ष हमारा है |

    सत्य-बोध के…
    प्रतिभाओं का…

    …अवदान शिवगढ़ी
    ०७/१०/२०१४ टी.पी. नगर, इन्दौर ०९:१८ प्रातः

  • “मानव”

    मानव
    ^^^^^^

    अहंकार का पुतला बन जा
    तज दे भली-भला,
    अरे क्या करता है मानव होकर
    सत्य की राह चला |

    तू मानव रहकर क्या पाएगा
    दानव बन जा,
    दुष्कर है नम रहना
    सहज है मुफ्त मे तन जा ||

    हो जाए जब पुष्टि वहम की
    श्रेष्ठ है सबसे तू ही
    उस दिन ही तेरी काया
    रह जाएगी न यूँ ही
    हर प्राणी मन मैला होगा
    तू ही दूध-धुला
    अरे क्या करता है मानव होकर
    सत्य की राह चला
    तू मानव रहकर…
    दुष्कर है नम…

    दुर्लभ तन मे वाश मिला
    ये दुनिया देखी भाली
    बिन मतलब की बात है कोरी
    कर इसकी रखवाली
    तू तो बस इसके विनाश की
    चाल पे चाल चला
    अरे क्या करता है मानव होकर
    सत्य की राह चला
    तू मानव रहकर…
    दुष्कर है नम…

    बाल्य काल से तरुनाई तक
    जितना प्यार मिला
    पूर्ण युवा तन बल पौरुष
    मद में अब इसे भुला
    अति-आचार प्रदर्षित कर अब
    बन जा काल-बला
    अरे क्या करता है मानव होकर
    सत्य की राह चला
    तू मानव रहकर…
    दुष्कर है नम…

    देव कहाना उचित नही था
    असुर ही था अति-उत्तम
    उस पद से इन्सान बना
    शैतान है अब सर्वोत्तम
    यूँ ही उजड़ना जग दुर्भाग्य है
    अटल जो नही टला
    अरे क्या करता है मानव होकर
    सत्य की राह चला
    तू मानव रहकर…
    दुष्कर है नम…

    …अवदान शिवगढ़ी
    २१/०८/२००१५
    ०७:०२ बजे, साँझ
    लुधियाना |
    सम्पर्क सूत्र..

    1) +91 9450401601

  • “शब्दों के सद्भाव”

    ” माँ ”
    ——-

    शब्दों के सद्भाव
    ^^^^^^^^^^^^^^^^^^

    मानवता भी धर्म है जैसे
    इन्सानियत मज़हबी नाम,
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    सच्चाई के पाठ को पढ़ कर
    एक किनारे दबा दिया
    अपनी पनपती नश्लों से ही
    खुद हमने ये दगा किया
    इन्हे बताना बताना त्याग दिया क्युँ
    एक ही हैं अल्लाह और राम
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    मालिक ने तो एक जात
    इन्सान की सिर्फ बनाई है
    हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईशाई
    कहते हैं सब भाई हैं
    रख लो अदब बुज़ुर्गों की
    वाणी का कर भी लो सम्मान
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    नश्ल वाद का जहर उगलना
    मज़हब के ऐ रखवालों
    हर बस्ती के निगहबान
    इसे रोक सको तो रुकवा लो
    वरना दिखेंगे धरती पे बस
    मरघट कहीं कहीं समसान
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    कैसे ज़ुदा करोगे दिल से
    दिल में रची बसी ये शान
    मुमकिन नही ज़ुदाई इनकी
    इक दूजे की हैं पहचान
    दिल के लहू को रक्त हृहय का
    कह देना कितना आसान
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    रात मे दिन का राज है कायम
    दिल से ये एहसास न रूठे
    सच्चाई मे अच्छाई की
    डोर बँधी है आश न टूटे
    काया मे जब प्राण रहेंगे
    तभी मिलेंगें जिस्मो-जान
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    मस्ज़िद से मन्दिर की दूरी
    इतनी बड़ी नही मज़बूरी
    ‘दर’ और ‘द्वार’ पे आश प्रयास की
    ही तो होती दुआ है पूरी
    मक़सद नेकी लक्ष्य भलाई
    हैं अवदान तेरे पैगाम
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    मानवता भी धर्म है जैसे
    इन्सानियत मज़हबी नाम,
    शब्दों के सद्भाव भुलाकर
    जीवन बना लिया संग्राम |

    …अवदान शिवगढ़ी

    ०९/०८/२०१०,
    हुसैनपुरा लुधि.
    ०९:०४ बजे,प्रात: |

  • ” देश की आश “

    देश की आश

    ^^^^^^^^^^^^^^^^

     

    आशा है अब आज़ादी के

    मैं   सपने   देख  सकूंगा,

    आशा  है    मै   फिर  से

    प्यारा भारत देश बनूंगा|

    आशा  मेरे      आँगन मे

    राहत के सुमन महकेगें,

    आशा है आने वाले कल

    को”राम-राज्य” मै दूँगा||

     

    आज़ाद हूँ मै यह सुन-सुन के

    बस घुट-घुट के रोता हूँ

    इस आज़ादी को कैसे कहूँ

    किस हालत मे ढ़ोता हूँ

     

    कलि-काल चक्र यूँ घूमा है

    चहुँ ओर शोर आतंक का है

    यूँ उग्र हुआ है उग्रवाद

    दामन मे फंसा जो डंक सा है

     

    सोने की चिड़िया था मै कभी

    पर मेरे पर हैं काटे गए

    ओढ़ा के कफन खुदगर्जी का

    थोड़ा-थोड़ा दफनाते गए

     

    मेरे ही हृदय के टुकड़ों ने

    सुख चैन से मेरा विछोह किया

    अपने ही उपवन मे भ्रमरों ने

    है कलियों से विद्रोह किया

     

    बनके दामन मे दाग लगे

    ये भूख गरीबी बेकारी

    ज़ागीर नही थी ये मेरी

    पर अब है मेरी लाचारी

     

    भाई-चारे के आँड़े में

    अश्मत बहनो की लुटती है

    भोली ममता के साए में

    किस्मत माँओं की घुटती है

     

    मेरे ही तन के कुछ हिस्से

    मेरे ही लहू के प्यासे हैं

    मेरी सन्तानो ने खुद ही

    अपने घर लाशों से पाटे हैं

     

    मैं “राम-रहीम-नानक-गौतम

    के सपनो का प्रेम-सरोवर हूँ

    तुम भूल गए हो फिर कैसे

    कि मै तो एक धरोहर हूँ

     

    हैं धन्य वो मेरे लाल जो

    इस माटी का कर्ज चुकाते हैं

    बनके मेरे दामन के प्रहरी

    मेरी आन पे बलि-बलि जाते हैं

     

    उनके ही बल पर है मेरा सिर

    गर्व से अब तक तना हुआ

    उनके ही चौड़े सीनो पर

    अस्तित्व है मेरा बना हुआ

     

    ज़श्न-ए-आज़ादी मनाने को

    अब जब भी तिरंगा लहराना

    खा लेना कसम उस आलम मे

    गौरव है मेरा वापस लाना

     

    उद्गार मेरे सब मानष जन

    दिल के आँगन से मेटेंगे

    प्रति-पल हो मुखागर ख्वाब मेरे

    गलियों में हिन्द की गूँजेंगे

     

    आशा है अब आज़ादी के

    मैं   सपने   देख  सकूंगा,

    आशा  है    मै   फिर  से

    प्यारा भारत देश बनूंगा|

    आशा  मेरे      आँगन मे

    राहत के सुमन महकेगें,

    आशा है अवदान मै कल को

    ” राम-राज्य”   ही   दूँगा||

     

    …अवदान शिवगढ़ी

    २०/०८/२००१/लुधि.

    ——————————–

  • कूटनीति

    कूटनीति…

    राजनीति वट वृक्छ दबा है

    घात क़ुरीति की झाड़ी मे

    धूप-पुनीति को अम्बु-सुनीति को

    तरसे आँगन-बाड़ी ये

    कूटनीति सा कोई चोचला

    मध्य हमारे क्युं आया

    ये चिन्तन भी त्यागा हमने

    ह्रदय से इसको अपनाया

    दूर हुए भाई से भाई

    नीति-ज्ञान की कमी तले
    “सत्यमेव-जयते” भी भूले

    सिर्फ अनैतिक पंथ चले

    निजी स्वार्थ समयानुकूल

    निज राष्ट्र-धर्म से बड़े हुए

    परहित,त्याग से आदि-मूल

    सद्भाव अचेत हैं पड़े हुए

    सच्चे-अच्छे यदि कुसुम कहीं

    कुसुमित अभिलाषित दीख पड़े

    हर शूल ह्रदय शंका उपजी

    छिप जाएंगे आैर खीझ पड़े

    ये भी भूले इन्हे ढ़कने मे

    इक चुभन को सहना पड़ता है

    इनके अस्तित्व को छाया दे

    इक पुष्प ही बस कर सकता है

    जंग ये व्यर्थ की नेकी से

    नासमझी मे बदी ने ठानी है

    मिलजुल कर रह लो कायनात

    आए तो पाए जानी है

    सच्चों से द्वन्द ये झूठों का

    तो आदि काल से आया है

    पर झूठ से पहले अटल विन्दु

    सच ने अनादि से पाया है

    त्रेता युग से इक अमिट-प्रसंग

    है आज भी अपने मध्य सबक

    इस आर्यावर्त की धरा पे थी

    रिषि विश्वश्रुवा की ख्याति महक

    मालि,सुमालि और माल़्यवान की

    एक कुचेष्टा पूर्ण हुई

    थी सुता केकसी इनकी

    गृहणी बन रिषि राज को वरण हुई

    मुनि श्रेष्ठ के जैसा ओजस्वी

    सुत कूटनीति की छाया मे

    अपना ही लहू विरोधी था

    रावण अन्जानी माया मे

    उस अमिट काल की परछाहीं

    कलिकाल मे फिर घहराई है

    इसमे न सिमटने की इच्छा

    में हिन्द-धरा थर्राई है

    हर आम-खाश अवदान-आश

    इक ‘देवदूत’ के संग जुड़ी

    देवों की इस धरती की प्रथा

    फिर “राम-राज्य” की ओर मुड़ी |

    …कवि अवदान शिवगढ़ी

    कूटनीति…

    राजनीति वट वृक्छ दबा है

    घात क़ुरीति की झाड़ी मे

    धूप-पुनीति को अम्बु-सुनीति को

    तरसे आँगन-बाड़ी ये

    कूटनीति सा कोई चोचला

    मध्य हमारे क्युं आया

    ये चिन्तन भी त्यागा हमने

    ह्रदय से इसको अपनाया

    दूर हुए भाई से भाई

    नीति-ज्ञान की कमी तले
    “सत्यमेव-जयते” भी भूले

    सिर्फ अनैतिक पंथ चले

    निजी स्वार्थ समयानुकूल

    निज राष्ट्र-धर्म से बड़े हुए

    परहित,त्याग से आदि-मूल

    सद्भाव अचेत हैं पड़े हुए

    सच्चे-अच्छे यदि कुसुम कहीं

    कुसुमित अभिलाषित दीख पड़े

    हर शूल ह्रदय शंका उपजी

    छिप जाएंगे आैर खीझ पड़े

    ये भी भूले इन्हे ढ़कने मे

    इक चुभन को सहना पड़ता है

    इनके अस्तित्व को छाया दे

    इक पुष्प ही बस कर सकता है

    जंग ये व्यर्थ की नेकी से

    नासमझी मे बदी ने ठानी है

    मिलजुल कर रह लो कायनात

    आए तो पाए जानी है

    सच्चों से द्वन्द ये झूठों का

    तो आदि काल से आया है

    पर झूठ से पहले अटल विन्दु

    सच ने अनादि से पाया है

    त्रेता युग से इक अमिट-प्रसंग

    है आज भी अपने मध्य सबक

    इस आर्यावर्त की धरा पे थी

    रिषि विश्वश्रुवा की ख्याति महक

    मालि,सुमालि और माल़्यवान की

    एक कुचेष्टा पूर्ण हुई

    थी सुता केकसी इनकी

    गृहणी बन रिषि राज को वरण हुई

    मुनि श्रेष्ठ के जैसा ओजस्वी

    सुत कूटनीति की छाया मे

    अपना ही लहू विरोधी था

    रावण अन्जानी माया मे

    उस अमिट काल की परछाहीं

    कलिकाल मे फिर घहराई है

    इसमे न सिमटने की इच्छा

    में हिन्द-धरा थर्राई है

    हर आम-खाश अवदान-आश

    इक ‘देवदूत’ के संग जुड़ी

    देवों की इस धरती की प्रथा

    फिर “राम-राज्य” की ओर मुड़ी |

    …कवि अवदान शिवगढ़ी

  • प्रतिभाओं का धनी

    ????????

    ————————-

    प्रतिभाओं का धनी

    —————————

     

    सत्य-बोध के मूल-बीज को

    प्रकृति ने स्वयं निखारा है

    प्रतिभाओं का धनी आदि से

    भारत-वर्ष हमारा है

     

    श्वर-व्यञ्जन को गढ़कर हमने

    शब्द, वाक्य मे ढ़ाल दिया

    मन की अभिव्यक्ति ने

    पहली-भाषा रूपी ‘भाल’ लिया

    “पाणिनि” की कल्पना ने ध्वनि का

    सूत्रवत रूप संवारा है

    प्रतिभाओं का धनी आदि से

    भारत-वर्ष हमारा है |

     

    काल-गति जब मापी हमने

    नाड़ी-पल गति-मान मिला

    सूक्ष्म चाल पर चिन्तन करते

    कल्प-ज्ञान का फूल खिला

    कल्पतरू तरुवर की लट से

    बही कल्पना-धारा है

    प्रतिभाओं का धनी आदि से

    भारत-वर्ष हमारा है |

     

    सून्य अंक देकर हमने ही

    अंको को विस्तार दिया

    विन्दु दशमलव से अनन्त

    दूरी का साक्षातकार किया

    बंधा समय और गति की लय से

    हर ब्रम्हाण्ड नजारा है

    प्रतिभाओं का धनी आदि से

    भारत-वर्ष हमारा है |

     

    अभिमन्यु ने गर्भ मे भेदन

    व्यूह को जितना जान लिया

    उस क्षमता को मानव भूल ने

    आगे का न ज्ञान दिया

    समय कषौटी ने निर्दोष का

    आधा ज्ञान नकारा है

    प्रतिभाओं का धनी आदि से

    भारत-वर्ष हमारा है |

     

    परहित से सद्भाव के आगे

    हमने शीश झुकाए हैं

    पर-पीड़ा प्रतिकार की खातिर

    अपने प्राण गवांए हैं

    सच्चाई मे अच्छाई का

    वाश है हमने विचारा है

    प्रतिभाओं का धनी आदि से

    भारत-वर्ष हमारा है |

     

    लक्ष्य-विजय तेरी भारत-माता

    मंगलमय द्वारे पे खड़ी

    माँ तेरे पावन आँचल में

    हर प्रतिभा परवान चढ़ी

    सेवा में अवदान ने तेरी

    अपना कर्म उतारा है

    प्रतिभाओं का धनी आदि से

    भारत-वर्ष हमारा है |

     

    सत्य-बोध के…

    प्रतिभाओं का…

     

    …अवदान शिवगढ़ी

    ०७/१०/२०१४ टी.पी. नगर, इन्दौर   ०९:१८ प्रातः

  • हे भारत ! भारत बनो।

    अपनी जो आज़ादी थी,

    मानो

    सदियों के सर्द पर,

    इक नज़र धुप ने ताकी थी।

    ‘पर’ से तंत्र, ‘स्व’ ने पायी थी,

    पर ‘संकीर्ण-स्व’ से आजादी बाकी थी।

    अफ़सोस…! ये हो न सका,

    और अफ़सोस भी सीमित रहा।

    आज इंसानियत की असभ्य करवट से आहत,

    तिरंगे की सिलवटी-सिसक साफ़ है;

    बस अब तो भारत चाहता है,

    हल्स्वरूप

    हर खेत में हल ईमान से उठ जाए।

    हे भारत! तीन रंगों का एहसास करो,

    फिर शायद तुम समझोगे,

    इस बीमार इंसानियत की औषधि सभ्यता है,

    सभ्य होना ही तो भारत की सफलता है।

    सभ्यता के सानिध्य में,

    पुनः ‘जगत-गुरु’ की उपाधि धरो,

    हे भारत! भारत बनो।

    हे भारत ! भारत बनो।

  • sone Ka Bharat mera

    Sone ka Bharat,mera Chandi ka Gujarat Hai -2

    Tajmahal Dekhke,Lalkila Dekhke Dushman bhi Hairan Hai -2

    Sone ka Bharat…

    Gandhi ka jawab Nahi,Nehruji Lajwab Hai-2

    Modi Ko Dekhke,Kejriwal Ko Dekhke,mushraf Bhi Hairan Hai -2

    Sone ka Bharat…

    Sachin ka jawab Nahi,Viru Bhi Lajwab Hai-2

    Dhoni Ko Dekhke Kohli Ko Dekhke Watson Bhi Hairan Hai-2

    Sone ka Bharat…

    Bacchan ka jawab Nahi,Dharmendra bhi Lajwab Hai-2

    Priyanka Ko Dekhke,Aaliya Ko Dekhke,Hollywood Hairan Hai-2

    Sone ka Bharat…

    Sonu ka jawab Nahi Himesh bhi Lajwab Hai-2

    Shreya Ko Dekhke,Sunidhi Ko Dekhke,BIBAR Bhi Hairan Hai-2

    Sone ka Bharat…

    Delhi ka Jawab Nahi,Mumbai bhi Lajwab Hai-2

    Amdabad Dekhke,Gandhinagar Dekhke,OBAMA Hairan Hai-2

    Sone ka Bharat…

    Pakistaniyo sunlo jara,kashmir Hamara Hai-2

    Sar kata denge,Jaan Gava denge,kashmir Nahi chhodenge-2

    Sone ka Bharat mera Chandi ka Gujarat Hai

    Tajmahal Dekhke Lalkila Dekhke Dushman bhi Hairan Hai…….

  • आज़ादी का जश्न

    आज़ादी का जश्न

    आज़ादी के जश्न बहुत पहले भी तो तुमने देखे
    माँ के दिल से बहते वो आंसू भी क्या तुमने देखे,
    भूखे बच्चे लुटती अस्मत व्यभचारी ये व्यवस्था है
    क्या सच में हो गए वो पुरे सपने जो तुमने देखे ,
    हर किसान गमगीन यहाँ हर पढ़ा लिखा बेचारा है
    छिपे हुए उनकी आँखों के आंसू क्या तुमने देखे ,
    पर संकल्प आज ये करते हम सब मिल कर है सारे
    करेंगे सपने वो पूरे जो मिलकर हम सबने देखे ,
    न हिन्दू न मुसलमान न सिख न कोई ईसाई है
    लड़ कर मधुकर देख चुके हम प्यार भी कुछ करके देखे
    मधुकर

  • तिरंगा हमारा भगवान है

    तिरंगा हमारा भगवान है

    तिरंगा बस झण्डा नहीं
    हम सब का सम्मान है।
    तिरंगा कोई कपडा नहीं
    पूरा हिन्दुस्तान है।।

    तिरंगा कोई धर्म नहीं
    सब धर्मों की जान है।
    तिरंगा बस आज नहीं
    पुरखों की पहचान है।।

    तिरंगा बस ज्ञान नहीं
    ज्ञान का वरदान है।
    तिरंगा कोई ग्रंथ नहीं
    पर ग्रंथों का संज्ञान है॥

    तिरंगा में दंगा नहीं
    हिन्दु और मुसलमान है ।
    तिरंगा कोई गीत नहीं
    प्रार्थना और अजाने है॥

    तिरंगा कोई मानव नहीं
    मानवता की पहचान है।
    तिरंगा में जाति-धर्म नहीं
    ये तो हमारा भगवान् है॥

    ओमप्रकाश चन्देल”अवसर’
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
    7693919758

  • तिरंगा

    तिरंगा

    माँ की गोद छोड़, माँ के लिए ही वो लड़ते हैं,

    वो हर पल हर लम्हां चिरागों से कहीं जलते हैं,

    भेज कर पैगाम वो हवाओं के ज़रिये,

    धड़कनें वो अपनी माँ की सुनते हैं,

    हो हाल गम्भीर जब कभी कहीं वो,

    चुप रहकर ही वो सरहद के हर पल को बयाँ करते हैं,

    रहते हैं वो दिन रात सरहद पर,

    और सपनों में अपनी माँ से मिलते हैं,

    वो लड़कर तिरंगे की शान की खातिर,

    तिरंगे में ही लिपटकर अपना जिस्म छोड़ते हैं,

    जो करते हैं बलिदान सरहद पर,

    चलो मिलकर आज हम उन सभी को,

    नमन करते हैं नमन करते हैं नमन करते हैं॥

    राही (अंजाना)

  • देशभक्ति का पाठ पढ़ाना होगा

    जाति धर्म देखे बिना, देशद्रोहियों को अपने हाथों से मिटाना होगा
    नई पीढ़ी को अभिमन्यु सा, गर्भ में देशभक्ति का पाठ पढ़ाना होगा

    तुम्हें व्यक्तिवाद छोड़कर राष्ट्रवाद अपनाना होगा
    हर व्यक्ति में भारतीय होने का स्वाभिमान जगाना होगा

    लोकतंत्र को स्त्तालोलुपों से मुक्त कराना होगा
    देशभक्ति को भारत का सबसे बड़ा धर्म बनाना होगा

    वीरता की परम्परा को आगे बढ़ाना होगा
    हर भारतीय को देश के लिए जीना सिखाना होगा

    – Feran

  • कविता

    कविता

    मेरा देश महान
    घनघोर घटा में अलख जगा कर देख रहा मतिहीन,
    जाग सका ना घन गर्जन पर जग सोने में लीन,
    इस निस्तब्ध रजनी में मै और मेरा स्वप्न महान,
    खोज रहा अधिगम जिससे जग सच को लेता जान !
    देह थकी तो बहुत जरूरी है उसको विश्राम
    किन्तु न चिंतन को निद्रा गति इसकी है अभिराम |
    जला हुआ है दीप तो एक दिन उजियाली लायेगा
    अंधकार से मुक्त मही को लौ भी दिखलायेगा
    गंगा के तट बैठ पुरवैया के मस्त हिलोरे
    माँझी की गीतो में कृष्ण ज्यों लगा लिये हो डेरे,
    करुणां प्रेम रस में डूबे यह देश हमारी आन,
    पड़े जरुरत इसकी खातिर तज देंगे हम प्राण,
    हे हरि सबल समर्थ आप कर दो इतना बरदान
    फूले फले बढे विकसे यह मेरा देश महान ||

    आपका उपाध्याय…

  • स्वतंत्र भारत

    जब स्वतंत्र भारत राज तो और स्वतंत्र हैं विचार तो,
    फिर घिरे हुए है क्यों सुनो तुम आतंक में भारतवासियों,
    वीर तुम बढ़े चलो अब आतंकी सारे मार दो,
    सरहद पर तुम डटे रहो,
    गद्दार सारे मार दो,
    जब स्वतंत्र भारत….
    भरा हुआ है भ्रष्टो से समाज ये सुधार दो,
    करो खत्म भ्रस्टाचारी और भ्रष्टाचार को उखाड़ दो,
    छुपा हुआ काला धन उस धन को भारत राज दो,
    जब स्वतंत्र भारत….
    तुम सो रहे घरों में हो बेफिक्र मेरे साथियों,
    वो जग रहे हैं रात दिन सरहद पे भारतवासियों,
    तुम छुप रहे आँचल में माँ के पा रहे दुलार हो,
    वो चुका रहे हैं क़र्ज़ माँ सरहद पे मेरे साथियों,
    तुम खा रहे पकवान वो खा रहे हैं गोलियां,
    उठा रहें हैं देखो कैसे आप ही वो डोलियाँ,
    तुम जी रहे मजे में वो मर कर शहीद हो रहे,
    नमन करो नमन करो शहीद ऐसे वीरों को,
    लहरा रहे तिरंगा जो सरहद में मेरे साथियों॥
    स्वतंत्र भारत राज…
    राही (अंजाना)

  • मेरा भारत मा

    तुम्हारी कंधे पर, झुकती है हिमालय

    तुम्हारी छाती से फूटती है गंगा

    तुम्हारी आचल के कोने से  निकलती है हिंद महासागर

    मुझे गर्व है कि जन्म इस भूमी के

    जिसके लिए विश्व तरसे

    मा तुम्हे प्रणाम है, मुझे हिन्दुस्तानी कहलाते

    छोटी उच्चा हो जाता है, तिरंगा लहराते ।।

  • स्वतंत्रता दिवस

    कदम कदम बढ़ा रहे हैं,
    अपनी छाती अड़ा रहे हैं,
    कश्मीर की धरती पर वो सैनिक अपनी,
    माँ का गौरव बढ़ा रहे हैं,
    तोड़ रहे है दुश्मन पल पल,
    सरहद की दीवारे हैं,
    वीर हमारे इनको घुसा के धूल चटा रहे है,
    जो साथ में रहकर साले पीठ में छुरा घुसा रहे हैं,
    देश के जवान सामने से इनको इनकी औकात दिखा रहे हैं॥

    राही (अंजाना)

  • स्वतंत्रता दिवस

    चलो मिलकर एक नया मुल्क बनाते हैं,
    जहाँ सरहद की हर दिवार मिटाते हैं,
    छोड़ कर मन्दिर मस्ज़िद के झगड़े,
    हरा और भगवा रंग मिलाते हैं,
    चलो मिलकर एक…..
    जिस तरह मिल जाते हैं परिंदे परिंदों से उस पार बेफिकर,
    चलो मिलकर हम भारत और पाकिस्तान को एक आइना दिखाते हैं,
    जब खुदा एक और रंग एक है खून का तो,
    चलो मिलकर हम सारी सर ज़मी मिलाते हैं॥
    चलो मिलकर एक नया मुल्क बनाते हैं॥
    राही (अंजाना)

  • स्वतंत्रता दिवस

    धरती माँ फिर त्रस्त हुई हैं
    आतंकी गद्दारों से,
    खेल लाल रंग की होली अब,
    धरती माँ को मुक्त करो,
    बढ़ो वीर तुम खूब लड़ो अब,
    इन दुश्मन मक्कारों से,
    धरती माँ फिर त्रस्त हुई है आतंकी गद्दारों से॥
    घाटी में घट घट में फैले
    आतंकी शैतानों को,
    मार गिराओ इस माटी के,
    घुसपैठी गद्दारों को,
    धरती माँ फिर त्रस्त हुई है आतंकी गद्दारों से॥
    बढ़ो वीर तुम आगे बढ़कर,
    आतंकी टेंक को नष्ट करो,
    फेहराकर घाटी में विजय तिरंगा,
    आतंकी मनसूबा ध्वस्त करो,
    धरती माँ फिर त्रस्त हुई है आतंकी गद्दारों से॥
    राही (अंजाना)

  • देश के इसी हालात पर रोना है

    देश के इसी हालात पर तो रोना है,
    69 साल हो गए आजादी के
    फिर भी आँखें भिगोना है,
    रो रहा कोई रोटी को
    और किसी के पास सोना-ही-सोना है,
    देश के इसी हालात पर तो रोना है।

    भारत के वीर सपूतों ने आज़ादी के लिए
    दिए थे अपने प्राण,
    पर आज लग रहा है
    व्यर्थ चला गया उनका बलिदान,
    आज देश में
    चारो ओर फैला है भ्रष्टाचार,
    लोग भूल गए हैं
    अपनी सभ्यता-संस्कृति और संस्कार,
    बापू ने कहा था
    हिंसा छोड़,अहिंसा के बीज बोना है,
    हम भूल गए उनकी बात
    और सोचा, देखेंगे जो भी होना है,
    देश के इसी हालात पर तो रोना है।

    चंद्रशेखर आजाद ने स्वयं को गोली मार
    दिलाई हमें स्वतंत्रता,
    पर आज स्वतंत्रता दिवस मनाना
    रह गयी महज एक औपचारिकता,
    आज़ादी के दिन हम
    फहराते हैं अपना तिरंगा प्यारा,
    पर कितना प्यार है हमें तिरंगे से
    ये बताता है कर्म हमारा,
    नहीं जानते हम महिला स्वतंत्रता सेनानियों के नाम
    और सोचते हैं,उनसे हमें क्या लेना है,
    पर इतना जरूर जानते हम
    किस फ़िल्म में आलिया और किसमें कैटरीना है,
    देश के इसी हालात पर तो रोना है।

    नेताजी सुभाषचंद्रबोस ने हमारे लिए
    लड़ा था स्वतंत्रता संग्राम,
    पर आज के नेताओं ने तो
    नेता शब्द को ही कर दिया है बदनाम,
    नेताओं ने काफी ठेस पहुंचाई है
    इस देश की गरिमा और आन को,
    तभी तो नेता बनने में हिचक होती है
    एक अच्छे इंसान को,
    नेताओं ने यह ठान लिया है
    देश की संपत्ति को जितना हो सके
    ढोना है,
    देश के इसी हालात पर तो रोना है।

    अब हमें ही अपने देश के लिए
    पड़ेगा कुछ करना
    भ्रष्टाचारियों के खिलाफ
    हमें ही पड़ेगा लड़ना,
    ऐसा तभी संभव है
    जब बदल जाएँ लोगों के विचार,
    लोगों को रखनी होगी सहयोग भावना
    भूलकर अपनी जीत और हार,
    आज़ाद हो गए हम
    पर हमारी सोच को अभी भी
    आज़ाद होना है,
    देश के इसी हालात पर तो रोना है।
    देश के इसी हालात पर तो रोना है।

    ©विनायक शर्मा

  • दिल में हिन्दुस्तान है

    दिल में हिन्दुस्तान है

    है जिगर शेरों सा मेरा बाज़ुओं में जान है।
    दिल में हिंदुस्तान है साँसों में हिंदुस्तान है।

    देश भक्ती की लहर नस नस में भर दे जो मिरी।
    सारी दुनिया से निराला मेरा राष्ट्रीय गान है।

    देश की खातिर लुटाना हमको अपनी जान है।
    देश भक्तों से हमारे देश की पहचान है।

    हिन्दु मुस्लिम सिख ईसाई दुनियावी पहचान है।
    रब ने पैदा ऐक जैसा ही किया इंसान है।

    सब सुभाशो चंद्र शेखर और भगत जैसे है हम।
    सर कटाना देश की खातिर हमारी शान है।

    सब लरज़ जाएंगे दुश्मन जब दहाड़ेगा तलत।
    दिल में हिंदुस्तान है नस नस में हिंदुस्तान है।

    “डॉ तलत खान”
    कोटा राजस्थान

  • आजाद तेरी आजादी

    भारत मां के अमर पुत्र “चन्द्रशेखर आजाद” की पुण्य तिथि पर मेरी एक तुच्छ सी रचना l

    रचना का भाव समझने के लिये पूरी रचना पढेl”

    **आजाद तेरी आज़ादी की अस्मत चौराहों पर लूटी जाती है**

    शत बार नमन ऐ हिंद पुत्र!

    शत बार तुम्हें अभिराम रहे,

    आज़ाद रहे ये हिंद तुम्हारा,

    आज़ाद तुम्हारा नाम रहे l

    याद बखूबी है मुझको कि तुमने क्या कुर्बान किया,

    आजाद थे तुम और अन्तिम क्षण तक आज़ादी का गान किया,

    बचपन, यौवन, संगी-साथी, सब तुमने वतन को दे डाला,

    अपनी हर इक सांस को तुमने हिंद पे ही बलिदान किया,

    मगर सुनो ऐ हिंद पुत्र-

                                 अब तो उस आजादी की बस गरिमा टूटी जाती है,

    और भरे चौराहों पर उसकी इज्जत लूटी जाती है l

    जिसकी खातिर लाखों वीरों ने अपना सर्वस्व मिटा डाला,

    निष्प्राण किया खुद को फ़िर उसके अभिनन्दन को बिछा डाला,

    आजाद हिंद का आसमान अब उसपर  कौंधा जाता है,

    और उसी आजादी को अब पैरों से रौंदा जाता है,

    उस आजादी को लिखने पर आंख से नदियां फूटी जाती हैं,

    आजाद तेरी आजादी की इज्जत चौराहों पर लूटी जाती है ll

    तुमने शीश चढाया था कि हिंद ये जिन्दाबाद रहे,

    तुम ना भी रहो फ़िर भी ये रहे, आजाद रहे आबाद रहे,

    तुम्हारा इंकलाब अब देशद्रोह के पलडो में तोला जाता है,

    और हिंद की मुर्दाबादी का नारा खुलकर बोला जाता है,

    अब हिंद के जिन्दाबाद पे तेरी जनता रूठी जाती है,

    आजाद तेरी आजादी की इज्जत चौराहों पर लूटी जाती है l

    जिस आजादी के सपनों में तुमने सुबह-ओ-शाम किया,

    राजदुलारों ने उसको चौराहों पर नीलाम किया,

    संसद के दुस्साशन उसका चीरहरण कर लेते है,

    और हवस की ज्वाला अपनी आंखों में भर लेते हैं ,

    सर्वेश्वर श्री कृष्ण की गाथा अब बस झूठी जाती है,

    आजाद तेरी आजादी की इज्जत चौराहों पर लूटी जाती है ll

    आज तुम्हारी पुण्य तिथि पर ये सब सोच के आंखें रोयी थीं,

    इसी हिंद की मिट्टी में तुमने अपनी शहादत बोयी थी,

    आज तुम्हारी कुर्बानी पर ये लोग तो ताने कसते हैं,

    ये आस्तीन के सांप हैं अपने रखवालों को डंसते हैं,

    और भला क्या लिखूं?

                                कलम हाथ से छूटी जाती है,

    आजाद तेरी आजादी की इज्जत चौराहों पर लूटी जाती है ll

    All rights reserved.

                         -Er Anand Sagar Pandey

  • Happy Independence Day

    Watan hamara misaal mohabat ki,
    Todta hai deewaar nafrat ki,
    Meri Khush naseebi,
    Mili zindagi is chaman mein Bhula na
    Sake koi iski khushbo saton janam mein.
    Happy Independence Day!

    – Yash

  • आज़ादी

    खून से मिली आज़ादी हैं ,
    जूनून से मिली आज़ादी हैं ,
    बलिदान से मिली आज़ादी हैं
    सोचने की आज़ादी हैं ,
    लिखने की आज़ादी हैं ,
    इस देश मैं आज़ादी ही आज़ादी हैं

    भूल हम जाते हैं बस ऐसे की ,
    कितने बलिदानों के बाद मिली हैं यह आज़ादी हैं ,
    चलो हम याद करे उन सपूतो को ,
    जिनके लिए मिली हमे यह आज़ादी हैं

  • मैं आज़ाद हूँ

    मैं आज़ाद हूँ

    मैं आज़ाद हूँ ,
    तुम लोग मुझे पागल कहोगे ,
    मैं आज़ाद हूँ आपसी घृणा से ,
    आपसी बैर से ,
    मैं आज़ाद हूँ

    मैं आज़ाद हूँ ,
    धन का मेरा कोई मोल नहीं हैं ,
    मन का मोल ही सब कुछ मेरा हैं ,
    मैं आज़ाद हूँ ,
    तुम लोग मुझे पागल कहोगे

  • क्या आप राष्ट्र वादी हैं?

    क्या आप राष्ट्र वादी हैं?

    आज सुबह से मैं,
    राष्ट्रवादी खोज रहा हूँ।
    कौन-कौन है देशभक्त
    ये सोच रहा हूँ॥
    सुबह-सुबह किसी ने
    दरवाजा खटखटाया,
    देखा तो कन्हैया आया।
    उसके हाथ में दूध के डिब्बा था।
    उसके पास अपना ही किस्सा था।
    देखकर -मुझे कहने लगा
    कवि साहेब- बर्तन लेकर आओ।
    चुपचाप क्यों खड़े हो, बताओ?
    मैं तो
    आज राष्ट्रवादीयों को खोज रहा हूँ।
    कौन-कौन है राष्ट्रवादी सोच रहा हूँ।।
    इसीलिए दूध वाले पूछ बैठा,
    कन्हैया- क्या तुम राष्ट्र वादी हो?
    देशभक्ति का पहचान बताओ?
    देश के लिए क्या हमें समझाओ?
    कन्हैया को शायद कुछ समझ आया।
    लेकिन वो जल्दी में था
    कहने लगा- अरे! दुध लेबे त चुपचाप ले।
    नहीं ते पाछु महीना के पैसा बाचे हे, तेला दे।
    सुत के उठे हवं तब ले परेशान हवं।
    बिहनिया-बिहनिया नोनी के दाई जगा दिस।
    भईस हा बीमार हे मोला बता दिस॥
    दऊड़त-दऊड़त जाके डाक्टर ल लाये हवं।
    तभे भईस ल मेहा दुहु पाये हवं।
    तब तो देरी से आय हवं।
    तेहाँ आठ के बजत ले सुते हस।
    मोर उठाय मा उठे हस।
    अब पुछत हस
    कोनो देशभक्ति के काम करे हवं।
    ये तोर दरवाजा मा आके दुध ल धरे हवं।
    समझ ले इही राष्ट्र वादी काम मय ह करे हवं।
    उसके जवाब से मैं
    संतुष्ट नहीं हो पाया।
    इसलिए क्योंकि
    शायद मुँह भर जवाब पाया।

    अब मैं नहाधोकर तैयार हूँ।
    पूछने के लिए बेकरार हूँ।
    क्या आप राष्ट्रवादी हैं?
    लो! अब सब्जी वाली आई है।
    पालक, गोभी, भिंड़ी लाई है।।
    मैंने उनसे तपाक से पूछ ही लिया।
    क्या आप राष्ट्र वादी हैं।
    हमको जरा बताइये।
    मन में उलझन है सुलझाईये।
    अब सब्जी वाली कहने लगी-
    ये गौटनीन सुन तो वो
    तुहंर घर के गौटिया ह संझा किन
    चढ़ाय रहीस का?
    जा तो जा वोकर घर बेचाथे,
    उतरा हर,
    ले के आ।
    बिहनिया-बिहनिया ले काय-काय
    पुछत हे।
    भगवान जाने ये मरद मन काय-काय
    सुझत हे।
    काला बताववं दाई
    हमर घरवाला हर रात किन पी के आय रहीस।
    एकेला कुकरा चुरोके खाय रीहीस।
    किराहा ह रात-भर बडबडाईस हे।
    बिहानिया ले उतारा बर मोला ठठाईस हे।
    कनिहा मा लोर पर गे हाबय,
    तभो ले साग बेचे बर आय हवं
    भूखे-प्यासे हाबवं, कुछू न ई खाय हवं।
    लागथे तुंहरो घर मा उही हाल हे।
    गौटिया घलो दारु के बीमार हे।
    अब तो शराबी होने का घूट भी पी गया।
    जाने कैसे मैं जी गया।

    अभी भी तलाश जारी है
    राह चलते लोगों से
    पूछने की बारी है।
    कि क्या आप राष्ट्रवादी हैं?
    रामु अपने कंधे में हल
    सिर पर बोरी लेकर
    दो बैलों के पीछे-पीछे जा रहा था।
    मोर खेती-खार रुमझुम
    गुनगुना रहा था।
    मैं भी उसके पीछे हो लिया।
    और वही सवाल उसे भी दिया।
    रामु भैय्या बताओ क्या आप राष्ट्र वादी हैं।
    रामु कहने लगा- राष्ट्र ल त समझत हवं।
    फेर वादी समझ नई आवत हे।
    बता तो भैय्या ये कोन दुकान मा बेचावत हे का?
    नहीं त बता भैय्या सरकार ह
    कोनो नवा योजना चलावत हे का?
    काला दुख ल बताववं भैय्या
    छेरी ल बेच के शौचालय ल बनाय हवं ।
    बारा हजार मिलही किहीस
    फेर एको किस्त नई पाय हवं।
    भुरवा के दाई ह रोज झगरा मतावत हे।
    छेरी के मोहो मा दु दिन होगे न ई खावत हे।
    एसो बादर-पानी बने गिर जाय।
    हम किसान मन के दिन फिर जाय।
    तहान सबो वाद ल अपनाबो।
    एक ठन उहूँ ल दू तीन ठन बनाबो।
    यहाँ भी मैं उदास हो गया।
    लगा सारा दिन बरबाद हो गया।
    सवाल अभी भी बाकी है।
    क्या आप राष्ट्र वादी हैं।

    अभी रात के नौ बज रहे हैं।
    टीवी पर प्राईम टाईम चल रहा हैं।
    वाट्स अप से एक-एक करके
    मैसेज निकल रहा है।
    मैं फेसबुक पर व्यस्त हूँ।
    दिन भर काम-धाम के बाद मस्त हूँ।
    अब महसूस हो रहा है कि
    मैं राष्टवादियों के बीच हूँ।
    समझ गया मैं भी क्या चीज हूँ।
    लेकिन मैं सोच रहा हूँ
    राष्ट्र वादी कौन है
    वो जो मुझे दिन में मिले,
    या फिर जो रात के नौ बजे के बाद
    टी वी पर फेसबुक या वाट्स अप मिल रहे हैं।
    लेकिन सवाल अभी भी बाकी है।
    क्या आप राष्ट्रवादी हैं?
    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़

    7693919758

  • तुम वीर मेरे

    तुम वीर मेरे तुम वीर मेरे
    हम साथ तेरे मनमीत मेरे

    जिस पल लगे तुम हार गये
    समझो उस पल तुम जीते गये

    आजा के अब अँखिया तरस गई
    आँखों के आँसू सूख गये

    तुम हो और रहोगे हमेशा दिल में
    आवाम ये कहते रह गये..

    #UniqueMaya

  • भारत माँ

    चूड़ियाँ पहनी जिन हाथों में,
    मैं तलवार उठा सकती हूँ।

    नहीं देश का एक कोना दूँगी,
    बदले में जां दे सकती हूँ।

    जिन्होंने मुझे खोटा समझा,
    उन्हें गर्व करा सकती हूँ।

    पापा ने समझा खोटा सिक्का,
    भारत माँ, मैं खरा बन सकती हूँ।

    #UniqueMaya

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