Tag: बेटी पर मार्मिक कविता

  • नारी…..

    नारी…..

    ईश्वर की अनूठी रचना हूँ मै
    हाँ ! नारी हूँ मैं ………

    कभी जन्मी कभी अजन्मी हूँ मैं ,
    कभी ख़ुशी कभी मातम हूँ मैं .

    कभी छाँव कभी धूप हूँ मैं,
    कभी एक में अनेक रूप हूँ मैं.

    कभी बेटी बन महकती हूँ मैं,
    कभी बहन बन चहकती हूँ मैं .

    कभी साजन की मीत हूँ मैं ,
    कभी मितवा की प्रीत हूँ मैं .

    कभी ममता की मूरत हूँ मैं ,
    कभी अहिल्या,सीता की सूरत हूँ मैं .

    कभी मोम सी कोमल पिंघलती हूँ मैं,
    कभी चट्टान सी अडिग रहती हूँ मैं .

    कभी अपने ही अश्रु पीती हूँ मैं,
    कभी स्वरचित दुनिया में जीती हूँ मैं .
    ईश्वर की अनूठी रचना हूँ मै,
    हाँ ! नारी हूँ मै …..
    – पूनम अग्रवाल …..

  • Prasoon Joshi’s Powerful Poem For The Daughters

    Prasoon Joshi’s Powerful Poem For The Daughters

    शर्म आ रही है ना
    उस समाज को जिसने उसके जन्म पर
    खुल के जश्न नहीं मनाया
    शर्म आ रही है ना
    उस पिता को उसके होने पर
    जिसने एक दिया कम जलाया
    शर्म आ रही है ना
    उन रस्मों को उन रिवाजों को
    उन बेड़ियों को उन दरवाज़ों को
    शर्म आ रही है ना
    उन बुज़ुर्गों को
    जिन्होंने उसके अस्तित्व को
    सिर्फ़ अंधेरों से जोड़ा
    शर्म आ रही है ना
    उन दुपट्टों को
    उन लिबासों को
    जिन्होंने उसे अंदर से तोड़ा
    शर्म आ रही है ना
    स्कूलों को
    दफ़्तरों को
    रास्तों को
    मंज़िलों को
    शर्म आ रही है ना
    उन शब्दों को
    उन गीतों को
    जिन्होंने उसे कभी
    शरीर से ज़्यादा नहीं समझा
    शर्म आ रही है ना
    राजनीति को
    धर्म को
    जहाँ बार बार अपमानित हुए उसके स्वप्न
    शर्म आ रही है ना
    ख़बरों को
    मिसालों को
    दीवारों को
    भालों को
    शर्म आनी चाहिए
    हर ऐसे विचार को
    जिसने पंख काटे थे उसके
    शर्म आनी चाहिए
    ऐसे हर ख़याल को
    जिसने उसे रोका था
    आसमान की तरफ़ देखने से
    शर्म आनी चाहिए
    शायद हम सबको
    क्योंकि जब मुट्ठी में सूरज लिए
    नन्ही सी बिटिया सामने खड़ी थी
    तब हम उसकी उँगलियों से छलकती रोशनी नहीं
    उसका लड़की होना देख रहे थे
    उसकी मुट्ठी में था आने वाला कल
    और सब देख रहे थे मटमैला आज
    पर सूरज को तो धूप खिलाना था
    बेटी को तो सवेरा लाना था
    और सुबह हो कर रही ।

    – Prasoon Joshi

  • बेटी बचाओ – बेटी पढाओ

    उसके सिर्फ दो बेटियाँ थी
    दोनों सरकारी स्कूल मैं पढती थी
    अबकी उन्हें सिर्फ बेटा ही चाहिए था
    लेकिन फिर से बेटी हो गई
    अभी आधा घंटा ही जी पाई थी
    अल्लाह को प्यारी हो गई
    घर में खुशी का माहौल था
    जैसे कुछ हुआ हीं नहीं था
    दोनों बेटियाँ मां से पूछ रही थी
    माँ दादी ने गुड़िया को क्यों मारा
    क्या वे हमें भी मार डालेंगी
    दोनों बहनें सहम – सहम कर जीने लगी
    और ऊँची – ऊँची डिग्रियां लेकर बड़ी हो गई
    आज वो माँ – बापू पर बोझ नहीं थी
    अपने रुपयों से ब्याह करवा रही थी
    फिर क्यों बेटियों को बोझ समझा जाता है
    क्यों बेटों से कम समझा जाता है

    प्रस्तुति – रीता अरोरा

  • फरमाइश

    फरमाइश

    मांगे जब भी तब उस बेटी की हर हरमाइश् पूरी हो,
    ऐ खुदा काबिल बना दे, हर बाप को इतना के उसकी कभी जेब ना ढीली हो,
    उठा दे उन्गली बेटी जिस तरफ ज़माने में,
    हो पूरी हर ख्वाइश उसकीपर कभी बाप की नज़र ना नीची हो॥
    Raahi (अंजाना)

  • आज़ाद हिंद

    आज़ाद हिंद

    सम्पूर्ण ब्रहमण्ड भीतर विराजत  !

    अनेक खंड , चंद्रमा तरेगन  !!

    सूर्य व अनेक उपागम् , !

    किंतु मुख्य नॅव खण्डो  !!

     

    मे पृथ्वी भूखंड !

    अति मुख्य रही सदा   !!

    यहा पर , सप्त द्वीप !

    जॅहा पर , उन समस्त !!

     

    द्वीप मे प्रमुख रहा  !

    भारत का द्वीप सदा !!

    यहाँ पर , भारत को !

    नमाकन कर सोने की !!

     

    चिड़िया ,हिंदोस्ताँ व भारत !

    की उपाधि दे डाली !!

    भारत मेरा प्रतिभाशाली रहा !

    पृथ्वी के आरंभ से  !!

     

    ही तो कमी यहाँ !

    किस बात की रही !!

    महा कवियो मे महाकवी !

    कालिदास , माहाऋषि मे मःआॠषी !!

     

    बाल्मिकी आदि समान महारत्न  !

    पनपे , रचे जिन्होने महाकवय  !!

    सहित रामायण सम्मुख भाती !

    – भाती के ज्ञानवान रत्न  !!

     

    तब पर भी कमी !

    कदाचित् कहाँ थी , सोने !!

    की चिड़िया के पर !

    रोंद कर लूट रहा !!

     

    था ,उसे कोई न कोई  !

    मानो बन के हमराही  !!

    जिस भारत ने संसार  !

    को शून्य व दशमलव !!

     

    दे कर गिनती सिखाई !

    आर्यभट्ट -. चाणक्य की निंदा !!

    नाही , ओषधि मे महात्मा !

    बुद्ध बने जगत के !!

     

    अनुरागी ,योग व ओषधि !

    से करत चले गये !!

    दूर समस्त बुराई , आज !

    इस भारत की दुर्गति !!

     

    देखो के प्रत्येक रास्ट्र !

    अभी भी लूटना चाहता  !!

    हो इसे भाई , वह !

    समाए क्या कम था !!

     

    जब जो भक्ति काल !

    से आदि काल से !!

    लेकर आधुनिक काल तलाक़ !

    डच-डेनिश , मुगल-हीमायू !!

     

    अकबर – बाबर ने लूटा !

    से .क्षतिग्रस्त करा भारत !!

    के प्रत्येक राज्य के !

    कन- कन को , जैसे  !!

     

    हो बचा  कही कोई !

    अंदेशा नहीं तब  कर  !!

    भी ,पनपे भारत के !

    भाषीय स्तर पर धुरन्दर !!

     

    महाकवी तुलसीदास ,सूरदास व !

    कबीरदास तो सभी अब !!

    भी ईर्षा क्या कम !

    थी जो , आगमन अंग्रेज़ो !!

     

    का हो गया, सोना !

    उगलने वाली माटी को !!

    अफ़सोस तब पर भी !

    न हुआ , ब्रहमण्ड -क्षत्रिय  !!

     

    शुद्रा व वैश्य क्या !

    बैर रखते जब चोट !!

    पड़ती थी खानी अंग्रेज़ो !

    की , गुलामी के दिवस  !!

     

    मे क्या चोट थी !

    वह कुछ नहीं दर्द !!

    तो कायम रही ह्रदाए !

    के भीतर , नस्तर समान !!

     

    चूबा रहे थे सर्यंत्र !

    स्वयं का मानो यह !!

    रास्ट्र हो,उनका ससुराल !

    बहन-बेटी की इज़्ज़त !!

     

    से खेल, भाइयो के !

    खून का कर रहे !!

    थे व्यापार , वह तो !

    क्रांतिवीर थे जिन्होने गरमदल !!

     

    व नरमदल रूप मे !

    कई सारे अथक प्रयास !!

    करे , राष्ट्र की आज़ादी !

    हेतु कई वीर मृत्यु  !!

     

    के घाट जले , फाँसी !

    चड़े अजर-अमर मंगल पांडे !!

    राजगुरू -सुखदेव व भग्त सिह  !

    न जाने आज कहाँ !!

     

    गये जो बच गये !

    वे तो मानो आज !!

    भी राजनेताओ के रूप  !

    मे दीमक बन अंग्रेज़ो !!

     

    के शासन का पालन  !

    ही करते जा रहे  !!

    है , भारतीय सभ्यता को !

    पश्चिमी सभ्यता ने लूटा !!

     

    अब नग्नता उमड़ रही !

    यहाँ पर है , पन्द्रह !!

    अगस्त १९४७ की पहचान  !

    करू तो करू किससे !!

     

    जब आज भी राष्ट्र !

    स्वयं के जातिवाद के !!

    गुलामी से जूज रहा है !

    अंबेडकर जी के क़ानून !!

     

    पस्त होते दिख रहे !

    हिंदू मुस्लिम सिख व ! !

    ईसाई समस्त कोई दुर्जन !

    बन आपस मे लड़ !!

     

    रहा , आज भी खून !

    ख़राबा , बलात्कार व नारी !!

    पर अत्याचार है , बंधुवा !

    मज़दूरी मे बँधा वह !!

     

    बालक मजदूर बेबस व !

    लाचार है, क्या खूब !!

    पदवी है , मेरे राष्ट्र !

    ” आज़ाद हिंद ”   की के !!

     

    ये आज़ाद हो कर !

    भी पूर्ण रूप से लाचार !!

    है , अपाहिज व बीमार  !

    है , ग़रीबो का शोषण !!

     

    थाना कचहरी मे मानो !

    अमीरो की सरकार है !!

    योग्य व्यक्ति लगता ठेला !

    अग्यानी व्यक्ति करता  देश !!

     

    का व्यापार है , कोन !

    कहता की आज १५ !!

    अगस्त २०१६ तलक मे भी !

    हमारा हिंदोस्ताँ आज़ाद है !!

     

    यह तो बेबसी मे !

    डूबता जाता किंतु लगता !!

    किसी ने मुख्य मंत्री रूप !

    मे इसे संभालना चाहा !!

     

    तो भी उस दीलेर !

    पर लगे  कई इल्ज़ाम !!

    है , कुरीतीयो मे डूबा !

    विष को जहन मे !!

     

    रख जूबा से उडेलता !

    ख़ाता रास्ट्र की व !!

    अलकता अन्य की वह !

    दुराचार व पाखंड मृत्युदंड !!

     

    के काबिल भया ,अब्दुल  !

    रहीम  , यह समस्त अंश !!

    ” आज़ाद हिंद ” के रहे !!

    न जाने क्यो आज !!

     

    भी ह्रदय ,भारत के !

    आज़ाद होने पर भी !!

    रूदन कर रहा !!!

  • बेटी को घर में आने दो

    इस कलि को मुस्कुराने दो
    कोख से धरती की गोद में आने दो
    बिखेर देगी चारोंतरफ खुशियाँ
    खुल के तो इसे मुस्कुराने दो।
    बेटी को घरस में आने दो।>2
    रोपित करो इसे अपने आँगन में
    इसकी नज़र-२ तेरा नजरिया बनेगी
    इसकी धड़कन-२ तेरी दुआ बनेगी
    इसकी साँस-२ तेरी महक बनेगी
    इसकी बात-२ तेरी चहक बनेगी
    इसकी कदम-२ तेरे चिन्ह बनेंगे
    इसके हाथ-२ तेरी पहचान बनेंगे
    इसे अपने आकार में ढल जाने दो। बेटी को………… आने दो॥
    किलकारियाँ इसकी जब तेरे आँगन में गूँजेगी
    सन्नाटे के पहरों को तोड़ेगी।
    हर पहर इसकी मुस्कुराहटें
    तेरे दिल को सुकूँ देंगी।
    आँखों में कई ख्वाब भर देंगी इसकी बातें
    जब तेरे दिल को पढ़ लेंगी।
    एक कविता,गज़ल, गीत है हर बेटी।
    इस गीत को गुनगुनाने दो। बेटी को……………. आने दो॥
    दहेज,उत्पीड़न,शोषण कल और कल की बातें
    क्यों मन में खटास रखते हो।
    बेटे जैसा मजबूत करे, क्यों कमजोर समझते हो।
    दिल,विवेक, संवेदनाऐं दो बेटे को पत्थर नहीं।
    बेटी की सी परवरिश में पालो बेटे को भी।
    नसीहत,निगरानी बेटे के हिस्से में भी डालो
    संस्कृति,नजाकत,सृष्टि, नारी का मान सिखाओ बेटे को भी।
    कल ये हुआ !,कल कल..कल क्या होगा ?… इस डर को फिर जाने दो॥
    बेटी को घर में आने दो।>2
    इस कलि को………………………………….मुस्कुराने दो॥
    ** ” पारुल शर्मा ” **

  • विदाई गीत

    *एक विदाई गीत*

    हरे हरे कांच की चूड़ी पहन के,
    दुल्हन पी के संग चली है ।
    पलकों में भर कर के आंसू,
    बेटी पिता से गले मिली है ।

    फूट – फूट के बिलख रही वो,
    फूट – फूट के बिलख रही वो,
    बाबुल क्यों ये सजा मिली है,
    छोड़ चली क्यों घर आंगन कू,
    बचपन की जहाँ याद बसी है,

    बाबुल रोय समझाय रह्यो है
    बेटी ! जग की रीत यही है,
    राखियो ख्याल तू लाडो मेरी,
    माँ – बाबुल तेरे सबहि वही है

    नजर घुमा भइया को देखा
    भइया काहे यह गाज गिरी है,
    में तो तेरी हूँ प्यारी बहना,
    यह अब कितनी बात सही है,

    भइया सुनकर बोल बहन के,
    अंसुअन की बरसात करी है,
    रोतो रोतो यह भइया बोलो-2
    देख विधि का विधान यही है,

    बीत रही जो तेरे दिल पे बहना
    “मेरा” भी अब हाल वही है ।।

    © नवीन श्रोत्रिय “उत्कर्ष”
    +91 84 4008-4006

  • बिटिया

    दुनिया का भी दस्तूर है जुदा, तू ही बता ये क्या है खुदा?
    लक्ष्मी-सरस्वती, हैं चाह सभी की, क्यों दुआ कहीं ना इक बेटी की ?

    सब चाहे सुन्दर जीवन संगिनी, फिर क्यों बेटी से मुह फेरे ,
    लक्ष्मी रूपी बिटिया को छोड़, धन-धान्य को क्यों दुनिया हेरे |
    क्या बेटे ही हैं जो केवल, दुनिया में परचम लहरा पाते ,
    ना होती बेटी जो इस जग में, तो लल्ला फिर तुम कहाँ से आते?

    वीरता की कथा में क्यों अक्सर, बेटों की कहानी कही जाती ,
    शहीदे आज़म जितनी ही वीर, क्यों झाँसी की बेटी भुलाई जाती |
    बेटे की चाहत में अँधा होकर,क्यों छीने उसके जीवन की आस ,
    बेटी जीवन का समापन कर, क्यों भरे बेटे के जीवन में प्रकाश |

    इतिहास गवाह उस औरंज़ेब का, शाहजहाँ नज़रबंद करवाया ,
    क्या भूल गया उस कल्पना को, जिसने चंदा पर परचम लहराया |
    पुरुष प्रधान के इस जग में,क्यों बेटे की चाह में तू जीता ,
    मत भूल ! बेटी के लिए जनने वाली से पहले, पहला प्यार होता है पिता |

    सुन ले तू ऐ बेटे के लोभी, बेटी पालन तेरे बस की बात ,
    खुदा भी कैसे बख़्शे तुझे बेटी, छोटी है बहोत तेरी औकात |
    दुनिया का भी दस्तूर है जुदा, तू ही बता ये क्या है खुदा?
    लक्ष्मी-सरस्वती, हैं चाह सभी की, क्यों दुआ कहीं ना इक बेटी की ?

  • बेटी का हर रुप सुहाना

    बेटी का हर रुप सुहाना

    बेटी का हर रुप सुहाना, प्यार भरे हृदय का,

    ना कोई ठिकाना, ना कोई ठिकाना।।

    ममता का आँचल ओढे, हर रुप में पाया,

    नया तराना, नया तराना।।

    जीवन की हर कठिनाई को, हसते-हसते सह जाना,

    सीखा है ना जाने कहाँ से उसने, अपमान के हर खूँट को,

    मुस्कुराकर पीते जाना, मुस्कुराकर पीते जाना।।

    क्यों न हो फिर तकलीफ भंयकर, सीखा नहीं कभी टूटकर हारना,

    जमाने की जंजीरों में जकड़े हुये, सीखा है सिर्फ उसने,

    आगे-आगे बढ़ते जाना, आगे-आगे बढ़ते जाना।।

    बेटी का हर रुप सुहाना, प्यार भरे हृदय का,

    ना कोई ठिकाना, ना कोई ठिकाना।।

    – Anika

  • बचपन का खेल

    Shakun Saxena
    उछाल उछाल कर पापा मुझे दिल्ली दिखाते थे,
    हंस हंस कर पापा को मैं खूब रिझाती थी,
    भरोसे का अटूट रिश्ता था हमारा,
    छूट कर हाथो से मैं फिर हाथो में आ जाती थी,
    आज पापा मुझको हाथों में उठा नहीं पाते,
    उछाल कर मुझको वो दिल्ली दिखा नहीं पाते,
    उछलकर देखती हूँ मैं खुद पर मुझे कोई दिल्ली नहीं दिखता,
    होटो पर हंसी का अब कोई गुव्वारा नहीं फूटता,
    सोंचती हूँ पापा मुझे कैसे उड़ाते थे,
    कैसे मेरी आँखों को वो दिल्ली दिखाते थे,
    मैं फूले ना समाती थी हंस हंस कर रो जाती थी,
    काश हो जाऊ मैं फिर एक बार छोटी,
    बन जाउ फिर पापा की वो प्यारी सी बेटी,
    छू लू फिर आसमाँ पापा के हाथो से उछलकर,
    देख लू एक बार फिर मैं अपने बचपन की दिल्ली॥
    राही (अंजाना)

  • || दहेजी दानव ||

    बेटा अपना अफसर है..
    दफ्तर में बैठा करता है..
    जी बंगला गाड़ी सबकुछ है..
    पैसे भी ऐठा करता है..

    पर क्या है दरअसल ऐसा है..
    पैसे भी खूब लगाए हैं..
    हाँ जी.. अच्छा कॉलेज सहित..
    कोचिंग भी खूब कराए हैं..
    प्लस थोड़ा एक्स्ट्रा खर्चा है..
    हम पूरा बिल ले आए हैं..

    टोटल करना तो भाग्यवान..
    देखो तो कितना बनता है..
    जी लगभग पच्चीस होता है..
    बाकी तो माँ की ममता है..

    जी एक अकेला लड़का है..
    उसका कुछ एक्स्ट्रा जोड़ूँ क्या..
    बोलो ना कितना और गिरूँ..
    सब मर्यादाएँ तोड़ूँ क्या..

    हाँ.. हाँ सबकुछ जोड़ो उसमें..
    जितना कुछ वार दिया हमने..
    उसका भी चार्ज लगाओ तुम..
    जो प्यार दुलार दिया हमने..

    संकोच जरा क्यों करती हो..
    भई ठोस बनाओ बिल थोड़ा..
    बेटा भी तो जाने उसपर..
    कितना उपकार किया हमने..

    तो लगभग तीस हुआ लीजै..
    थोड़ा डिस्काउंट लगाते हैं..
    बेटी भी आपकी अच्छी है..
    उन्तीस में बात बनाते हैं..

    वधुपक्ष व्यथित सोचने लगा..
    सन्दूकें तक खोजने लगा..
    जो-जो मिलता है सब दे दो..
    लड़की का ब्याह रचाना है..
    गर रिश्ता हाथ से जाता है..
    कल फिर ऐसा ही आना है..

    था दारुण दृश्य बड़ा साहब..
    आँखों में न अश्रु समाते थे..
    जेवर, लहंगा, लंगोट बेच..
    पाई-पाई को जमाते थे..

    यह देख वधु के अंदर की..
    फिर बेटी जागृत होती है..
    वह पास बुलाकर के माँ को..
    कुछ बातें उस्से कहती है..

    है गर समाज की रीत यही..
    तो रत्ती भर न विचार करो..
    अब मुझपर दांव लगाकर तुम..
    यह पैसों का व्यापार करो..

    फिर देखो कैसे मैं अपनी..
    माया का जाल चलाती हूँ..
    दो चार महीने फिर इनको..
    मैं यही दृश्य दिखलाती हूँ..

    बेटा न बाप को पूछेगा..
    माँ कहने पर भी सोचेगा..
    देदो जितना भी सोना है..
    सबकुछ मेरा ही होना है..

    बस दहेज़ का दानव यूँ ही..
    अपना काम बनाता है..
    रिश्तों की नींव नहीं पड़ती..
    यह पहले आग लगाता है..

    रिश्ते रुपयों की नीवों पर..
    मत रखो खोखली होती है..
    कुट जाती जिसमें मानवता..
    यह वही ओखली होती है..

    बेटे को शिक्षित करो मगर..
    विद्वान बनाना मत भूलो..
    भिक्षा, भिक्षा ही होती है..
    कहकर दहेज़ तुम मत फूलो..

    कि इस दहेज़ के दानव का..
    अब जमकर तुम संहार करो..
    उद्धार करो.. उद्धार करो..
    मानवता का उद्धार करो..

    -सोनित

  • मुक्तक-मनहरण घनाक्षरी

    मुक्तक छंद – वार्णिक (मनहरण घनाक्षरी)
    सामांत-आई
    पदांत- है
    ८८८७-१६-१५
    पहले जो पढने में गदहे कहलाते थे
    उनकी भी दिखती आज नही परछाई है !
    नवयुग के बच्चे देते एक भी जवाब नही
    पता नही चलता कैसी करते पढाई है !!
    लाज और लिहाज सब दूर हो गये सभी
    बाप के ही सामने में करते ढीठाई है !
    कहत मतिहीन कवि डांट जो पिलाई तो
    बेटी ने भाग घर से नाक कटवाई है ||
    पढते भी कैसे जब शासन प्रशासन ने
    बिना पढै पास करै बीणा उठाई है |
    काम के अभाव में बेरोजगारी बढ गई
    डिग्रीधारी को महंगी हुई पाई पाई है ||
    उपाध्याय…

  • परी

    मिट्टी से गढ़ी है, 

    नन्ही सी परी है, 

    ना माँ की दुलारी,

    ना बाबा की प्यारी,

    ये सङकें ही घर है इसका ,

    यहीं सारा जग है जिसका ।

    ना गुङिया,मोटर गाङी, 

    ना बर्तन,कप-प्लेट,ना रेलगाङी,  

    कोई खिलौना नही खेलने को,

    नही कोई झूला झूलने को,

    बस है भूख और गरीबी,

    कोई और नही,बस यही दोनों इसके करीबी।

    ऊपर खुला आसमान, 

    नीचे गर्मी और थकान, 

    कभी सर्दी की रातों की ठिठुरन,

    कभी बरसात में बचता,बचाता भीगता बदन,

    सूरज,चंदा इसके साथ ही चलते,

    आजू-बाजू,बस,साईकिल और गाङियाँ भगते।

    माँ -बाबा सब खो जाते हैं,

    अपने कामों में रम जाते हैं,

    रह जाती है बस यही अकेली,

    ना कोई दोस्त,ना सहेली,

    मिट्टी ही है इसका खिलौना, 

    मिट्टी ही इसका बिछौना । 

    अपनी नन्हीं मुट्ठियों में भर मिट्टी, 

    कभी बिखेरती, कभी समेटती, 

    कभी उसी से मानों किस्मत की लकीरें बनाती, 

    फिर नन्ही उंगलियों से उन्हें मिटाती, 

    देखो तो विधाता का खेल, 

    नन्ही परी से करवाया मिट्टी का मेल ।

    रूखे-सूखे से हैं उसके बाल, 

    आज़ाद सी उसकी चाल, 

    चेहरे पर छोटी सी नाक 

    और मासूमियत से भरे हुए दो आँख, 

    सूरज से तपा बदन, 

    कुदरत का एक अनमोल रतन ।

    तप-तपकर भई सोना, 

    सोना तपकर भई कोयला,

    जब परी बङी हो जायेगी,

    क्या तब भी यहीं रह जायेगी!

    या तपकर हीरा बन जायेगी, 

    अपनी ही धार से कट कर,मिट्टी में ही रम जायेगी।

    या अपने माँ-बाबा जैसे हो जायेगी,

    अपनी ही जैसी इस सङक पर,एक दूसरी परी ले आयेगी,

    इन्हीं सङकों पर यूँ ही चलती रहेगी

    और एक दिन कहीं खो जायेगी ,

    बन जायेगी वही मिट्टी, 

    या पाऊँगी उसे,दो पंख फैलाकर,नभ में उङती,फिरती।

    क्या कोई इस परी को बेटी बनायेगा! 

    कोई इसको अपनायेगा ! 

    इसकी मासूमियत को संभाल कर,

    देकर इसको अपना एक घर,

    मिट्टी से गढ़ी इस परी को दे पंख सुंदर,

    ताकि उङती फिरे वो, नये आसमानों को छूकर ।।

    -मधुमिता 

  • बेटी की अभिलाषा

    आज भी मै बेटी हूँ तुम्हारी,
    बन पाई पर ना तुम्हारी दुलारी,
    हरदम तुम लोगों ने जाना पराई,
    कर दी जल्दी मेरी विदाई।

    जैसे थी तुम सब पर बोझ,
    मुझे भेजने का इंतज़ार था रोज़,
    मुझे नही था जाना और कहीं,
    रहना था तुम्हारे ही साथ यहीं।

    पर मेरी किसी ने एक ना मानी,
    कर ली तुम सबने अपनी मनमानी,
    भेज दिया मुझे देस पराया,
    क्या सच में तुमने ही था मुझको जाया?

    जा पहुँची मैं अनजाने घर,
    लेकर एक छुपा हुआ डर,
    कौन मुझे अपनायेगा,जब तुमने ना अपनाया,
    यहाँ तो कोई नही पहचान का,हर कोई यहाँ पराया।

    यहाँ थी बस ज़िम्मेदारी,
    चुप रहने की लाचारी,
    हर कुछ सुनना,सहना था,
    बाबुल तेरी इज्ज़त को संभाल कर रखना था।

    क्यों तुमने मुझे नही पढ़ाया,
    पराये घर है जाना,हरदम यही बताया,
    क्यों मुझे आज़ादी नही थी सपने देखने की,
    ना ही दूर गगन में उङने की ।

    सफाई,कपङे,चौका,बरतन,
    इन्हीं में बीत गया बचपन,
    यहाँ नही,वहाँ नही,ऐसे नही,वैसे नही,
    बस इन्हीं में बंधकर रह गयी।

    प्रश्न करने की मुझे मनाही थी,
    उत्तर ढूढ़ती ही मै रह जाती,
    कुछ पूछती तो,टरका दी जाती,
    आवाज़ मेरी क्यों दबा दी जाती!

    आज भी मैं पूछूँ ख़ुद से,
    क्यों सिर्फ बेटा ही ना मांगा तुमने रब से?
    बेटा तुम्हारे सिर का ताज,
    वो ही क्यों तुम्हारा कल और आज ?

    बेटा कुलदीपक कहलाये,
    वही तुम्हारा वंश चलाये,
    है उसको सारे अधिकार,
    उसी से है तुम्हारा परिवार।

    मुझे क्यों नही मिला तुम्हारा नाम,
    मैं भी क्यों नही चलाऊँ तुम्हारा वंश और काम,
    मैं भी क्यों ना पढ़ूँ और खेलूँ,
    दूर,ऊँचे सितारों को छू लूँ ।

    इस बार तो तुमने करली अपनी,
    अगली बारी मैं ना सुनूँगी सबकी,
    हाँ,अगले जन्म मै फिर घर आऊँगी,
    फिर से तुम्हारी बेटी बन जाऊँगी ।

    हर प्रश्न का जवाब माँगूंगी तुमसे,
    साथ रहूँगी सदा तुम्हारे ज़िद और हठ से,
    प्रेम प्यार, मै सब तुमसे लूँगी ,
    हक और अधिकार अपने,सारे लेकर रहूँगी।

    खूब पढ़ूगी, खूब खेलूँगी,
    इस जग में, बङे काम करूँगी,
    नाम तुम्हारा रोशन होगा,
    सिर तुम्हारा गर्व से ऊँचा रहेगा।

    तब तुमको मुझे पूरी तरह अपनाना होगा,
    बेटे और बेटी का भेद तुम्हें मिटाना पङेगा,
    दोनों को एक से जीवन का देना वरदान,
    मुझे भी अपने दिल का टुकङा मान,बनाना अपनी जान।

    तब चटर पटर मैं खूब बतियाऊँगी,
    इस बार की सारी कसर पूरी करूँगी,
    कभी माँ के आँचल तले छिप जाऊँगी,
    कभी बाबा की गोदी में बैठ लाङ करूँगी।

    तब तुम मुझसे,मेरी इच्छाओं कहाँ बचकर जाओगे,
    सुन लो, इस दुनिया की ना तब सुन पाओगे,
    बेटा और बेटी,दोनों का साथ रहेगा,तुम्हारे साथ,
    मै भी पाऊँगी तुम्हारा सारा प्यार,सिर पर तुम्हारे आशीष का हाथ।।

    -मधुमिता

  • पराई

    हाँ हूँ मै पराई

     

    लो कह दिया मैंने

     

    खुद को ही पराई….

     

     

     

    सबने जी दुखाया,

     

    कहके मुझे पराया,

     

    बाबा की बेटी बन,

     

    बनके भाई की बहन,

     

    निभाए मन से सारे बंधन,

     

    फिर भी मुट्ठी भर अन्न

     

    पीछे फेंक माँ के आँगन,

     

    चुकाने पड़े  सारे क़र्ज़,

     

    निभाए सारे जितने थे फ़र्ज़,

     

    कर दी मेरी विदाई,

     

    कह कह कर मुझे पराई……

     

     

     

    आई पिया के देस,

     

    बदला ठौर, बदला भेस,

     

    तन मन सब वारा,

     

    अपनाये नए  संस्कार,

     

    परिवार और परंपरा,

     

    निभाये सदा

     

    ही मान-मर्यादा, 

     

    बनी बहू,भाभी,बीवी,

     

    फिर भी कहलाई बेटी पराई,परजाई,

     

    पराये घर से आई,

     

    बनी  मै यहाँ भी पराई…..

     

     

     

    कैसा बेदर्द  है ये नसीब,

     

    रिश्ते सारे लगते अजीब,

     

    किया खुद को समर्पण,

     

    माँगा तो सिर्फ अपनापन,

     

    हर रिश्ते को प्यार से संजोया,

     

    हर मोती को प्रेम माला में पिरोया,

     

    हाय रे ये किस्मत का तिरस्कार,

     

    बन के रह गयी नातेदार,

     

    हूँ सक्षम, स्वावलंबी और सम्मानित,

     

    पर जन्मों  से श्रापित,

     

    कोई तो सुझाये कोई युक्ति,

     

    जो दे जाए मुक्ति

     

    परायेपन के बोध से,

     

    मै भी जाऊं अपनाई

     

    और कभी ना कहलाऊं परायी,

     

    परायी,पराई,पराई !!!

     

     -मधुमिता

  • खाकी – खद्दर पहने हुये , इंसान बिकने लगे

    खाकी – खद्दर पहने हुये , इंसान बिकने लगे
    कोडियों में यहाँ लोगो के,ईमान बिकने लगे ।।

    कही मुर्दे तो,कही आज शमशान बिकने लगे,
    चदरों पे खुदा,पत्थरो में भगवान बिकने लगे ।।

    सब की सब इन सियासी लोगो की चाले है,
    कहीं पे हिन्दू तो ,कही मुस्लमान बिकने लगे ।।

    चिमनियों का धुँआ,अब आवाज लगाता नहीं,
    घर से मुफलिस के , अब सामान बिकने लगे ।।

    तितलियाँ सर पटक रोने लगी,उजड़े चमन पे
    कागजी फूलो के लिए , गुलदान बिकने लगे ।।

    रिश्तों की तमाम दीवारों पे धूल जमी देखी है,
    थोड़ी सी दौलत देख कर ,मेहमान बिकने लगे ।।

    मजबूरियों ने बना दिया, बाज़ारू मासूम को,
    कोठो पे बड़े-बडे शरीफों के,ईमान बिकने लगे ।।

    माँ अपने बेटे की जिद के आगे , यूँ हार गई
    चूड़ी , कंगन हो कर जेवर परेशान बिकने लगे ।।

    खुशियाँ भी पुरव गरीब के,घर गम लेकर आई
    बेटीयों के जेवर खातिर , मकान बिकने लगे ।।

  • आँगन में जो फुदक रही थी

    आँगन में जो फुदक रही थी
    एक छोटी सी चिड़िया!
    दौड़ी उसे पकड़ने
    उसके पीछे छोटी बिटिया!!

    बोली मैंने आज पढ़ा है
    तू है दुर्लभ प्राणी!
    तुझे संजोना है हम सब को
    देकर दाना पानी !!

    गौरैया ने तनिक ठहर
    धीरे से पंख हिलाये
    भाव करुण से उस पक्षी की
    आँखो में आ छाये!

    बोली बिटिया तू तो जाने
    क्या तेरा दायित्व
    लेकिन तू ये समझ
    तेरा भी ख़तरे में अस्तित्व!

    कैसे तुमसे कहूँ
    तुझे है इतना नहीं पता
    मेरा संकट अगर प्रदूषण
    तेरा तेरे मात पिता!!

    कुछ हत् भागे नहीं चाहते
    हो बेटी का जन्म
    बोझ समझते हैं वे तुमको
    ऐसे उनके कर्म !

    कभी गर्भ में कर देते हैं
    वह तेरा ही अन्त
    अगर जन्म तू फिर भी ले
    तो कतरें तेरे पंख !!

    मैं तो उड़ती खुले गगन में
    फिरती हूँ स्वच्छन्द
    तू फँसती है अदृश जाल में
    पिंजड़े में है बन्द !!

    तेरे चारों तरफ़ शिकारी
    करते तुझ पर वार
    नहीं असर कर पाती उन पर
    कोई तीर तलवार !

    हाल रहा जो यही ! प्रजाति
    मेरी मिट जायेगी
    लेकिन बिटिया तू भी अब
    दुर्लभ ही कहलायेगी !!!

    #savesparrow #savegirlchild #betibachaobetipadhao

  • माँ मेरी

    तुम्हारे हाथ का हर एक छाला,
    चुभा जाता है इस दिल में एक भाला,
    हर एक रेखा जो तुम्हारी पेशानी पर है,
    एक दास्तां बयां कर जाती किसी परेशानी की है,
    बता जाती है वो दर्द को,जो सहे तुमने,
    हमें लाने इस हसीन जहां में अपने।

    उंगलियाँ पकङ चलना सिखाया,
    मामा,दादा,बोल बोल देखो खूब बुलवाया,
    खाना खाना, नाचना गाना सब सीखे तुमसे,
    तंग किया,फिरकी की मानिंद घुमाया,फिर भी ना खीजीं हमसे,
    हर रोज़ नयी तैयारी थी,
    हम ही तो तुम्हारी फुलवारी थीं ।

    क, ख,ग तुमने ही सिखाई,
    ए,बी,सी थी तुमने लिखवाई,
    कविता पाठ कराती थी तुम,
    चित्रकारी की अध्यापिका भी तुम,
    हर कला को विकसित किया है मुझमें,
    हर गुण तुमसे विरासत में पाई मैंने ।

    दिखलाई तुमने सही राह,
    मंज़िल अपनी पाने की चाह,
    सच की राह पर चलते रहना अटल,
    बताया,हर सही बात पर करना अमल
    और झूठ को सदा दूर खदेङना,
    सदा सच्चाई का दामन ही थामना।

    दृढ़ता का तुमने ज्ञान दिया ,
    पक्के इरादों का सम्मान किया,
    निडर हो आगे बढ़ना सिखाया,
    ज़िन्दगी की राह में गिरकर,फिर उठना सिखाया,
    सच को सच और झूठ को झूठ बोलने की हिम्मत दी,
    हर ग़लत से जूझने की हौसला अफ़ज़ाई की।

    आज मैं जो भी हूँ,सिर्फ तुम्हारी वजह से हूँ,
    तुम्हारी नज़रों में अपना अक्स ढूढ़ती हूँ,
    हाङ मांस से गङी हूँ तुम्हारी,
    तुम्हारे खून से ही सींची ये तुम्हारी दुलारी,
    तुम्हारे वजूद का हिस्सा हूँ मैं ,
    तुम्हारा ही लिखा हुआ किस्सा हूँ मैं।

    तुम्हारा खिलाया हर कौर आज भी दौङ रहा मेरी धमनियों में,
    तुम्हारी हर सीख कूट-कूट कर भरी है हर रग रग में,
    इंसानियत का पाठ पढ़ाया,
    हर मुश्किल में मुस्कुराना सिखाया,
    जीवन को जीने की अजब कला सिखाकर,
    क्या खूब मिसाल बन गई तुम, अपने फर्ज़ निभाकर।

    आज एक माँ हूँ मैं भी,
    समझती हूँ एक माँ के मन की
    चिंता,प्रेम,सोच और प्यार,
    जो मांगे ना कोई अधिकार,
    माँ,माँ के बोल में ही वह ढूढ़े मान,
    है माँ में हर प्रेम,समर्पण और सम्मान ।

    तुम्हारा दिया हर कुछ है मेरा,
    ये जीवन,साँसें और नाम भी मेरा,
    आँचल की छाँव में तुम्हारे,
    दोनों जहां हैं मेरे,
    मुझसे कभी रूठो जो तुम,
    वो दर्द कभी सह ना पायेंगे हम।

    मेरे सर पर तुम्हारा खुरदुरा सा हाथ रहे,
    हर दुःख में तुम्हारा साथ रहे,
    साहस और संयम की तुम प्रतिमूर्ति,
    कोई ना कर पाये कभी किसी माँ की पूर्ति,
    माँ तो ऊपरवाले की देन है अनूठी,
    नही कभी इसमें कोई त्रुटि।

    बस इतनी अब चाह है मेरी,
    झुर्रियों भरे चेहरे पर तुम्हारी,
    सदा मुस्कान खेलती रहें,
    धूमिल होती नज़रों में तुम्हारी खुशियाँ बस तैरती रहें,
    हर ग़म से कोसों दूर रहो तुम,
    यही रब से करते हम।

    आज भी तुम्हारा ही दिया नाम चलता है,
    कोशिकाओं में तुम्हारा ही खूं बहता है,
    जैसी भी हूँ माँ,मैं हूँ तुम्हारी बेटी,
    रब से ये करूँ मैं विनती,
    गर और जन्म ले मैं इस जग में आऊँ
    हर जन्म में बस,माँ,तुमको ही अपना माँ पाऊँ ।।

    -मधुमिता

    मातृ दिवस पर माँ को समर्पित

  • न्याय बीमार पड़ी है, कानून की आँख में पानी है

    न्याय बीमार पड़ी है, कानून की आँख में पानी है

    अत्याचार दिन ब दिन बढ़ रहे हैं भारत की बेटी पर।
    रो-रो कर चढ़ रही बिचारी एक-एक करके वेदी पर ।।
    भिलाई से लेकर दिल्ली तक प्रतिदिन नई कहानी है।
    किसने पाप किया है ये, किसकी ये मनमानी है।।
    गली-गली, बस्ती-बस्ती में निर्भया बलिदानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।।

    स्कुल-कालेज, आफिस, घर,  सभी जगह पर खतरा है।
    मानवता तो अब मर रही है सड़को पर सन्नाटा पसरा है।।
    कभी-कभी मर्दाना पुलिस औरतों पे कहर ढ़ाती है।
    संविधान के नियम-कायदे पल-भर में भूल जाती है।।
    हरेक गाँव, हरेक शहर में, हमने देखी यही कहानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।।

    न्यायालय तक कैसे जाऐ, किससे अपनी बात कहे।
    सरकारी नुमाइंदे जब खुद बलात्कारी के साथ रहे ।।
    दो दिन मज़मा लगाने के लिए संगठन वाले आते हैं।
    रात गई, बात गई, फ़िर घर में चादर तान सो जाते हैं।।
    कुछ सज्जन तो कहते हैं, चुपचाप रहना बुद्धिमानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।।

    राह चलती बेटिया पर कुछ लड़के ताने कसते हैं।
    कुछ ऐसे गुण्डे भी हैं, जो घर तक पीछा करते हैं॥
    बेटी के चाल-चलन पर माँ-बाप की निगाह पैनी है।
    बेटे ने पेट भरे हैं शराब से, मुँह में गुटका, खैनी है।।
    पकड़ रखो तुम बेटे पर, ये बात सभी को समझानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है॥

    बेटी लाचार गरीब की, अब मिट्टी का खिलौना है।
    ‘बोलो साहेब बोलो’ वस्त्रों पे क्या कुछ कहना है?
    दो चार साल की गुड़िया भी क्या सही सलामत है?
    बुढ़ी बच्ची और जवान किसी को यहाँ पर राहत है?
    अपनी नज़रों पर काबू नहीं बनते-फिरते ज्ञानी हैं।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।।

    परीक्षा का खौफ़ दिखाकर, गुरुवर भी छलने वाले है।
    किस पर बिचारी भरोसा रखे, साधु भी हरने वाले हैं।।
    कहीं-कहीं पे भरी सभा में  नारी को दावं लगाते है।
    मर्द कुकर्म करता है और औरत को सजा सुनाते हैं॥
    सदियों तक वो ज़ुल्म सह चुकी, अब तो मुक्ति पानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है॥

    जीवन से गर जीत गयी, फ़िर कानून से लड़ती है।
    देखो फांसी पर झूल गयी, दुनियाँ जब हसती है।।
    कानूनी लड़ाई लड़ते-लड़ते जीवन जीना भूल गयी।
    क्या करती बेचारी थक हार कर फांसी पर झूल गयी।।
    मेरे शहर भिलाई की भी ऐसी ही दुख भरी कहानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब कानून की आँखों में पानी है।।

    इलाज़ पीलिया का करने के लिए अस्पताल बुलाया था।
    दो आरक्षक एक डाक्टर ने मिलकर कहर बरपाया था।।
    सरकारी वकील की सांठगाठ भी बेचारी बोल रही है।
    निर्भया तो अब नहीं रही, ख़त सारे पर्दे खोल रही है।।
    इन सबकी मिली भगत देखकर बेचारी ने हार मानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है॥

    बेटी ने सुसाईड नोट में लिखा है, न्याय की उम्मीद नहीं।
    अपराधियों का बोलबाला है, सच्चाई की जीत नहीं।।
    बलात्कारी अब तो घर आकर मुझको ही धमकाते है।
    कुछ ऐसै निर्लज्ज है जो शादी का प्रस्ताव भी लाते है।।
    न्याय मिलेगा सोच रही थी,शायद ये मेरी नादानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है, अब कानून के आँख में पानी है॥

    बेटी फांसी पर झूल गयी, क्या अपराधी फांसी चढ़ पायेगें?
    घर आकर धमकाने वाले भी अब, क्या सक्त सजा पायेंगे ?
    निर्भया को जेल से हररोज़ अपराधी के फोन आते थे।
    खत्म कर देगें माँ, बाप, भाई को कहकर वो डराते थे।।
    कोई कहने आता था,अब बरबाद तेरी ज़िन्दगानी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।।

    बाप रो रहा है आंगन में, माँ की हालत दयनीय है।
    टूटी-फूटी घर के भीतर, पीड़ा ये असहनीय है॥
    माँ की ममता फूट-फूटकर अब तो दिन-रात रो रही है।
    उसकी राजदुलारी बिटिया आज अर्थी पर सो रही है।।
    छोटी बहन की आँखों को अब ताउम्र आंसू बहानी है।न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है॥

    आंसू को स्याही बनाकर, मैं ये कविता लिख रहा हूँ।
    निर्भया को न्याय मिले, मैं भरे गला से चीख रहा हूँ।।
    मन भिगोकर पढ़ लेना, दर्द से कागज़ सीच रहा हूँ।
    निर्भया  की पीड़ा पर मैं  तिल-तिल कर मिट रहा हूँ।।
    घर से निकलो बाहर तुम, ये जन आंदोलन की वाणी है।
    न्याय बीमार पड़ी है अब, कानून की आँख में पानी है।।

    ओमप्रकाश चंदेल “अवसर”
    पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
    7693919758

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    ब्रह्मा-ऋषि-मुनि-चरक का तो ये देश हो सकता नहीं ,,

    क्यूँ बताते हो डॉक्टर पेट में बेटी है बेटा  नहीं ..!!

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