एक दोपहर ऐसी भी

एक दोपहर ऐसी भी:’
मैं कुछ उधड़-बुन में थी
अपनी आकांक्षाओं की
निर्मम हत्या करके
अपने दंश भरे पलंग पर लेटी…
कुछ आराम पाने की अभिलाषा
हृदय में लेकर…
तभी तुम्हारी स्मृतियों के चक्रव्यू ने
मुझे आ घेरा…
और मेरी वेदना के शूल
हृदय में चुभने लगे…
रक्त स्त्राव और हृदयाघात से
मैं व्यथित होकर विलाप करने लगी…
तभी मैंने अचानक देखा
बादलों में बना एक मेमना
विशाल अंबर का प्रतिबिंब लग रहा था…
हवा का झोंका उसे मेंमने को
विभिन्न आकार दे रहा था…
मेरी कल्पनाओं के क्षितिज
उसे दूर तक देखते रहे
और मेरे नैन थककर सो गए….

Comments

8 responses to “एक दोपहर ऐसी भी”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुन्दर रचना

    1. धन्यवाद आपका

  2. Priya Choudhary

    Nice 👏👏

  3. अति सुन्दर रचना 👏👏👏

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