कविता

मेरा देश महान
घनघोर घटा में अलख जगा कर देख रहा मतिहीन,
जाग सका ना घन गर्जन पर जग सोने में लीन,
इस निस्तब्ध रजनी में मै और मेरा स्वप्न महान,
खोज रहा अधिगम जिससे जग सच को लेता जान !
देह थकी तो बहुत जरूरी है उसको विश्राम
किन्तु न चिंतन को निद्रा गति इसकी है अभिराम |
जला हुआ है दीप तो एक दिन उजियाली लायेगा
अंधकार से मुक्त मही को लौ भी दिखलायेगा
गंगा के तट बैठ पुरवैया के मस्त हिलोरे
माँझी की गीतो में कृष्ण ज्यों लगा लिये हो डेरे,
करुणां प्रेम रस में डूबे यह देश हमारी आन,
पड़े जरुरत इसकी खातिर तज देंगे हम प्राण,
हे हरि सबल समर्थ आप कर दो इतना बरदान
फूले फले बढे विकसे यह मेरा देश महान ||

आपका उपाध्याय…

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