“कायर”

कायर
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दरवाजे पर आहट हुई

अधखुला दरवाजा खुला

परिचित सामने खड़ा

आस्तिने चढाए

पैर पटकता लौट गया

बोलकर कुछ

अनसुने,अनकहे शब्द

एक चुप्पी

और गहरा

अटहास

स्मरण था मुझे सब

कि सत्य

अकस्मात् ही लौटेगा

कटु सत्य लिए

एक दिन

मैं हारा सिपाही सा

भागा था बिन

समर किये

उस दिन

जब वीरों ने

ललकारा था

और हम दास थे

गुलाम भारत के

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