“कायर”

कायर
——-

दरवाजे पर आहट हुई

अधखुला दरवाजा खुला

परिचित सामने खड़ा

आस्तिने चढाए

पैर पटकता लौट गया

बोलकर कुछ

अनसुने,अनकहे शब्द

एक चुप्पी

और गहरा

अटहास

स्मरण था मुझे सब

कि सत्य

अकस्मात् ही लौटेगा

कटु सत्य लिए

एक दिन

मैं हारा सिपाही सा

भागा था बिन

समर किये

उस दिन

जब वीरों ने

ललकारा था

और हम दास थे

गुलाम भारत के


लगातार अपडेट रहने के लिए सावन से फ़ेसबुक, ट्विटर, इन्स्टाग्राम, पिन्टरेस्ट पर जुड़े| 

यदि आपको सावन पर किसी भी प्रकार की समस्या आती है तो हमें हमारे फ़ेसबुक पेज पर सूचित करें|

Related Posts

सरहद के मौसमों में जो बेरंगा हो जाता है

आजादी

मैं अमन पसंद हूँ

So jaunga khi m aik din…

2 Comments

  1. Sridhar - August 7, 2016, 1:34 pm

    Gajab

Leave a Reply