कुमाऊँनी : पर्वतीय कविता

झम झमा बरखा लागी
ऐ गौ छ चुंमास
डाना काना छाई रौ छ
हरिया प्रकाश।
त्वै बिना यो मेरो मन
नै लिनो सुपास,
घर ऐ जा मेरा सुवा
लागिगौ उदास।
पाणि का एक्केक ट्वॉप्पा


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19 Comments

  1. Satish Pandey - July 11, 2020, 5:02 pm

    छूट गए अंश —-
    पाणि का एक्केक त्वाप्पा
    कुनेंयीं तू ऐ जा
    विदेश बै मेरा सुआ
    चुंमास में ऐ जा।
    पड़ौसै का परु मौ ले
    लिंटर खिति हा छ
    हामरा पाथर रडया
    च्यून नौ छ अगास।
    भैर लगै बारिश छ
    भीतर बारिश
    आंखां में लै बारिश छ
    सब ठौर बारिश।

  2. Satish Pandey - July 11, 2020, 5:17 pm

    पूर्णागिरि हमारे चम्पावत जिले में ही है। स्वागत

  3. Pragya Shukla - July 11, 2020, 5:25 pm

    मीठी भाषा

  4. Satish Pandey - July 11, 2020, 5:34 pm

    स्वागत, आदरणीया , प्रज्ञा जी

  5. MS Lohaghat - July 11, 2020, 5:55 pm

    वाह, कुमाउनी कविता

  6. Indra Pandey - July 11, 2020, 6:55 pm

    Achchi kavita

  7. Satish Pandey - July 11, 2020, 6:58 pm

    धन्यवाद जी

  8. Anita Sharma - July 11, 2020, 7:48 pm

    Sundar

  9. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - July 11, 2020, 9:12 pm

    Atisunder kavita

  10. Kumar Piyush - July 11, 2020, 9:13 pm

    Waah, Kumauni me

  11. Indu Pandey - July 11, 2020, 10:42 pm

    ग्रुप में पहली कुमाउनी कविता प्रस्तुत करने पर हार्दिक धन्यवाद जी

  12. Satish Pandey - July 11, 2020, 10:48 pm

    Dhanyvaad

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