खामोश एहसास

मन्ज़िल की तलाश में खुद राहों को आना पड़ा,
ख्वाबों की तलाश में जैसे आँखों को जाना पड़ा,

चाँद सूरज जब रौशनी कर न सके मेरे दिल में,
छोड़ कर घर अपना फिर जुगनुओं को आना पड़ा,

बहरी होने लगी जब हवाओं की बहर कहानी,
खामोश रहकर फिर एहसासों को सुनाना पड़ा,

रात दिन ढूढ़ता रहा मैं जिस लम्हें की आहट को,
एक साँझ अपने ही हाथों वो लम्हा छिपाना पड़ा,

दोस्ती इतनी गहरी रही अपने खुद के पायदान से,
के रिश्तों की म्यान से “राही” को बाहर लाना पड़ा।।

राही अंजाना
मीजान – संतुलन/तराजू


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28 Comments

  1. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 25, 2019, 5:36 pm

    सुंदर

  2. देवेश साखरे 'देव' - December 25, 2019, 6:13 pm

    बढ़िया

  3. Amod Kumar Ray - December 25, 2019, 7:16 pm

    Good

  4. Pragya Shukla - December 25, 2019, 9:19 pm

    Good

  5. Abhishek kumar - December 25, 2019, 9:39 pm

    Good

  6. राही अंजाना - December 26, 2019, 2:00 pm

    सब को प्रणाम

  7. Harsh - December 26, 2019, 2:43 pm

    Very good

  8. Prince Wahid - December 26, 2019, 7:26 pm

    बहुत ख़ूब राही जी

  9. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - December 27, 2019, 4:08 pm

    अच्छा लगता है

  10. दिनेश जोशी - December 27, 2019, 7:24 pm

    बहुत सुन्दर

  11. Vinay - December 29, 2019, 2:24 pm

    Sunder rachana

  12. Pawan Raajpoot - December 29, 2019, 2:52 pm

    वाह सर जी

  13. Anchit - December 29, 2019, 3:20 pm

    Very nicely explain

  14. Utkarsh Dhalla - December 29, 2019, 3:39 pm

    Nice

  15. Amit Kumar - December 29, 2019, 3:47 pm

    Nice poem

  16. Ekta - December 29, 2019, 3:55 pm

    Good

  17. Pragya Shukla - February 29, 2020, 5:53 pm

    Nyc

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