“चाँद” #2Liner-106

ღღ__गलतफ़हमी में जागते रहे, रात भर उनको जगता देखकर;
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भला क्या ज़रूरत थी चाँद को, यूँ रात में निकलने की!!….#अक्स
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6 Comments

  1. Ajay Nawal - April 16, 2016, 9:28 am

    nice bro!

  2. Panna - April 16, 2016, 7:34 pm

    umda!

  3. प्रतिमा चौधरी - September 3, 2020, 5:48 pm

    वाह

  4. Pragya Shukla - April 18, 2021, 7:20 pm

    बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति

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