तेरे असूल थे या बदलते दौर थे

तेरे असूल थे या फिर वो बदलते दौर थे .
मेरे लिए जो और थे गैरों के लिए जो और थे .
जिनको उठाने के लिए मिली मुझे सजा ए मौत ,
आज कहती हैं अदालतें मुद्दे वो काबिल ए गौर थे .
मेरे लिए ही थीं वो क्या मर्यादाओं की दुहाइयाँ ,
जिनके लिए हया छोड़ दी वो कौन से चितचोर थे .
कुछ भी कहो पर”राज़”यह अब हो रहा है आम यूँ ,
कोई दोष न इस तूफां का था घर गरीबों के कमजोर थे .

Related Articles

प्यार अंधा होता है (Love Is Blind) सत्य पर आधारित Full Story

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ। निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥ Anu Mehta’s Dairy About me परिचय (Introduction) नमस्‍कार दोस्‍तो, मेरा नाम अनु मेहता है। मैं…

Responses

  1. तह ए दिल से शुक्रिया श्रीमान जी ,इस प्लेर्फोर्म पर यह मेरी प्रथम रचना है और आपका कमेंट प्रथम कमेंट ,जो कि बहुत ही मूल्यवान है .

    1. एक ज़माने के बाद वाखिफ़ हुए हम जमाने के इस रिवाज से .
      कि बदल लिए हैं लोग अपने असूल भी सहूलियत के हिसाब से .
      तहए दिल से शुक्रिया आपका इस खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए .

    1. उसका दिया ग़म ही आजकल तो बाचीत की वजह निकलती है .कि जब भो मेरी आह नकलती है उसकी जुबां से वाह निकलती है …तह ए दिल से शुक्रिया इस होंसला अफ़्ज़ाई के लिए .

New Report

Close