तेरे असूल थे या बदलते दौर थे

तेरे असूल थे या फिर वो बदलते दौर थे .
मेरे लिए जो और थे गैरों के लिए जो और थे .
जिनको उठाने के लिए मिली मुझे सजा ए मौत ,
आज कहती हैं अदालतें मुद्दे वो काबिल ए गौर थे .
मेरे लिए ही थीं वो क्या मर्यादाओं की दुहाइयाँ ,
जिनके लिए हया छोड़ दी वो कौन से चितचोर थे .
कुछ भी कहो पर”राज़”यह अब हो रहा है आम यूँ ,
कोई दोष न इस तूफां का था घर गरीबों के कमजोर थे .


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15 Comments

  1. देवेश साखरे 'देव' - November 12, 2019, 2:49 pm

    Bahut khub

    • Raj Bhatia - November 12, 2019, 7:15 pm

      Sir मेरा सबसे पहला कमेंट आपके कमेंट का जवाब है .

  2. Raj Bhatia - November 12, 2019, 2:54 pm

    तह ए दिल से शुक्रिया श्रीमान जी ,इस प्लेर्फोर्म पर यह मेरी प्रथम रचना है और आपका कमेंट प्रथम कमेंट ,जो कि बहुत ही मूल्यवान है .

  3. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - November 12, 2019, 3:32 pm

    बहुत सुन्दर

    • Raj Bhatia - November 12, 2019, 7:23 pm

      तह ए दिल से शुक्रिया इस सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए.

  4. nitu kandera - November 12, 2019, 3:36 pm

    wah kya usool h

    • Raj Bhatia - November 12, 2019, 8:06 pm

      एक ज़माने के बाद वाखिफ़ हुए हम जमाने के इस रिवाज से .
      कि बदल लिए हैं लोग अपने असूल भी सहूलियत के हिसाब से .
      तहए दिल से शुक्रिया आपका इस खूबसूरत प्रतिक्रिया के लिए .

  5. NIMISHA SINGHAL - November 12, 2019, 4:03 pm

    Wah

    • Raj Bhatia - November 12, 2019, 8:11 pm

      उसका दिया ग़म ही आजकल तो बाचीत की वजह निकलती है .कि जब भो मेरी आह नकलती है उसकी जुबां से वाह निकलती है …तह ए दिल से शुक्रिया इस होंसला अफ़्ज़ाई के लिए .

  6. Panna - November 12, 2019, 5:11 pm

    nice poetry

  7. Antariksha Saha - November 12, 2019, 8:19 pm

    Bahut achi kavita bhai

    • Raj Bhatia - November 12, 2019, 8:29 pm

      दिल से आभार sir ji इस होंसला अफ़ज़ाई के लिए .

  8. Abhishek kumar - November 24, 2019, 9:05 am

    क्या बात है कि

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