दर्दनाक मन्ज़र

किसी का दम
निकलता है घर में
तो कोई सड़कों पर
मारा-मारा फिरता है
भूंख लगती है तो
सिर्फ प्यास बुझा लेता है
इतनी धूप में सब
घर में बैठे हैं
तो कोई सड़कों पर
पसीना बहाता फिरता है
कितना दर्दनाक है वो मन्ज़र
जब कोई मीलों का सफ़र
पैदल ही करता है

Comments

12 responses to “दर्दनाक मन्ज़र”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    Nice

  2. Anu Somayajula

    nicely put

      1. वेलकम

  3. यथार्थपरक बहुतसुन्दर

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