पसीना भी हर इक मजदूर का………….

कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है

कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है।

चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं

पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है।

गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने

कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है।

यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के

सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।

ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर

नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उजड़ता है।

—————-सतीश कसेरा

Comments

8 responses to “पसीना भी हर इक मजदूर का………….”

    1. satish Kasera Avatar
      satish Kasera

      Thanks Ankit Tiwari

  1. Kapil Singh Avatar
    Kapil Singh

    aapki kavita ki taarif me kya kahe
    lafzo se aapne kya racha he kya kahe

    1. satish Kasera Avatar
      satish Kasera

      Thanks Kapil Singh

  2. Panna Avatar
    Panna

    यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के
    सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।…bahut khoob satish ji

  3. राम नरेशपुरवाला

    Good

  4. Satish Pandey

    अतिसुन्दर

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