पसीना भी हर इक मजदूर का………….

कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है

कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है।

चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं

पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है।

गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने

कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है।

यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के

सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।

ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर

नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उजड़ता है।

—————-सतीश कसेरा


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I am Journalist and Writer. I like Story, Poem and Gazal's

7 Comments

  1. अंकित तिवारी - August 18, 2015, 7:27 pm

    Shaandaar

  2. Kapil Singh - November 8, 2015, 2:30 am

    aapki kavita ki taarif me kya kahe
    lafzo se aapne kya racha he kya kahe

  3. Panna - November 26, 2015, 11:47 am

    यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के
    सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।…bahut khoob satish ji

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