कभी दीवार गिरती है, कभी छप्पर टपकता है
कि आंधी और तूफां को भी मेरा घर खटकता है।
चमकते शहर ऐसे ही नहीं मन को लुभाते हैं
पसीना भी हर इक मजदूर का इसमें चमकता है।
गए परदेस रोटी को तो घर सब हो गए सूने
कहीं बिंदियां चमकती है न अब कंगन खनकता है।
यूं ही होते नहीं है रास्ते आसान मंजिल के
सड़क बनती है तो मजदूर का तलवा सुलगता है।
ये अपने घर लिये फिरते हैं सब अपने ही कांधों पर
नहीं मालूम बसकर फिर कहां जाकर उजड़ता है।
—————-सतीश कसेरा
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