प्रबोधन

आनन्दपुर छूट गया हमें इसका तनिक मलाल नहीं।
इस गम को कैसे झेललेंगे ,दो वीरा अपने नाल नहीं।।
दूर गया नहीं हमसे , तेरा वीरा ,मेरे सोना मेरेकाका ।
धर्म ध्वजा के रुप तुम्हारा वीरा होगा सबका आका।।
हम क्षत्रिय कभी गम नहीं करते, जीवन और मृत्यु का।
देश, धर्म,, मानवता के खातिर, वरण करते मृत्यु का।।
बलिदान धर्म पर होने वाला, सीधा जन्नत को जाता है।
“विनयचंद “यह मानव का तन लाख मनन्त से पाता है।।

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