“मजबूरियाँ” #2Liner-107

ღღ__मजबूरियों का आलम कुछ ऐसा भी होता है “साहब”;
.
मुसाफिर हूँ फिर भी, अपनी मंजिलें छोड़ आया हूँ!!….‪#‎अक्स‬


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4 Comments

  1. Anushreee Sharma - April 22, 2016, 8:18 am

    Nice

  2. प्रतिमा चौधरी - September 3, 2020, 5:47 pm

    नाइस लाइंस

  3. Satish Pandey - September 3, 2020, 5:57 pm

    लाजबाब

  4. Pragya Shukla - April 18, 2021, 7:19 pm

    बहुत सुन्दर रचना प्रस्तुति

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