मिट्टी है सब तरफ जी

देखो जरा सा बाहर
मिट्टी है सब तरफ जी,
मिट्टी में हैं जन्मते
मिट्टी में खेलते हैं,
मिट्टी में जड़ हमारी
मिट्टी है सब तरफ जी।
रोड़ी- सीमेंट की जिस
चमकी छठा में हो तुम,
ये भी तो सब है मिट्टी
मिट्टी है सब तरफ जी।
छिप जाओ मार्बल में
कितना ही आजकल तुम
होना है फिर भी मिट्टी
मिट्टी है सब तरफ जी।
कोमल सी देह में जब
सांसें व धड़कनें हैं,
तब तक ही है वो इन्सां
बाकी तो मिट्टी है जी।
सब कुछ है मिट्टी मिट्टी
मिट्टी से ही है सब कुछ,
मिट्टी के हम हैं पुतले
मिट्टी है सब तरफ जी।


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8 Comments

  1. Piyush Joshi - October 22, 2020, 8:45 am

    अतीव सुन्दर

  2. MS Lohaghat - October 22, 2020, 10:11 am

    बहुत ही सुंदर बढ़िया रचना

  3. Ramesh Joshi - October 22, 2020, 10:43 am

    बहुत खूब, अति सुंदर

  4. Geeta kumari - October 22, 2020, 10:54 am

    बहुत सुंदर कविता है सतीश जी, मिट्टी ही तो है जिसमें बीज डलकर उगता है और हमें फल फूल मिलते हैं ।फिर मिट्टी के पुतलों को मिट्टीसे क्या डर ,वाह सर दार्शनिक विचारों वाली बहुत सुंदर रचना..

  5. Pragya Shukla - October 22, 2020, 11:11 am

    Awesome line

  6. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - October 22, 2020, 2:07 pm

    अति, अतिसुंदर भाव

  7. Chandra Pandey - October 22, 2020, 3:08 pm

    बहुत खूब अतिसुन्दर

  8. Devi Kamla - October 22, 2020, 10:40 pm

    वाह, क्या बात है, बहुत खूब

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