मित्रपद विराजित हो

श्रीदरूप हो तुम,
मित्रपद विराजित हो
बस सदा ही खिलते रहो
मण्डली में शोभित हो।
श्रोतव्य है मीठी वाणी तुम्हारी
बिंदास चेहरे की मुस्कान न्यारी।
सदोदित रहें सारी खुशियाँ तुम्हारी,
सुस्मित रहे मन, दुख सब विलोपित हों।
संविग्न मत होना, संशय न रखना,
मित्रता निभाएंगे लोभ-मद रहित हो।


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18 Comments

  1. Pragya Shukla - September 14, 2020, 7:20 pm

    Very nice line

  2. Chandra Pandey - September 14, 2020, 8:07 pm

    Very nice

  3. Pratima chaudhary - September 14, 2020, 8:35 pm

    बहुत सुंदर

  4. Pt, vinay shastri 'vinaychand' - September 14, 2020, 8:36 pm

    अतिसुंदर भाव

  5. Isha Pandey - September 14, 2020, 9:07 pm

    बहुत ही सुंदर

  6. Geeta kumari - September 14, 2020, 9:56 pm

    बहुत ख़ूबसूरत रचना है मित्रता पर ।अतिसुंदर भावनाएं ।
    मित्रता पर इतनी अनूठी रचना आपकी विलक्षण प्रतिभा को दर्शाती है…लेखनी को प्रणाम ।🙏🙏

    • Satish Pandey - September 14, 2020, 10:16 pm

      बहुत ही सुंदर समीक्षा, आपको हार्दिक अभिवादन , इतनी सुंदर समीक्षा शक्ति को प्रणाम। धन्यवाद गीता जी

  7. Suman Kumari - September 14, 2020, 11:45 pm

    बहुत ही सुन्दर अभिव्यक्ति

  8. Devi Kamla - September 15, 2020, 7:12 am

    बहुत खूब पाण्डेय जी

  9. MS Lohaghat - September 17, 2020, 7:25 am

    बहुत ही बढ़िया

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