मुझे अच्छा नहीं लगता यूँ
मलिन वस्त्रों में लिपटे रहना।
यूँ अपनी स्मृति खोकर
बेसुध पड़े रहना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
गीतमाला सजाकर
चंद्र को ताकते रहना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
अब बिन वजह
गगन में आंखें गड़ाकर
देखते रहना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
थक के चूर होकर
किसी वृक्ष के तले बैठना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
कीमती वस्त्र धारणकर
मलिन बस्तियों में जाना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
राजभोग खाकर
भूंखों के आगे डकारना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
रेशम की चादरों पर
अपनी रातें गुजारना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
कवि मन है प्रज्ञा!
फिर भी शब्दों से खेलना
मुझे अच्छा नहीं लगता।
मुझे अच्छा नहीं लगता…
Comments
10 responses to “मुझे अच्छा नहीं लगता…”
-
Nice
-

🙏🙏🙏
-
-

Nice
-

⚘🕺
-
-

Nyc
-

धन्यवाद
-
-

वाह बहुत सुंदर
-

आभार
-
-
Good
-

सुंदर अभिव्यक्ति
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.