मेरा गुरूर

मैं अंतर्मुखी हूं,
इसीलिए कभी – कभी कुछ दुखी हूं,
और कभी – कभी कुछ सुखी हूं ।
बोलने से पहले तौलती हूं,
यदा – कदा मन का कह नहीं पाती,
तो थोड़ी खौलती हूं ।
कोई कहे ख़ामोश मुझे,
कोई कहे मगरूर हूं..
मगरुर तो नहीं हूं, मगर मैं मेरा ही गुरूर हूं।
………..✍️ गीता..

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Responses

  1. आपकी रचना अतिउत्तम है। स्वयं पर भरोसे से परिपूर्ण है। एक सुलझा हुआ व्यक्तित्व ही इतनी शानदार रचना कर सकता है। इस प्रतिभा को अभिवादन है। आपकी काव्य सृजन क्षमता लाजवाब है।

    1. आपकी इस प्रेरक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार एवं धन्यवाद,
      आपकी समीक्षाएं मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।….धन्यवाद सर🙏

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