वन डे मातरम

स्वतंत्र हैं हम देश सबका।

आते इसमें हम सारे

हर जाती हर तबका।।

 

सोई हुई ये देशभक्ति

सिर्फ दो ही दिन क्यूँ होती खड़ी।

एक है पंद्रह अगस्त और

दूसरा छब्बीस जनवरी।।

 

देश रो रहा रोज़ रोज़

फिर एक ही दिन क्यों आँखे नम

अब बंद करदो बंद करदो

ये वन डे वन डे मातरम्

 

देखो कितना गहरा सबपर

दिखावे का ये रंग चढ़ा।

एक दिन तिरंगा दिल में

अगले ही दिन ज़मीन पे पड़ा।।

 

उठते तो हो हर सुबह

चलो उठ भी जाओ अब तुम

सो रहे हो अब भी अगर तो खा लो थोड़ी सी शरम।

अब बंद करदो बंद करदो

ये वन डे वन डे मातरम्।।

 

सब बातें बोले गोल गोल

सोच कड़वी,कड़वे बोल

एक दिन हो जाते मीठे खा के लड्डू नरम नरम।

अब बंद करदो बंद करदो

ये वन डे वन डे मातरम्।।

 

राष्ट्र ध्वज में तीन रंग

तीन बातों के प्रतीक हैं।

सम्मान करना है इन्ही का

ये जान ले ये सीख लें।।

 

सफ़ेद कहता रखो शांति

साथ दो सच्चाई का।

पर झूठा शान से फिर रहा और

सच्चा मोहताज पाई पाई का।।

 

केसरिया हम सभी को

देता एक उपदेश है।

हिम्मती बनो तुम सारे

बलिदानो का ये देश है।।

 

हरा निशानी समृद्धि का

देता विविधता का ज्ञान है।

मगर भारतीय होने से पहले

लोग हिन्दू-मुसलमान है।।

 

ये रंग हवा में लहरा रहे

इन्हें मन में भी फैला ले हम।

चलो बंद करदें बंद करदें

ये वन डे वन डे मातरम्।।

 

देश के हर ज़ख्म का

हमारे पास मरहम है।

इन निहत्थे हाथों में

धारदार कलम है।।

 

रूढ़िवादी खंजरों पर

अब चल जाने दें ये कलम।

चलो बंद करदें बंद करदें

ये वन डे वन डे मातरम्।।

 

दूसरों का इंतज़ार क्यूँ

तुम ही करदो अब पहल।

एक दिन में क्या बन सका है

घर,ईमारत या महल।।

 

याद करलो आज सब

कर्म अपना,अपना धर्म

चलो राष्ट्र निर्माण में बढ़ाये छोटे छोटे से कदम।

अब बंद करदें बंद करदें

ये वन डे वन डे मातरम्।

Published in हिन्दी-उर्दू कविता

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