वहि घरका ना जाउ कबहुं
जहां ना होइ सम्मान
नीके जहां कोइ नाइ मिलइ
हुंआँ जाइते हइ अपमान
रूखी-सुखी खाइ लेउ
बढ़िया व्यंजन छोड़ि
प्रेम की छूड़ी रोटी
छप्पनभोग सि बढ़िया होइ
आधी राति का आवेते
घरवाली होति हइ दिक्क
तउ जल्दी घर जावै लगउ
नइ रातिक होई खिटि-पिट्टी ।
वहि घरका ना जाउ कबहुँ
Comments
8 responses to “वहि घरका ना जाउ कबहुँ”
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👌👌👏👏 बहुत नीक मज़ा आइ गा
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Thanks
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वेलकम
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निम्मन रचना
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धन्यवाद आपका हौसलाफजाई के लिए 🙏🙏
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वाह
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धन्यवाद
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बहुत बढ़िया
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