शब्द-सुनहरे

एक दौर वो भी गुजरा है!
जब हम कागज और कलम
लेकर सोते थे।

यादों में पल-पल भीगा
करती थीं पलकें ,
अभिव्यक्ति के शब्द
सुनहरे होते थे।

ना दूर कभी जाने की
कसमें खाई थीं
मिलने के अक्सर वादे
होते रहते थे।

कोई यूं ही कवि
नहीं बनता है यह सच है
हम भी तो पहले
कितना हंसते रहते थे।

Comments

13 responses to “शब्द-सुनहरे”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    सुंदर

    1. धन्यवाद आपका

  2. सुन्दर स्वाभविक अभिव्यक्ति

  3. Rajendra Dwivedi

    Wah kya bt likhi h

  4. Shyam Kunvar Bharti

    वाह हम भी।कभी हंसते रहते थे

      1. Shyam Kunvar Bharti

        स्वागत है आपका

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