शिक्षक

बचपन से ही शिक्षक के हाथों में झूला-झूला करते हैं,

ज्ञान का पहला अक्षर हम बच्चे माँ से ही सीखा करते हैं,

प्रथम चरण में मात-पिता के चरणों को चूमा करते हैं,

दूजे पल हम पढ़ने- लिखने का वादा शिक्षक को करते हैं,

विद्यालय के आँगन में शिक्षक हमसे जो अनुभव साझा करते हैं,

उतर समाज सागर में हम बच्चे फिर कदमों को साधा करते हैं,

एक छोटी सी चींटी से भी शिक्षक हमको धैर्य सिखाया करते हैं,

सही मार्ग हम बच्चों को अक्सर शिक्षक ही दिखाया करते हैं,

धर्म जाति के भेद को मन से शिक्षक ही मिटाया करते हैं,

देश-प्रेम संग गुरु सम्मान भाव शिक्षक ही जगाया करते हैं,

जीवन के हर क्षण को शिक्षक शिक्षा को अर्पण करते हैं,

इसी तरह हम अज्ञानी बच्चों को शिक्षक सदज्ञान कराया करते हैं।।

राही (अंजाना)


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क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।

2 Comments

  1. ज्योति कुमार - August 22, 2018, 10:10 am

    Waah kya baat hai.

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