श्रद्धांजलि

गीत
आधार छंद-द्विगुणित चौपाई
कुल ३२ मात्राएँ , १६-१६ पर यति
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आओ तुमको ले चलूँ वहाँ, जिस जगह वीर इक सोया था ।
डोली थी सजी हुई लेकिन, वह आत्ममुग्ध सा खोया था ।

आँखों में चमक अजब सी थी, जैसे पौरुष को जीता हो ।
था मगर उनींदा ज्यों सपनों, को हाला जैसा पीता हो ।
होंठों पर मुस्कानें लेटीं, खुद का सौभाग्य जताती थीं ।
उस वीर पुरुष की दिव्य कथा, सम्मान सहित बतलाती थीं ।
फलदार वृक्ष सौभाग्य पूर्ण, जीवन में उसने बोया था….
आओ तुमको………।।

कहते हैं जय भारत सुनकर, वह दीवाना हो जाता था ।
सरहद की माटी का चन्दन, माथे पर सदा लगाता था ।
मदमस्त फिजाओं में केवल, उसकी ही चर्चा होती थी ।
सूरज की प्रथम किरण उसको, छूकर उदयाचल धोती थी ।
वह आज विदा होने को था, जन जन का अंतस रोया था….
आओ तुमको……..।।

वह बेसुध सी अम्मा उसकी, ललना-ललना कह रोती थी ।
आँखों से बहती धार प्रबल, उसके पैरों को धोती थी ।
बेटे के भोले चेहरे को, वह चूम चूम दुलराती थी ।
छाती को पीट-पीट अम्मा, होकर बेसुध गिर जाती थी ।
बस वहीं जानती थी उसने, उस रोज वहाँ क्या खोया था…..
आओ तुमको……।।

उस ओर बिलखती एक बहन, भाई को गले लगाती थी ।
कुछ कहती-रोती-चीख लगा, झट से अचेत हो जाती थी ।
“भैया इस राखी पर किसको, मैं अब राखी भिजवाऊँगी ।
किसके सीने से लिपट भला, अपने दुख-सुख बतलाऊँगी ।”
इस तरह बिलखती बहना ने, सारा संसार भिगोया था ….
आओ तुमको…….।।

थी चीख उठी कुदरत देखा, करुणा की उन तस्वीरों को ।
बूढ़ा बापू उस ओर सहज, था तोड़ रहा जंजीरों को ।
कहता- “किसान का गौरव है, बेटे का यह बलिदान अमर ।
यों रोकर क्यों करते हो कम, तुम वीरों का सम्मान अमर ।
ये स्वप्न वहीं साकार हुआ , बेटे ने जिसे सँजोया था….”
आओ तुमको…..।।

राहुल द्विवेदी ‘स्मित’
लखनऊ, उत्तर प्रदेश
७४९९७७६२४१

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