अंतस् में है पीर
पीर का रोना रोकर
नहीं भला कोई बन पाया
है सब कुछ कर-कर
कदम- कदम दे साथ फिर
गया छोंड़ वह राह
उसकी राह निहारती
है प्रज्ञा दिन-रात
रात ये बड़ी निराली
सजी है महफिल सारी….
“अंतस् में है पीर”
Comments
7 responses to ““अंतस् में है पीर””
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बहुत सुंदर
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Tq
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बहुत खूब
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टक़
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अंतस् में है पीर
पीर का रोना रोकर
नहीं भला कोई बन पाया-

Tq
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उत्तम साहित्य अंतत में है पीर पीर का रोना रोकर नहीं भला कोई बन पाया है सब कुछ कर कर क्या बात है आपकी बहुत ही सुंदर कविता है
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