ज़मीं से आसमां का फासला तय होता
मौत के घर का पता सबको पता होता।
न डर होता किसी के खोने का
कोयी छाया ऐसा, नशा होता।
मुस्कराहट होती बस हरेक चेहरे पर
न खौंफ का कोई मंज़र बना होता।
यह विपदा यूं ना मुंह बाये खङी होती
न खैरातों की दमघोंटू सिलसिला शुरू होता।
संतुष्टि की महफ़िल से,यह मन सजा होता
प्रकृति का कहर यूं ना हमपे बरपा होता।
अच्छा होता
Comments
4 responses to “अच्छा होता”
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बहुत सुन्दर सारगर्भित रचना प्रस्तुति
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आपकी लेखनी काबिले-तारीफ है
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अतिसुंदर रचना
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धन्यवाद
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