सावन तुमसे माफी है
माफी दिनकर कालिदास के बच्चों से है,
काफी दिन मै दूर रहा
दूर कारण-
फोन मेरा चोरी हुआ था,
अभी फोन लिया नही
पर सावन तुमसे दूर हुआ नही,
कहां गए सब ,
सावन आज बुलाता है,
पतझड़ जैसे दिखता है,
देख अस्तित्व को रोता है,
गालिब के बच्चों,
कालिदास के बच्चों
बच्चन की मधुशाला पीकर
क्या भटक गए हो,
कोई टैगोर की धरती से था,
कोई जम्मू कश्मीर से था,
कोही पूरब पश्चिम से था,
कोई दिनकर की धरती से था,
कोई प्रयागराज से था,
कोई कन्याकुमारी से था,
कहां गए सब सावन पूछ रहा है,
गर्मी जाति वर्षा आती,
वर्षा मे सावन पतझड़ जैसा लगता है
आओ मिलकर एक काम करें,
सावन के माध्यम से जनता से संवाद करें,
उसके हित की बात करें
देश धर्म का उत्थान करें,
हर कष्टों का उपचार करें ,
बिग बिगड़ी बातों को नजरअंदाज करें ,
सब मिलकर के सावन को कविता से भर ,
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कवि ऋषि कुमार प्रभाकर
अपना सावन
Comments
4 responses to “अपना सावन”
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अगर कुछ गलत हुआ हो तो माफी चाहता हू
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बहुत सुंदर कविता लिखी है ऋषि भाई, अब नया फोन मिल गया है God bless you…
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समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद
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सुंदर
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