6 Comments

  1. ये सृष्टि हर क्षण अग्रसर है
    विनाश की ओर…
    स्वार्थ, वासना और वैमनस्य की बदली
    निगल रही हैं विवेक के सूर्य को..!!
    ——- बहुत सुंदर पंक्तियाँ, बहुत सुन्दर रचना

  2. तब विनाश के उन क्षणों में भी तुम्हारी
    उँगलियों का मेरी उँगलियों में उलझना,
    पर्याप्त होगा मुझमें जीने की उत्कण्ठ
    अभिलाषा जगाये रखने के लिए..!!
    ___रूह की गहराइयों की मोहब्बत दिखाती हुई कवियित्री अनु उर्मिल जी की बेहद शानदार प्रस्तुति। बहुत उत्कृष्ट रचना

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