अनुवाद's Posts

लड़कियाँ

घर आँगन में फूलों सी खिलती हुई लड़कियाँ! फ़ीकी दुनिया में मिसरी सी घुलतीं हुई लड़कियां!! उदासियों की भीड़ में हँसती हुई मिलती हैं! ज़िम्मेदारी के बोझ तले पिसती हुई लड़कियाँ!! ढल जाती हैं पानी सी हर बार नए आकार में! रिश्ते निभाके ख़ुद से बिछड़ती हुई लड़कियाँ!! लड़ रही हैं आज ख़ुद को बचाने के लिए! मंदिर में देवियों सी पुजती हुई लड़कियाँ!! निकल रही हैं खोल से अब पंख नए ले कर! तितली बन आकाश में उड़ती हुई लड़कियाँ!!... »

अभिलाषा

ये सृष्टि हर क्षण अग्रसर है विनाश की ओर… स्वार्थ, वासना और वैमनस्य की बदली निगल रही हैं विवेक के सूर्य को..!! सुनो! जब दिन प्रतिदिन घटित होतीं वीभत्स त्रासदियाँ मिटा देंगी मानवता को जब पृथ्वी परिवर्तित हो जाएगी असंख्य चेतनाशून्य शरीरों की भीड़ में…!! जब अपने चरम पर होगी पाशविकता और अंतिम साँसे ले रहा होगा प्रेम… जब जीने से अधिक सुखकर लगेगा मृत्यु का आलिंगन…!! तब विनाश के उन ... »

नैराश्य

खुशियां सदा अमावस की रात की आतिशबाजी की तरह आईं मेरे जीवन में… जो बस खत्म हो जाती है क्षण भर की जगमगाहट और उल्लास देकर… और बाद में बचता है तो एक लंबा सन्नाटा और गहन अँधेरा…. वहीं नैराश्य मेरे जीवन में आया किसी धुले सफ़ेद आँचल पर लगे दाग की तरह ..!! जो शुरुआत में तो बुरा लगता है परंतु धीरे धीरे लगने लगता है उस आँचल का अभिन्न हिस्सा…!! वस्तुतः ‘नैराश्य’ मेरा स्थायी... »

जज़्बात

यूँ अपने जज़्बात नुमाया क्यों करते हो ! मेरी ख़ातिर अश्क बहाया क्यों करते हो !! क़िस्मत के लिक्खे से मैं भी वाकिफ़ हूँ ! बातों से मुझको बहलाया क्यों करते हो !! जब साथ तुम्हारा है ही नहीं मुक़द्दर में ! फिर मेरे ख़्वाबों में आया क्यों करते हो !! भूल के तुमको जिसने जीना सीख लिया ! उसकी ख़ातिर नींदें ज़ाया क्यों करते हो !! अपना बनकर दुनिया ज़ख़्म लगाती है ! सबको अपने राज़ बताया क्यों करते हो !! पत्थर दिल इंसानो... »

यादें

बीते कल की परछाई है और तुम्हारी यादें हैं मैं हूँ, मेरी तन्हाई है और तुम्हारी यादें हैं..!! सर्द अंधेरी इन रातों में थोड़ी सी मदहोशी है टूटी सी इक अंगड़ाई है और तुम्हारी यादें हैं!! छूके तुमको आने वाली इन मदमस्त हवाओं ने भीनी खुशबू बिखराई है और तुम्हारी यादें हैं…!! ख्वाब तुम्हारे देखने वाली चंचल सी इन आँखों मे दर्द की बदली घिर आई है और तुम्हारी यादें हैं.!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (2... »

प्रेम

राहें हमारी मिलने के आसार नहीं हैं! कैसे कहूँ तुम्हारा इंतजार नहीं है!! मेरी हर दलील को ठुकरा चुका है ये! इस दिल पे मेरा कोई इख्तियार नही है!! ख़्वाबों में तुमसे रोज़ मुलाक़ात है मेरी! अफसोस हक़ीकत में ही दीदार नहीं है!! रूह के हर जर्रे में शामिल हो तुम ही तुम! और कहते हो लकीरों में मेरी प्यार नहीं है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »

बदल रही है ज़िंदगी

बदल रही है ज़िंदगी, बदल रही हूँ मैं..! तुम इश्क हो तुम्ही में ढल रही हूँ मैं!! नरमी तुम्हारे हाथों की ओढ़े हुए हैं धूप..! तपिश में इसकी बर्फ़ सी पिघल रही हूँ मैं!! जाना तुम्हें तो ख़ुद का कुछ होश न रहा! गिरती हूँ कभी और क़भी संभल रही हूँ मैं!! ख़ुद से छिपाती हूँ मैं अपने दिल का हाल! लगता है जैसे हाथों से निकल रही हूँ मैं..!! रस्ता भी मेरा तुम हो मंजिल भी तुम ही हो! जाऊँ जिधर भी तुम से ही मिल रही हूँ मैं... »

दुःख

मैं हमेशा दुःख से कतराती रही, इसे दुत्कारती रही मगर ये दुःख हमेशा ही मिला है मुझसे बाहें पसारे…!! मैं भटकती रही चेहरे दर चेहरे सुख की तलाश में… और वो हमेशा रहा एक परछाई की तरह जो दिखती तो है मगर क़भी कैद नही होती हाथों में…!! दुःख बारिशों में उगी घास की तरह है जिसे हज़ार बार उखाड़ कर फेंको मगर ये उग ही जाता हैं दिल की जमीं पर..!! सुख ने हमेशा छला है मुझे एक मरीचिका की तरह… मगर... »

प्रेम का सागर

उसकी आँखों में झलकता है, उसके दिल मे बसे सागर का चेहरा !! दुःख की उद्दंड लहरें अक्सर छूकर, भिगोती रहती हैं पलकों के किनारों को !! उस सागर की गहराई में बिखरे हैं, बीते हुए लम्हों की यादों के लाखों मोती !! वो सागर है प्रेम का मगर अधूरी उसकी प्यास है, एक राह से भटकी नदिया से मिलन की उसको आस है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (03/10/2020) »

वो लड़का

उसके आँसू का संचय कर ईश्वर समंदर रचता है। प्रतीक्षा की पावन अग्नि में वो आहुतियों सा जलता है…!! जिसकी उदासी के रंग में ढलकर हुई ये रातें काली हैं, बीतें लम्हों की सोहबत में जिसने इक लंबी उम्र गुजारी है..!! वो जब भी कलम उठाता है, दर्द संवर सा जाता है, जिसकी मोहब्ब्त का सुरूर पल-पल बढ़ता जाता है…!! वो हर दिन हर पल चाहत की नई इबारतें गढ़ता है वो लड़का न कमाल मोहब्ब्त करता है..!! ©अनु उर्मिल ... »

क्या बेटी होना गुनाह है

क़भी कोख़ में ही मार डाला उसे, कभी काट के फेंक दिया खलिहानों में!! कभी बेंच दिया उसे देह के बाज़ारों में , क़भी सरेराह नोचा सड़कों और चौराहों पे!! जब जी चाहा पूजा देवियों सा, कभी अपमानित किया उसे गालियों से!! आगे बढ़ने की चाहत की तो दीवारों में क़ैद हुई, कभी मान की ख़ातिर उसको झोंक दिया अंगारों में!! दुर्गा,काली की धरती पर कैसी ये विडंबना , इस देश में बेटी होना क्यों है एक गुनाह.. ?? ©अनु उर्मिल ‘अन... »

विचार के जुगनू

कभी कभी मेरे मन के अंधेरे कमरे में न जाने किस झरोखे से चले आते हैं जुगनुओं से झिलमिलाते विचार…!! मैं अपना हाथ बढ़ाकर कोशिश करती हूँ उन्हें छू लेने की और वे छिटककर आगे बढ़ जाने की…!! बड़ी जद्दोजहद के बाद जब अपनी हथेलियों में क़ैद कर लेती हूँ इक चमकता विचार… तब उसे रख देती हूँ किसी कोरे कागज पर ताकि उसकी रोशनी से कुछ पल के लिये ही सही मिट सके मेरे मन का अंधकार..!! © अनु उर्मिल ‘अ... »

प्रेम की बारिश

सुनो! अपने घर की छत से देर तक जिस आसमान को निहारा करते हो न.. उस आसमान के एक छोटे से टुकड़े में अपने दिल में बसे प्रेम का इक कतरा भर कर इन हवाओं के साथ मेरे पास भेज दो… जब वह प्रेममय बादल मुझपर बरसेगा तो उसकी बारिश में भीग कर फिर से हरी हो जायेगी मुद्दतों से बंजर पड़ी मेरे दिल की ज़मीं..!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »