अनुवाद's Posts

तुम्हारी आँखे

कल अचानक ही तुम्हारी तस्वीर पर आकर ठहर गईं मेरी निगाहें… और मैं उलझकर रह गयी तुम्हारी आँखों के तिलिस्म में ..!! गहरी ख़ामोशी समेटे हुए सागर सी ये तुम्हारी आँखे, साक्षी हैं ज़िन्दगी के न जाने कितने तूफानों, न जाने कितने ही चक्रवातों की, दर्द के लाखों मोती रोज ही मिलते हैं इस सागर की तलहटी में..!! जानते हो एक दिलचस्प किस्सागोई करती हैं ये, तुम्हारे होंठों से कहीं ज़्यादा कहानियाँ बसती हैं तुम्हार... »

रंगमंच

दुनिया के रंगमंच में कुछ किरदार ऐसे होते हैं जो कभी किसी का ध्यान आकर्षित नही कर पाते… मगर उनके बिना अधूरी है कहानी की खूबसूरती…!! वो कभी नहीं करते प्रयास कहानी का नायक बनने का… मगर पूरी तत्परता से निभाते हैं अपना किरदार बिना किसी सराहना की उम्मीद किये…!! और एक दिन ज़िन्दगी की पेचीदा पटकथा में उलझकर खो जाते हैं नेपथ्य में…!! मैं तुम्हारी दुनिया के रंगमंच का शायद वही कि... »

कविता

असम्भव है तुम्हें परिभाषा के दायरे में बांधना.. तुम हो वो सागर, जिसमें विलीन होता है व्याकुलता का दरिया.. या निष्प्राण मन के भीतर बसी नीरवता को चीर के उपजी स्नेहमय अनुगूँज..!! एक बजंर हृदय के धरातल पर सहसा फूटता हुआ भावों का सोता.. या फिर एक नज़रिया, जो हर दृष्टिगोचर में अंतर्निहित वास्तविक सत्य को उजागर करने का..!! कविता! तुम पर्याय हो मेरे लिए ‘सार्थकता’ की अनुभूति का..!! ©अनु उर्मिल ... »

गौरैया

गौरैया, जाने कहाँ उड़ गई तुम अपने मखमली परों में बाँध के वो सुबहें, जो शुरू होती थी तुम्हारी चहचहाहटों के साथ और वो शामें, जब आकाश आच्छादित होता था तुम्हारे घोसलों में लौटने की आतुरता से…!! वो छत पर रखा मिट्टी का कटोरा सूखा पड़ा है न जाने कब से… आँगन में नहीं बिखेरे जाते अब पूजा की थाली के बचे हुए चावल…!! एक मुद्दत से नहीं देखा मैंने तुम्हें अपना नीड़ बुनते… और तुम्हारा अपने ब... »

सुनो वनिता

संसार द्वारा रचित तुम्हारी महानता के प्रतिमान वास्तव में षड्यंत्र हैं तुम्हारे विरुद्ध…!! तुम सदा उलझी रही स्वयं को उन प्रतिमानों के अनुरूप ढालने में और वंचित रही अपने सुखों से..!! सुनो वनिता! जब तक तुम अनभिज्ञ हो इस तथ्य से कि “तुम्हारा सुख तुम्हारी महानता में नहीं वरन तुम्हारे साधारण होने में है”… तब तक ये सृष्टि हो नहीं सकेगी तुम्हारे योग्य…!! ©अनु उर्मिल ‘अन... »

मरीचिका

सुंदरता के प्रति हमारा उन्माद इतना अधिक रहा है कि हमनें तकनीकों का सहारा लेकर हर वस्तु को सुंदर बनाने का भरसक प्रयास किया…!! जबकि हमें बदलनी चाहिए थी अपनी दृष्टि जो रचती है भेद सुंदरता और असुन्दरता का !! दुर्भाग्य से हम विफ़ल रहे हैं समस्याओं के वास्तविक मूल को पहचानने में और भटकते रहते हैं अपने मन द्वारा रचित मरीचिकाओं में..!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (06/03/2021) »

एहसास

कुछ एहसास हैं जो आकर ठहर गये हैं ज़बान की नोंक पर… होंठो की सीमाएँ लाँघने को आतुर, बस उमड़ पड़ना चाहते हैं एक अंतर्नाद करते हुए…!! मगर उन एहसासों के पैर बंधे हुए हैं एक डर की ज़ंजीर से…!! वही जाना-पहचाना डर “उसे खो देने का” जिसे पाया है बड़ी मुश्किल से या फिर इस भ्रम के टूट जाने का कि हाँ! वो मेरा है…!! सच कुछ एहसास कितने बदनसीब होते हैं लफ्ज़ों के साँचे में ढलते ही ब... »

वचन

जब कभी भी टूटे ये तंद्रा तुम्हारी, जब लगे कि हैं तुम्हारे हाथ खाली! जब न सूझे ज़िन्दगी में राह तुमको, जब लगे कि छलते आये हो स्वयं को! जब भरोसा उठने लगे संसार से , जब मिलें दुत्कार हर एक द्वार से! जग करे परिहास और कीचड़ उछाले, व्यंग्य के जब बाण सम्भले न सम्भाले! ईश्वर करे जब अनसुना तुम्हारे रुदन को, जब लगे वो बैठा है मूंदे नयन को! न बिखरना, न किसी को दोष देना, मेरे दामन में स्वयं को सौंप देना..!! अपन... »

मातृभाषा

दर्द बनके आँखो के किनारों से बहती है! बनकर दुआ के फूल होंठो से झरती है!! देती है तू सुकून मुझे माँ के आँचल सा! बनके क़भी फुहार सी दिल पे बरसती है!! खुशियाँ ज़ाहिर करने के तरीक़े हज़ार है! मेरे दर्द की गहराई मगर तू समझती है!! जाऊँ कहीं भी मैं इस दुनिया जहान में! बन कर मेरी परछाईं मेरे साथ चलती हैं!! होगी ग़ुलाम दुनिया ये पराई ज़बान की ! मेरी मातृभाषा तू मेरे दिल में धड़कती है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद&#... »

क़िताबें

जब भी मन घिर जाता है अपने अंतर्द्वंदों की दीवारों से, जब मस्तिष्क के आकाश में छा जाते हैं बादल अवसादों के…!! तब छांट कर संशय के अँधियारों को, ये जीवन को नई भोर देती हैं, ‘किताबें’…..मन के बन्द झरोखें खोल देती हैं..!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »

प्रेम और विज्ञान

एक महान विज्ञानी का कथन है… ‘हर क्रिया की बराबर किंतु विपरीत प्रतिक्रिया होती है’..!! प्रेम करने वाले इस तथ्य के जीवंत उदाहरण हैं…. समाज ने जितनी तत्परता से रचे हैं प्रेमियों को एक दूजे से दूर करने के षड्यंत्र… प्रेम उतने ही वेग से गहरी पैठ बनाता गया है प्रेमियों के हृदयों में…!! वास्तव में विज्ञान के समस्त सिद्धांतों की व्याख्या हेतु प्रेम सर्वोत्तम माध्यम है&#... »

पुलवामा शहीदों को नमन

याद है हमको प्रेम दिवस ऐसा भी एक आया था! थी रक्तरंजित वसुंधरा, और आकाश थरथराया था!! एक कायर आतंकी ने घोंपा था सीने पर खंजर! ख़ून बहा कर वीरों का, बदला था वादी का मंजर!! चालीस जवानों का काफ़िला चीथड़ों में बदल गया! था ऐसा वीभत्स नज़ारा कि हृदय देश का दहल गया!! गूँजी दसों दिशाओं में माताओं की भीषण चीत्कारें! ख़ून नसों का उबल गया, आँखो से थे बरसे अंगारे!! भारत की रूह पे दुश्मन ने गहरा ज़ख्म लगाया था! लेकिन... »

चुम्बन

वो भटकता रहा लफ़्ज़ दर लफ़्ज़ गढ़ने को परिभाषायें प्रेम की, रिश्तों की, विश्वास की…!! और मैंने अंकित कर दिया हर एहसास उसके दिल में सिर्फ चूम के उसके माथे को…!! ‘दरअसल चुम्बन, आलिंगन और प्रेमल स्पर्श मानव को सृष्टि द्वारा प्रदत्त सर्वश्रेष्ठ भाषाएँ है..!!’ ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (13/02/2021) »

आलिंगन

सांसारिक कुचक्रों में उलझ कर अपनी मौलिकता से समझौता करते मानव सुनो..!! अपने भीतर हमेशा बचा कर रखना इतना सा प्रेम…!! कि जब भी कोई व्यथित हृदय तुम्हारा आलिंगन करे तो उस प्रेम की ऊष्मा से पिघलकर आँसू बन बह उठे उसके मन में जमी पीड़ाओं की बर्फ…!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (12/02/2021) »

वचन

यदि बाँधने जा रहे हो किसी को वचनों की डोर से, तो इतना स्मरण रखना कहीं झोंक न दे वचन तुम्हारा उसे उम्र भर की अनन्त प्रतीक्षा में… क्योकि, प्रतीक्षा वह अग्नि है जो भस्म कर देती है स्वप्नों और उम्मीदों के साथ-साथ मनुष्य की आत्मा को भी…!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »

रिक्तता

निकाल कर फेंक दिया है मैने अपने भीतर से हर अनुराग, हर संताप… अब न ही कोई अपेक्षा है बाक़ी औऱ न ही कोई पश्चाताप..!! मैं मुक्त कर चुकी हूँ स्वप्न पखेरुओं को आँखो की कैद से… वो उड़ चुके हैं अपने साथ लेकर मेरे हृदय के सारे विषादों को.. अब मेरे अंतस में है एक अर्थपूर्ण मौन और रिक्तता.. रिक्तता जो स्वयं में है परिपूर्ण जो पूरित है सुखद वर्तमान से…!! वर्तमान,जो स्वतंत्र है विगत की परछाइयो... »

दोहरा चरित्र

जब भी प्रेम करने वालों को कोसा गया मैंने बंद कर लिए अपने कान… जब भी प्रेमियों पर अत्याचार किये गए मैंने मूँद लीं अपनी आँखें…!! जब भी किसी प्रेमी युगल ने देखा मेरी तरफ उम्मीद से, मैंने उन्हें निराश किया.. अखबारों में आये दिन छपने वालीं प्रेमियों के कत्ल की खबरें भी रहीं मेरे दिल पर बेअसर…!! अपनी कविताओं में प्रेम के क़सीदे पढ़ने वाले हम…. प्रेम की ताकत का बखान करने वाले हमR... »

सुख दुःख

एक विरोधाभास रहा है हमेशा से हमारी कल्पनाओं और वास्तविकता के बीच..!! जहाँ कल्पनाएं सुख की मीठी नदी है, वहीं वास्तविकता दुःख का खारा सागर..!! मगर हम हमेशा वास्तविकता की अवहेलना कर चुनते हैं कल्पनाओं की नदी में गोते लगाना!! ये जानते हुए भी कि अनेकों नदियाँ अपना अस्तित्व खोकर भी मिटा नहीं सकती सागर के खारेपन को..!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »

लड़कियाँ

घर आँगन में फूलों सी खिलती हुई लड़कियाँ! फ़ीकी दुनिया में मिसरी सी घुलतीं हुई लड़कियां!! उदासियों की भीड़ में हँसती हुई मिलती हैं! ज़िम्मेदारी के बोझ तले पिसती हुई लड़कियाँ!! ढल जाती हैं पानी सी हर बार नए आकार में! रिश्ते निभाके ख़ुद से बिछड़ती हुई लड़कियाँ!! लड़ रही हैं आज ख़ुद को बचाने के लिए! मंदिर में देवियों सी पुजती हुई लड़कियाँ!! निकल रही हैं खोल से अब पंख नए ले कर! तितली बन आकाश में उड़ती हुई लड़कियाँ!!... »

अभिलाषा

ये सृष्टि हर क्षण अग्रसर है विनाश की ओर… स्वार्थ, वासना और वैमनस्य की बदली निगल रही हैं विवेक के सूर्य को..!! सुनो! जब दिन प्रतिदिन घटित होतीं वीभत्स त्रासदियाँ मिटा देंगी मानवता को जब पृथ्वी परिवर्तित हो जाएगी असंख्य चेतनाशून्य शरीरों की भीड़ में…!! जब अपने चरम पर होगी पाशविकता और अंतिम साँसे ले रहा होगा प्रेम… जब जीने से अधिक सुखकर लगेगा मृत्यु का आलिंगन…!! तब विनाश के उन ... »

नैराश्य

खुशियां सदा अमावस की रात की आतिशबाजी की तरह आईं मेरे जीवन में… जो बस खत्म हो जाती है क्षण भर की जगमगाहट और उल्लास देकर… और बाद में बचता है तो एक लंबा सन्नाटा और गहन अँधेरा…. वहीं नैराश्य मेरे जीवन में आया किसी धुले सफ़ेद आँचल पर लगे दाग की तरह ..!! जो शुरुआत में तो बुरा लगता है परंतु धीरे धीरे लगने लगता है उस आँचल का अभिन्न हिस्सा…!! वस्तुतः ‘नैराश्य’ मेरा स्थायी... »

जज़्बात

यूँ अपने जज़्बात नुमाया क्यों करते हो ! मेरी ख़ातिर अश्क बहाया क्यों करते हो !! क़िस्मत के लिक्खे से मैं भी वाकिफ़ हूँ ! बातों से मुझको बहलाया क्यों करते हो !! जब साथ तुम्हारा है ही नहीं मुक़द्दर में ! फिर मेरे ख़्वाबों में आया क्यों करते हो !! भूल के तुमको जिसने जीना सीख लिया ! उसकी ख़ातिर नींदें ज़ाया क्यों करते हो !! अपना बनकर दुनिया ज़ख़्म लगाती है ! सबको अपने राज़ बताया क्यों करते हो !! पत्थर दिल इंसानो... »

यादें

बीते कल की परछाई है और तुम्हारी यादें हैं मैं हूँ, मेरी तन्हाई है और तुम्हारी यादें हैं..!! सर्द अंधेरी इन रातों में थोड़ी सी मदहोशी है टूटी सी इक अंगड़ाई है और तुम्हारी यादें हैं!! छूके तुमको आने वाली इन मदमस्त हवाओं ने भीनी खुशबू बिखराई है और तुम्हारी यादें हैं…!! ख्वाब तुम्हारे देखने वाली चंचल सी इन आँखों मे दर्द की बदली घिर आई है और तुम्हारी यादें हैं.!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (2... »

प्रेम

राहें हमारी मिलने के आसार नहीं हैं! कैसे कहूँ तुम्हारा इंतजार नहीं है!! मेरी हर दलील को ठुकरा चुका है ये! इस दिल पे मेरा कोई इख्तियार नही है!! ख़्वाबों में तुमसे रोज़ मुलाक़ात है मेरी! अफसोस हक़ीकत में ही दीदार नहीं है!! रूह के हर जर्रे में शामिल हो तुम ही तुम! और कहते हो लकीरों में मेरी प्यार नहीं है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »

बदल रही है ज़िंदगी

बदल रही है ज़िंदगी, बदल रही हूँ मैं..! तुम इश्क हो तुम्ही में ढल रही हूँ मैं!! नरमी तुम्हारे हाथों की ओढ़े हुए हैं धूप..! तपिश में इसकी बर्फ़ सी पिघल रही हूँ मैं!! जाना तुम्हें तो ख़ुद का कुछ होश न रहा! गिरती हूँ कभी और क़भी संभल रही हूँ मैं!! ख़ुद से छिपाती हूँ मैं अपने दिल का हाल! लगता है जैसे हाथों से निकल रही हूँ मैं..!! रस्ता भी मेरा तुम हो मंजिल भी तुम ही हो! जाऊँ जिधर भी तुम से ही मिल रही हूँ मैं... »

दुःख

मैं हमेशा दुःख से कतराती रही, इसे दुत्कारती रही मगर ये दुःख हमेशा ही मिला है मुझसे बाहें पसारे…!! मैं भटकती रही चेहरे दर चेहरे सुख की तलाश में… और वो हमेशा रहा एक परछाई की तरह जो दिखती तो है मगर क़भी कैद नही होती हाथों में…!! दुःख बारिशों में उगी घास की तरह है जिसे हज़ार बार उखाड़ कर फेंको मगर ये उग ही जाता हैं दिल की जमीं पर..!! सुख ने हमेशा छला है मुझे एक मरीचिका की तरह… मगर... »

प्रेम का सागर

उसकी आँखों में झलकता है, उसके दिल मे बसे सागर का चेहरा !! दुःख की उद्दंड लहरें अक्सर छूकर, भिगोती रहती हैं पलकों के किनारों को !! उस सागर की गहराई में बिखरे हैं, बीते हुए लम्हों की यादों के लाखों मोती !! वो सागर है प्रेम का मगर अधूरी उसकी प्यास है, एक राह से भटकी नदिया से मिलन की उसको आस है!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ (03/10/2020) »

वो लड़का

उसके आँसू का संचय कर ईश्वर समंदर रचता है। प्रतीक्षा की पावन अग्नि में वो आहुतियों सा जलता है…!! जिसकी उदासी के रंग में ढलकर हुई ये रातें काली हैं, बीतें लम्हों की सोहबत में जिसने इक लंबी उम्र गुजारी है..!! वो जब भी कलम उठाता है, दर्द संवर सा जाता है, जिसकी मोहब्ब्त का सुरूर पल-पल बढ़ता जाता है…!! वो हर दिन हर पल चाहत की नई इबारतें गढ़ता है वो लड़का न कमाल मोहब्ब्त करता है..!! ©अनु उर्मिल ... »

क्या बेटी होना गुनाह है

क़भी कोख़ में ही मार डाला उसे, कभी काट के फेंक दिया खलिहानों में!! कभी बेंच दिया उसे देह के बाज़ारों में , क़भी सरेराह नोचा सड़कों और चौराहों पे!! जब जी चाहा पूजा देवियों सा, कभी अपमानित किया उसे गालियों से!! आगे बढ़ने की चाहत की तो दीवारों में क़ैद हुई, कभी मान की ख़ातिर उसको झोंक दिया अंगारों में!! दुर्गा,काली की धरती पर कैसी ये विडंबना , इस देश में बेटी होना क्यों है एक गुनाह.. ?? ©अनु उर्मिल ‘अन... »

विचार के जुगनू

कभी कभी मेरे मन के अंधेरे कमरे में न जाने किस झरोखे से चले आते हैं जुगनुओं से झिलमिलाते विचार…!! मैं अपना हाथ बढ़ाकर कोशिश करती हूँ उन्हें छू लेने की और वे छिटककर आगे बढ़ जाने की…!! बड़ी जद्दोजहद के बाद जब अपनी हथेलियों में क़ैद कर लेती हूँ इक चमकता विचार… तब उसे रख देती हूँ किसी कोरे कागज पर ताकि उसकी रोशनी से कुछ पल के लिये ही सही मिट सके मेरे मन का अंधकार..!! © अनु उर्मिल ‘अ... »

प्रेम की बारिश

सुनो! अपने घर की छत से देर तक जिस आसमान को निहारा करते हो न.. उस आसमान के एक छोटे से टुकड़े में अपने दिल में बसे प्रेम का इक कतरा भर कर इन हवाओं के साथ मेरे पास भेज दो… जब वह प्रेममय बादल मुझपर बरसेगा तो उसकी बारिश में भीग कर फिर से हरी हो जायेगी मुद्दतों से बंजर पड़ी मेरे दिल की ज़मीं..!! ©अनु उर्मिल ‘अनुवाद’ »