अवनी हूँ मैं

अवनी हूँ मैं अंबर है तू ,
डूबू जो मैं संबल है तू ।
ये मन मेरा मन्दिर है जो
प्यारे प्रभु की मूरत है वो।
भटकू मैं क्यों इधर से उधर
मन में ही तो रहता है वो।
अकेली कहाँ क्यूँ डर मुझे
हरपल संग में रहता है वो।
अधूरी रहे क्यू ख्वाहिश मेरी
कहने से पहले पूर्ण करता है वो ।

Comments

13 responses to “अवनी हूँ मैं”

  1. अतिसुन्दर

    1. Suman Kumari

      सादर आभार कमला जी

    1. Suman Kumari

      dhanybady

    1. Suman Kumari

      सादर आभार

    2. Suman Kumari

      धन्यवाद

  2. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    बहुत ही सुन्दर बहन जी

  3. Rajeev Ranjan Avatar
    Rajeev Ranjan

    बहुत ही सुन्दर बहन जी
    सब उसमें हैं और वो सबमें
    नित अपनों के प्यार को तरस रहा
    सब उसके खिलौने में उलझे पड़े
    कोई मन शायद कुम्भकार को तरस रहा

    1. Suman Kumari

      सादर आभार भाई

  4. Geeta kumari

    वाह,सुमन जी बहुत सुंदर रचना

  5. बहुत सुंदर, खूबसूरत अभिव्यक्ति

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