अवनी हूँ मैं अंबर है तू ,
डूबू जो मैं संबल है तू ।
ये मन मेरा मन्दिर है जो
प्यारे प्रभु की मूरत है वो।
भटकू मैं क्यों इधर से उधर
मन में ही तो रहता है वो।
अकेली कहाँ क्यूँ डर मुझे
हरपल संग में रहता है वो।
अधूरी रहे क्यू ख्वाहिश मेरी
कहने से पहले पूर्ण करता है वो ।
अवनी हूँ मैं
Comments
13 responses to “अवनी हूँ मैं”
-

अतिसुन्दर
-

सादर आभार कमला जी
-
-

Good
-

dhanybady
-
-
सुंदर
-

सादर आभार
-

धन्यवाद
-
-
बहुत ही सुन्दर बहन जी
-
बहुत ही सुन्दर बहन जी
सब उसमें हैं और वो सबमें
नित अपनों के प्यार को तरस रहा
सब उसके खिलौने में उलझे पड़े
कोई मन शायद कुम्भकार को तरस रहा-

सादर आभार भाई
-
-
वाह,सुमन जी बहुत सुंदर रचना
-
बहुत सुंदर, खूबसूरत अभिव्यक्ति
-
अच्छा है
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.