अहंकार

प्रजापति दक्ष हो या
हिरना कश्यप सा राजा
विद्वान रावण हो या
हो कौरव वंश का कुनबा
इनके हनन का भी
अहंकार ही बना संघारक ।
युगो युगो से अहंकारियों
का क्या हश्र हुआ ?
क्यूं भूल गया तू उनका कारक?
दम्भ को रख जीवन में
क्यों जीता है तू बन कर चातक ।
जीवन प्रगति में मनुष्य का
अहंकार बहुत बड़ा है बाधक ।
अहंकार को त्याग कर
मानवता का मान रख ,
बन जा तू फिर से जातक ।
त्याग दुरूह दुर्गम
श्रेयपथ की यात्रा ,
चल प्रेम स्नेह की डगर
बन जा तू प्रेम का साधक
—✍️एकता गुप्ता “काव्या”

Comments

5 responses to “अहंकार”

  1. बहुत खूब

  2. अतिसुंदर रचना 

  3. सुंदर भाव। 

  4. Amita

    बहुत सुंदर रचना प्रस्तुति

  5. Satish Chandra Pandey

    बहुत ही सच्ची बात लिखी है आपने, वाह वाह

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