इंसान से परमात्मा

कोई वजूद नहीं था तुम्हारा
मेरे बिना..
यूंँ ही गुमसुम बैठे रहते थे..
मैंने ही आकर तुम्हारी
जिंदगी में रंग भरे
होठों को मुस्कुराना सिखाया,
हँसना सिखाया, रोना सिखाया।
मेरी ही मोहब्बत ने तुम्हें
इंसान से परमात्मा बनाया।

Comments

18 responses to “इंसान से परमात्मा”

  1. बेहतर खयाल बेहद सरल सहज अभिव्यक्ति

  2. अतिसुन्दर

  3. सुन्दर भाव

  4. बहुत सुन्दर भाव है
    अच्छा लिखती हो

  5. Virendra sen Avatar
    Virendra sen

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  6. vivek singhal

    This comment is currently unavailable

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