नहीं हूं मैं हिन्दू पहले,
न ही दलित की बेटी हुं।
मैं निर्भया आज की ,
इंसाफ़ मांगती,
मैं पहले देश की बेटी हुं।
क्यों नहीं पसीजा तुम्हारा हृदय,
जब हैवानों ने मुझे शर्मसार किया,
क्यो चुप थी मीडिया सारी,
जब जिस्म मेरा तार-तार किया,
कब मैं इंसाफ पाऊंगी?
या राजनीति में उलझ ,
फिर से दम तोड़ जाऊंगी।
रहेगा फासला वर्षों का,
या पल में इंसाफ पा जाऊंगी,
….मैं निर्भया आज की…
एक और निर्भया
Comments
22 responses to “एक और निर्भया”
-

She deserve a quick justice. Justice delayed is equal to justice denied.
-

बिल्कुल सही कहा आपने रीतिका जी,
समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद
-
-
इंसाफ मांगती है एक और निर्भया
-

जी सर, समीक्षा के लिए हार्दिक धन्यवाद
-
-
Superior
-

धन्यवाद
-
-

😔
-

🙏
-
-
उत्तम रचना
-

धन्यवाद सर
-
-
आपकी भावना का सम्मान।
-

बहुत बहुत आभार
-
-

हाथरस घटना से जुड़े बहुत ही मार्मिक व यथार्थपरक भाव
-

जी सर, धन्यवाद
-
-

Beautiful
-

Thank you
-
-

💯👌👌
-

धन्यवाद
-

दिल को छू लेनी वाली और सोचने के लिए मजबूर केने वाली कविता. 👍😢
-

Thank you so much
-
-

Yah aaj ka sach hai
-

धन्यवाद
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.