आज बहुत उदास होकर
उसने मुझे पुकारा,
मैं पास गई और
उसे प्यार से सहलाया…
उसने मुझसे कहा
तुम मुझसे नाराज हो क्या ?
या जिन्दगी की उलझनों से हताश हो क्या ?
मैंने मुस्कुराते हुए
अपने आँसू छुपाकर कहा
नहीं तो पगले !
तुझसे नाराज नहीं खुद से खफा हूँ मैं
जिन्दगी से हताश नहीं
हैरान हूँ मैं…
बस कुछ दिनों से खुद से नहीं मिल पाई हूँ
इसीलिए तुझे अपने प्रेम से
सींच नहीं पाई हूँ…
मेरी गोद में सिर रखकर उसने कहा
तो फिर तुमने मुझे कई दिनों से सींचा क्यों नहीं!
सुबह उठकर सबसे पहले
मुझे देखा क्यों नहीं!
वो छज्जे पर गमले में बैठा
मेरा मनी प्लांट’
मुझसे से सवाल पर सवाल करता रहा और
मैं खामोश थी…
और मैं खामोंश थी…!!
Comments
8 responses to “और मैं खामोंश थी…!!”
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बहुत खूब मनी प्लांट का ख़ूबसूरती से मानवीकरण किया है और जीवन की सच्चाइयों से अवगत कराती हुई लाजवाब अभिव्यक्ति
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धन्यवाद
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अति उत्तम
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धन्यवाद
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लाजवाब
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धन्यवाद
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वो छज्जे पर गमले में बैठा
मेरा मनी प्लांट’
मुझसे से सवाल पर सवाल करता रहा और
मैं खामोश थी…
कवि प्रज्ञा जी की लेखनी से निकली यह कविता उच्चस्तरीय है। कवि ने अभिधागत लक्ष्यार्थ से कथ्य को प्रस्तुत किया है। बेहतरीन रचना -
अतिसुंदर भाव
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