पहले रहती थी
खिलखिलाती मुस्कुराती मैं कली
फिर आया एक भंवरा
मेरे सम्मुख हे अली !
पी लिया उसने मेरे जीवन का
सारा रस अली
मुस्कुराती कली फिर
सिसकते हुए रोने लगी
मेरे जीवन की जो खुशियां थीं
वो सब ले गया
एक बेजान-सा बस जिस्म ही
अब रह गया
जो ना मरता, जो ना मिटता
वो मन भी अब बुझ गया
रंग जितना मुझमें था
वह रंग सारा उड़ गया
मेरा जीवन अब तो है बस
एक कटी पतंग-सा*
धुल रही हूँ जख्म़ सारे
हो रहा है दर्द-सा…
विशेषता:-
यह रचना मेरे जीवन का सत्य प्रकट करती है
एक ऐसा सत्य जिसे मैं स्वीकार नहीं करना चाहती..
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