डगमगा जाते हैं कदम आजकल
एक जरा से झोंके से मगर,
एक वक्त था जब हमारे इरादे
बुलंद हुआ करते थे..
कदम
Comments
7 responses to “कदम”
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वाह क्या बात है। इरादे बुलंद ही रखो ।
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Tq
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वाह वाह, बहुत खूब अभिव्यक्ति
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Tq
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Nice
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मुझे लगता है कि आपकी कविता अधूरी है क्योंकि इससे कोई भी मैसेज या अर्थ निकालना मुश्किल है
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वसुधरा जी मैं आपकी बात का सम्मान करती हूँ परंतु
बता दूँ की इस 2liner shayri का अर्थ क्या है…“जरा सी तकलीफ या मुसीबत से आजकल कदम (हौसला) डगमगा जाता है…
पर एक वक्त वह भी था जब कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना करने में कोई परेशानी नही होती थी परंतु अब ऐसा नहीं है”….
यह था आशय जिसे कम में ज्यादा समझिये…
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