कदम

डगमगा जाते हैं कदम आजकल
एक जरा से झोंके से मगर,
एक वक्त था जब हमारे इरादे
बुलंद हुआ करते थे..

Comments

7 responses to “कदम”

  1. Geeta kumari

    वाह क्या बात है। इरादे बुलंद ही रखो ।

  2. वाह वाह, बहुत खूब अभिव्यक्ति

  3. Vasundra singh Avatar

    मुझे लगता है कि आपकी कविता अधूरी है क्योंकि इससे कोई भी मैसेज या अर्थ निकालना मुश्किल है

    1. Pragya Shukla

      वसुधरा जी मैं आपकी बात का सम्मान करती हूँ परंतु
      बता दूँ की इस 2liner shayri का अर्थ क्या है…

      “जरा सी तकलीफ या मुसीबत से आजकल कदम (हौसला) डगमगा जाता है…
      पर एक वक्त वह भी था जब कठिन से कठिन परिस्थिति का सामना करने में कोई परेशानी नही होती थी परंतु अब ऐसा नहीं है”….
      यह था आशय जिसे कम में ज्यादा समझिये…

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