12 Comments

  1. बहुत ही सुन्दर कविता है सतीश जी। बहुत ही प्रेरणा देती हुई रचना।
    “शक्ति की मूरत है तू, छोड़ दे ये मन के दुख ,कर्म पथ पर चल अडिग ”
    वाह सर … दुःखी मन तो क्या दुखी आत्मा तक को सुकून मिल जाए
    इतनी सशक्त कविता रचने के लिए आपको मेरी शुकामनाएं सर
    लेखनी की मजबूती को प्रणाम।

    1. कविता के भाव के साथ सामंजस्य बिठाने और इतनी सुन्दर समीक्षा हेतु सादर धन्यवाद गीता जी, सादर अभिवादन

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