ओ विरह की वेदना !
मुझको पकड़ा दो कलम
साथ में दे दो मुझे
रात की तन्हाइयां
और दो मुझको तुम
रंग-बिरंगी स्याहियां
अधखुली-सी इक कली
रात यों कहने लगी
“कलम और स्याही” ना हो तो
दर्द कैसे लिखोगी
मैं समझ ना कुछ सकी
सोंच में लिपटी रही
बोल फिर कुछ ना सकी
फिर मौन-सी सिसकी उड़ी….
“कलम और स्याही”
Comments
5 responses to ““कलम और स्याही””
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बहुत खूब लाजवाब अभिव्यक्ति
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Very nice poem 👏👏👏👍👍
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अतिसुंदर भाव
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बहुत खूब
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