कविता- सदा बहार के जंगल

कविता- सदा बहार के जंगल
पैर रख कर सिर पर किसी के ,
चढ़ जाओगे ऊंचाइयों पर जरूर
गिरोगे जब जमीन पर ही मगर |
सिर की जगह कंधा का
सहारा लिया होता गिरते गर
तुम कोई थाम लिया होता |
देखो सदाबहार के वनो को |
हर पेड़ लंबा होता है |
आसमान की ऊंचाइयों को
छु रहा होता है |
मगर कोई किसी को दबाता नाही |
खींचकर पैर जमीन गिराता नहीं |
आगे निकलने की होड़ लगाते है |
होड़ होड़ मे सारा जंगल
सदाबहार बन जाता है |
एक दूसरे को साथ लिए
सबसे लंबा और ऊंचा हो जाता है |
हम तो इंसान है पेड़ नहीं |
एक दो पेड़ नहीं
सारी दुनिया को संग लेकर
ऊंचाइयों को छू लेंगे |
एक दूसरे के कंधे से कंधे मिलाकर |
बिना किसी को सताये
बिना किसी को रुलाये |
हमे सदा संग चलना है |
श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286

Comments

13 responses to “कविता- सदा बहार के जंगल”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    👌

    1. Shyam Kunvar Bharti

      हार्दिक आभार

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    मनोहर

    1. Shyam Kunvar Bharti

      पंडित जी आभार

    1. Shyam Kunvar Bharti

      हार्दिक आभार आपका

  3. Priya Choudhary

    सुंदर रचना👏👏

    1. Shyam Kunvar Bharti

      हार्दिक आभार आपका प्रिया जी

  4. Satish Pandey

    सदा बहार के जंगल में खड़े पेड़ों के आधार पर मानव यह सीख दी गयी है कि दूसरे की टांग खींचने की बजाय “एक दूसरे के कंधे से कंधे मिलाकर” मंजिल तक पहुंचना चाहिए, बहुत ही सुन्दर भावाभिव्यक्ति है,

    1. Shyam Kunvar Bharti

      हार्दिक आभार आपका पांडेय जी रचना के भव को समझने के लिये

  5. Shyam Kunvar Bharti

    आभार

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